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सोमवार, 6 अगस्त 2018

५५ ...........क्या रखा है टाइटल में !

हम पत्थरों पर सिर झुकाते चले,कुछ करम थे हमारे 
पाखंडी हैं हम कहते-कहते,वे बताते चले। 
मरने लगे अब शर्म से,पी लो गंगा जल थोड़ा !
गटर के पानी को भी शुद्ध अमृत-सा बनाते चले। 

                       मानव तो मानव ही है चाहे वह इस देश का हो अथवा दूसरे देश का। तनिक विचार कीजिए यदि सम्पूर्ण विश्व ही हमारा देश होता और हम इस सम्पूर्ण विश्व के वासी ! न वीज़ा  और न ही कोई पासपोर्ट। सभी स्थानों पर स्वतंत्र रूप से विचरण करने की स्वतंत्रता। तब क्या भारत और क्या अमेरिका, न ही कोई लंदन। न ही कोई संसाधनों की ख़ातिर  युद्ध करता और न ही गज़-भर ज़मीन  के लिए सीमाओं पर रक्तपात होता। हमारे चाचा अमेरिका में और मौसी लन्दन में। न ही कोई ज़ात-पात और न ही कोई धर्म ! न ही हम सिंह होते और न ही आप बिलारी और कोई बादव नहीं और न ही कोई मौतम। न ही वो मंदिर में समय बिताते और न हम मस्जिद में। सब मिलकर विकास और प्रगति की बातें करते। डिनर भी साथ-साथ और लंच भी दबा के। उधर वाइन की बोतल खुलती, इधर ठंडी-ठंडी लस्सी बंटती। गाहे-ब-गाहे कतरबाल और सुप्त जी, जान-लगान, सत्तू-खैयर भी साथ हो ही लेते ! सभी केवल नाम से सम्बोधित किए जाते। अरे हाँ ! टाइटल के एवज में "जी" अवश्य लगा सकते थे। न कोई राजा और न ही कोई प्रजा, सभी समान। तब सच्चे अर्थों में हम बराबरी की बातें करते। एक देश सर्वश्रेष्ठ देश ! क्यों सही है न ! चलिए यदि मेरा सोचना ग़लत भी है तो क्या करना। बझे रहिए इसी "टाइटल" के मायाजाल में और मिथ्या ही रट लगाए रहिए। एक भारत, सर्वश्रेष्ठ भारत ! मेरा क्या है, कल फिर मज़दूरी पर जाना है और शाम को कढ़ी-चावल खाना है तथा उसी फटी टाट पर टाँग पसारकर सोना है। हा .... हा। ....... क्या रखा है टाइटल में !  
'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  
 
 
चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........


तुम संग..
 नभ अम्बर के पृष्ठ भाग पर, सात वर्ण का विक्षेपन हो। 
हरयाली का हरा आवरण, और फूलों का हो अभिनन्दन,

 "षड़यंत्र"
  बगल के कमरे में बैठी निम्मी सब
सुन रही थी और यह सब सुनकर वह सावधान
हो गयी और अकस्मात उसने अपनी अटैची तैयार की 

द्वंद की पीड़ा 
व्यथित हूँ
अंतर्मन में झेल रही हूँ।

 दावत ए फ़िक्र1
 सोचो सीधे शरीफ़ इंसानों!
शख़्सी२ आज़ादी ए तबअ३ क्या है?
यह तुम्हारी अजीब फ़ितरत है,
अपने अंदर के नर्म गोशों में,

 सोच सकते हैं पा नहीं सकते
 ऐसी कुछ शै हैं जैसे तू है जिन्हें
सोच सकते हैं पा नहीं सकते

 मित्र मिला हो तो बताना
 दुनिया में सबसे ज्यादा अजमाया जाने
वाला नुस्खा है – मित्रता। एलोपेथी, आयुर्वेद,
होम्योपेथी, झाड़-फूंक आदि-आदि के इतर एक
नुस्खा जरूर आजमाया जाता है वह है विश्वास का नुस्खा। हर आदमी कहता है 

मैं. .... 
 कुछ सिल्वटे चादर की ना जाने क्यों...!!
उन्हें छूने को हाथ बढ़ाया
पर कांप उठा....!

निर्बल चितवन सारा..!!

