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सोमवार, 15 जनवरी 2018

१८.......नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक'

कहते हैं 
जब तक दुनिया न देखी, 
तब तक हमारा संसार एक दायरे में 
बंध कर रह जाता है।आप सोच रहे होंगे कि 
आज मैं ऐसी बहकी -बहकी बातें क्यूँ कर रहा हूँ ? 
क्या मेरा मानसिक स्तर बराबर है या मेरा जुमलेबाज़ी का मन है। 
 नहीं ज़नाब ! मेरी तबियत पूर्ण रूप से बराबर है और मैं पूरे होशो -हवाश में हूँ। परन्तु एक बात आप सबसे कहना चाहूँगा ! मंज़िलें और भी हैं ,
आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद हैआपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना 
जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी 
रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं। 
ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा !
इसी पावन उद्देश्य के साथ 

"लोकतंत्र" संवाद मंच पर 
 नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' 
में आपका हार्दिक स्वागत है। 


आज के 'विशेषांक' के रचनाकार :

  • आदरणीया पूनम जी 
  • आदरणीया अंजु चौधरी 'अनु'
  • आदरणीय रमाकांत सिंह 
  • आदरणीय आशीष अवस्थी 
  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  • आदरणीया सुमन सिन्हा 
  • आदरणीया टिम्सी मेहता 
  • आदरणीय राकेश मूथा 
  • आदरणीया निधि टंडन 
  • आदरणीय मानव मेहता 
  • आदरणीया अलकनंदा सिंह 
  • आदरणीया शशि पुरवार 
  • आदरणीया साधना वैद 
  • आदरणीया शालिनी कौशिक 
  • आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी 
  • आदरणीय बृजेन्द्र सिंह  

तो चलिए चलते हैं आज की रचनाओं की ओर ...... 



चाँदनी की इनायत हुई.... 
आपने जब दुआ दी मुझे 
ठीक मेरी तबियत हुई। 

 ऐ-री-सखी की एक कविता
 ऐ-री-सखी ,
बता ना मुझे कि

एक लंबी सी खामोशी के बाद

 यज्ञ 

अग्नि प्रज्ज्वलित कर
समिधा को किया समर्पित
स्वाहा को

प्रेम के गीत कुछ...!! 

    प्रेम के गीत कुछ, शब्द में ढल गये..
प्राण चेतन हुये,तन रतन हो गये, 


 कोई रहगुज़र तो होगी ज़रूर .... 
 दिल में 
धक्क-सा हुआ 
शायद आज फिर 
बज़्म में आपकी 


  एहसास 

बस - एक एहसास
नाम और रिश्तों से परे,
मुक्त....

  सुच्चा मोती बना ... 
 टूटा था तारा कहीं,

छूट के गिरा जो 

 हां ,प्यार ही है जीवन का अर्थ 

 क्या है अर्थ इन हवाओं का

इन हरे पेड़ों का

 चुनना 

 तुमने चुनी अपनी सुविधा
अपनी पसंद को जिया

 किताबें धूल फांकती है शेल्फ पर 
 किताबें धूल फांकती है 
शेल्फ पर। 

सबहीं को मुबारक हो हैप्‍पी वाली ''खिचराईं'
  आज मकर संक्रांति है, 
मुझे अपना बचपन याद आ रहा 

बदल गए हालात 
पतझड़ में झड़ने लगे 
ज्यों शाखों से पात 

दीप ले आओ 
  छाँटनी होगी 
ज्ञानालोक के लिए 

मन की धुंध


  वसीयत और मरणोपरांत वसीयत 



  वसीयत एक ऐसा अभिलेख जिसके माध्यम से 
व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद 
अपनी संपत्ति की व्यवस्था करता है  


 सुकूँ के साथ कुछ दिन जी लिया क्या ।

वो अच्छा दिन तुम्हें हासिल हुआ क्या ।।

 पूरा चाँद, अधूरी चाँदनी

 मुझे कुछ दर्द 
कुछ डर सा 

महसूस होता है ...



कल पुनः 
उपस्थित होता हूँ 
"इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड" 
के अगले अंक के साथ
 तब तक आज्ञा 
दें ! 

"एकलव्य"





 छायाचित्र स्रोत : गूगल