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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

२१..... "लोकतंत्र" संवाद मंच का एक 'वैचारिक' अंक

कहते हैं इस धरा पर 
कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं ! 
बात अलग है अपनी मिथ्या पूर्णता 
पाने हेतु यह मानव,जीवन भर अपूर्णता के 
वन में स्वयं में पूर्ण बनकर विचरण करता रहता है,
और स्वयं की अपूर्णता स्वीकारने से भी भय खाता है। 
परिणाम गहरे अज्ञानता का प्रारम्भ ! मानव इस भ्रम के 
गहरे अंधकार में रहना सहर्ष स्वीकार करता है जहाँ उसे क्षणभर का भौतिक आनंद अवश्य मिलता है परन्तु भविष्य में अदृश्यमान कठिनाईयाँ उसे दृश्यमान नहीं होती। अंततः परिणाम आजीवन पछतावा मात्र !   

"लोकतंत्र" संवाद मंच 
'दार्शनिक' भाव भरे अंक में आपका स्वागत करता है। 


हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीय विश्वमोहन जी 
  • आदरणीया ऋतु आसूजा 
  • आदरणीय राजेश कुमार राय 
  • आदरणीय विजय बोहरा 
  • आदरणीया अनीता लागुरी 
  • आदरणीया शकुंतला 'शाकु'
  • आदरणीय ज्योति खरे 
  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  • आदरणीया रिंकी राउत  



तो चलिए ! चलते हैं 
आज की रचनाओं की ओर 


 विज्ञान, पुराण और इतिहास 
सभी इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कश्मीर  
पुरा काल में जलोत्प्लावित था और सतीसर के नाम से जाना जाता था


  मनुष्य जीवन में ,तन का अस्तित्व 
राख हो जाना ,आत्मा रूपी शक्ति ,जिससे 
मनुष्य तन पहचान में आता है , यानि  मनुष्य का अस्तित्व 
धरती पर तभी तक है जब तक तन में आत्मा की ज्योत रहती है ।


    हुई जब शाम शम्मा जल गयी अब देख लो मंज़र 
हजारों आशिकों का कारवाँ उस पर मचलता है


 क्यों थक गए तुम,
चलते चलते।
क्यों रुक गए तुम,
मंज़िल तक पहुंचने से पहले।


 रुक जाओ
मत भागो
मैं नहीं थोपूँगा 
अपनी पराजय तुम पर

 गुलिस्तां में सजाएं होते अपने यादों के फूल
कहीं न कहीं तो बाहर आई होती

गंगा की छाती पर
जब भरने लगता है महाकुंभ
महाकुंभ में बस जाती हैं
कई कई बस्तियां

   माँगी थीं 
जब बिजलियाँ,  
उमड़कर 
काली घटाएँ आ गयीं। 

 साहित्य बहुत व्यापक और 
विस्तृत शब्द है, एक विशाल समुंदर 
के समान जिसकी गहराई और छोर नापना 
कठिन है वो हर इन्सान जो लिखने में रुचि या कहे लिखने की 
हिम्मत रखता है,वो हिंदी साहित्य में अपना छोटा सा योगदान देना 
चाहता है या हिस्सा बनना चाहता है

फिर उपस्थित होता हूँ 
"इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड" के अगले अंक के साथ। 
तब तक आज्ञा दें  !


सभी छायाचित्र : साभार गूगल