 महज़ ख्वाब ही तो था
 पढ़ के बनना था उसे भी डॉक्टर,
क्या हुआ जो बिखर गया
परिस्थितयों की चोट से
महज़ ख्वाब ही तो था...


 चल बैजयंती कंधे पर ....
 ले चल बैजयंती कन्धों पर
अपनी हार देखता हूँ -
जीते नेता हारी जनता

मैं हर-बार देखता हूँ 

बंदी,
ये पहरेदार जो सो रहे हैं,
दरअसल सो नहीं रहे हैं, 
सोने का नाटक कर रहे हैं-


 नील गगन में उड़ने वाले -
ओ ! नटखट आवारा बादल ,
मुक्त हवा संग मस्त हो तुम-
किसकी धुन में पड़े निकल !

 भानू पंडितजीने काले बादलों को देखा, 
अपनी उंगलियों पर कुछ गणना की, पत्रा के 
दो-चार पन्ने पलटे, फिर इत्मीनान से अपने 
मुहं में गुटके की एक बड़ी डोज़ डाल कर बोले 

 मानवी-झुण्ड 
अपने स्वार्थों की रक्षार्थ 
गूढ़ मंसूबे लक्षित रख 
एक संघ का 
निर्माण करता है 


उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें  !



'एकव्य' 


आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा।
सभी छायाचित्र : साभार  गूगल
  

सोमवार, 30 जुलाई 2018

५४............एक अमर गाथा ( ३१ जुलाई )

 याद आई तेरी,वो कालजयी लेखनी का फितूर 
दर्द था उनका शब्दों में तेरे,संवेदनाएं थीं तेरी 
लिखता गया, बस लिखता गया 
उस काल से,इस काल की 
एक अमर गाथा  
विलाप के लिए केवल, ताकि 
आए दूसरा फिर रोने वाला ! 'एकलव्य' 

    
स्मृति शेष ......... 
अमर लेखनी ! ........ एक स्मरणीय अंक ( ३१ जुलाई )
प्रण है ! पर वो स्याही नहीं यथार्थ की 
तेरी लेखनी जैसी 
हैं तो बस रंगीनीयत ज़माने की मिथ्या 
उड़ेल रहे हैं हम और उड़ेलते जायेंगे 
दस्तूर जो ठहरा ! तुझे याद करने की 
'मंत्र' नहीं कोई जो फूंक दूँ उनमें 
शख़्स हैं 'नमक' के !
विचार गलते जायेंगे। .......'एकलव्य' 

मुंशी जी की एक अमर कृति 

कफ़न 

( प्रेमचंद )



झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।

घीसू ने कहा-मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।

माधव चिढक़र बोला-मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?

‘तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!’

‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना काम-चोर था कि आध घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढक़र लकडिय़ाँ तोड़ लाता और माधव बाजार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल जरूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिये जाते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त कर्ज से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकडऩे भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निब्र्याज भाव से दुगुनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोयें।

घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा-जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!

माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला-मुझे वहाँ जाते डर लगता है।

‘डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।’

‘तो तुम्हीं जाकर देखो न?’

‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!’

‘मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!’

‘सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।’

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताजी थी, बोला-वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लडक़ी वालों ने सबको भर पेट पूडिय़ाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूडिय़ाँ खायीं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौडिय़ाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!

माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा-अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।

‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। सादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है!’

‘तुमने एक बीस पूरियाँ खायी होंगी?’

‘बीस से ज्यादा खायी थीं!’

‘मैं पचास खा जाता!’

‘पचास से कम मैंने न खायी होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।’

आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों।

और बुधिया अभी तक कराह रही थी।



सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

मगर ज्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?

बाप-बेटे रोते हुए गाँव के जमींदार के पास गये। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा-क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।

घीसू ने जमीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा-सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका गुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।

जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकालकर फेंक दिए। मगर सान्त्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव के बनिये-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चारे आने। एक घण्टे में घीसू के पास पाँच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गयी। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।

गाँव की नर्मदिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।



बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!

माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।

‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।’

‘हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?’

‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।’

‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’

‘और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाजार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बजाज की दूकान पर गये, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गयी। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गये। वहाँ जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा-साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।

उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आयी और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।

कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गये।

घीसू बोला-कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।

माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रुपये क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!

‘बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?’

‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?’

घीसू हँसा-अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।

माधव भी हँसा-इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला-बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!

आधी बोतल से ज्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूडिय़ाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे।

दोनों इस वक्त इस शान में बैठे पूडिय़ाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

घीसू दार्शनिक भाव से बोला-हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?

माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की-जरूर-से-जरूर होगा। भगवान्, तुम अन्तर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।

एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला-क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?

घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।

‘जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?’

‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’

‘पूछेगी तो जरूर!’

‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’

माधव को विश्वास न आया। बोला-कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।

‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’

‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएँगे।’

‘ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाये देता था।

वहाँ के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।

और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडिय़ों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।

घीसू ने कहा-ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरूर पहुँचेगा। रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!

माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा-वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, बैकुण्ठ की रानी बनेगी।

घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला-हाँ, बेटा बैकुण्ठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी जिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।

माधव बोला-मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी!

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।

घीसू ने समझाया-क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गयी, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिये।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे-

‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी।

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताये, अभिनय भी किये। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े। 


'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  
  
चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........

कुछ तुम कहो....कुछ हम कहें... 
भाषा कोई भी हो 

क्षणिकाएं 
भूल सत्य 
असत्य का भ्रम 

दस्तक 

बाज़ार तेरे ख़ैर की बरकत की लगी है,

अय्यार लगाए हैं दुकानें, जो ठगी है.

और नोचा जा रहा था ये शरीर
जहाँ थी मै मात्र एक मशीन 
जिसमे डाला जा रहा था बीज
जबरदस्ती अहंकार के साथ

 मत उगलो
जहर इतना
कि जीना
मुश्किल हो जाए


देह स्थूल जंगम नश्वर 'मैं',
रहा पसरता अहंकार में.
सूक्ष्म आत्मा तू प्रेयसी सी,
स्थावर थी, निर्विचार से.

 वफ़ाई ज़फ़ाई परे कर दिया पर
तेरा लुत्फ़ ख़ुद में ज़रा चाहता हूँ

 उभरते हैं यूँ कुछ अतीत के -
पृष्ठ दीर्घ निःश्वास से,
जीवन खोलता है 
विस्मृत वृद्ध 
संदूक 


 भागीरथी की धार सी
कल्पांत तक मैं बहूँगी
अपराजिता ही थी सदा
अपराजिता ही रहूँगी।

सुनो !
मत कुरेदो हमें 
हम अवसाद में हैं 


 हटाओ फूल
जो बने प्लास्टिक से
देखो बगिया,
आ गया है सावन
ज़ख़्मों का मरहम। 

मुंशी जी की कहानी 'पूस की रात' का नाट्य रूपांतरण  

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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'एकव्य' 

आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा।
सभी छायाचित्र : साभार  गूगल
  

सोमवार, 23 जुलाई 2018

५३......जिंदगी है घूमता पहिया

 चाहो न चाहो,यह लम्हा भी गुजर जाता है 
रेत ही है कितना भी पकड़ो जतन से, फितरत है इसकी 
कुछ पल में फिसल जाता है 
जिंदगी है घूमता पहिया,मौत भी है पहलू दूजी 
बर्फ़ है काफ़िर जिंदगी,गर्म होते ही पिघल जाती है
 आदरणीया  निशा नंदिनी भारतीय जी
'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला की इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है। 
परिचय 
 नाम- निशा नंदिनी भारतीय 
जन्म तिथि: -13-9-1962
कर्म स्थान - तिनसुकिया, असम 
पिता - स्वर्गीय  बैज नाथ गुप्ता 
माता- राधादेवी गुप्ता 
पति-लक्ष्मी प्रसाद गुप्ता 
शिक्षा -
1983- एम.ए -( तीन विषयों में) हिन्दी, समाजशास्त्र ,दर्शनशास्त्र ( बी.एड ) सभी प्रथम श्रेणी में ।
रूचि- कक्षा आठवीं में पहली रचना लिखी थी।तब से लेखनी अनवरत चल रही है। इसके साथ ही नाटक,आलेखन कला,चित्र कला तथा हस्तशिल्प में रूचि ।
वर्तमान 
वरिष्ठ अध्यापिका - विवेकानंद केंद्र विद्यालय, असम 
शिक्षण कार्य- 30 वर्षों से 
तिनसुकिया कॉलेज और वीमेंस कॉलेज में - 10 वर्ष  
लेखन- लगभग 35 वर्षों से  
सभी विधाओं में 
प्रकाशित पुस्तकें- 20
काव्य संग्रह - 
"भाव गुल्म" "शब्दों का आईना" "आगाज" "जुनून" "कोरा कागज़" "बोलती दीवारें" "दिल की जुबां से" "तार पर टंगी बूँदें" "दो आँसू एक रूप" "क्षितिज की रेखा" "सीप के मोती" लेख संग्रह- "कन्यादान किसका और क्यों"  "जादू सकारात्मक सोच का" "भारत का गौरव है असम"
जीवनी संग्रह - "जिज्ञासा"
कहानी संग्रह-  "एक थी रतना"
बाल साहित्य - "जादूगरनी हलकारा"  "जादुई शीशमहल" "शिशु गीत" "पैसों का पेड़"                                            
सांझा काव्य संग्रह -
"पुष्पगंधा" "काव्य अमृत" "सहोदरी भाषा"सोपान -3 
संपादन- "मुक्त हृदय" (बाल काव्य संग्रह )
विशेष- 2017 में  संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती के (बी. कॉम. प्रथम वर्ष)अनिवार्य हिन्दी के लिए स्वीकृत पाठ्यपुस्तक "गुंजन" में "प्रयत्न" कविता संकलित की गई है। "शिशु गीत" पुस्तक का (तिनसुकिया असम) के विभिन्न विद्यालयों में पठन-पाठन
सम्मान-
(1)2015 मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से माननीय शिक्षा मंत्री स्मृति इरानी जी द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में प्रोत्साहन प्रमाण पत्र ।
(2)2015 कवि हम तुम साहित्य संस्था द्वारा साहित्यकार सम्मान  
(3)10 से 16 दिसंबर 2016 वैश्विक साहित्यिक व सांस्कृतिक महोत्सव इंडोनेशिया और मलेशिया में साहित्य वैभवसम्मान  
(4)जे.एम.डी प्रकाशन दिल्ली द्वारा "काव्य अमृत" सम्मान 
(5)5 से 7 मई 2017 इलाहाबाद में राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला में शोध पत्र प्रस्तुत किया ।जिसके लिए प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
(6)2 से 7 जून  2017 थाईलैंड के क्राबी महोत्सव में साहित्य वैभव अवार्ड से सम्मानित ।
(7)29 जनवरी 2017 जे.सी. आई क्लब तिनसुकिया द्वारा शिक्षक सम्मान ।
(8)24-सितंबर 2017 अग्रसेन जयंती के अवसर पर साहित्यकार सम्मान ।
(9)5 सितंबर 2017 लॉयंस क्लब तिनसुकिया द्वारा शिक्षक दिवस पर सम्मान ।                       (10)23 दिसंबर 2017 हिन्दी साहित्य सम्मेलन की रजत जयंती के अवसर पर तेजपुर, असम में साहित्यकार सम्मान ।
(11) 16 जनवरी 2018 भारत सरकार आकाशवाणी की ओर से इंदौर में आयोजित सर्वभाषा कवि सम्मेलन में भाग लिया। यह कवि सम्मेलन "वल्ड बुक रिकार्ड" में दर्ज किया गया है । 
(12)1अप्रैल 2018 को पुष्पवाटिका पत्रिका परिवार की ओर से"सारस्वत सम्मान"प्राप्त हुआ।
(13)28 मई 2018 को जर्मनी के म्यूनिख शहर में राष्ट्र भाषा के प्रचार प्रसार के लिए युवा साहित्यकारों के साथ इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल की तरफ से एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया।
14) 5 जून 2018 राष्ट्रीय नागरी एंव पर्यावरण संस्था द्वारा सम्मानित 
15) 10 जून 2018 विलक्षण संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर "विलक्षण समाज सारथी"सम्मान 
पद भार-
2-शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की कार्यकर्ता 
3- 1992 से विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी की कार्यकर्ता 
प्रसारण -
रामपुर उत्तरप्रदेश,डिब्रुगढ़ असम व दिल्ली आकाशवाणी व दूर्दशन से परिचर्चा,वार्तालाप,कवि गोष्ठी,नाटक आदि का प्रसारण।
प्रकाशित-                                          
देश भर की प्रसिद्ध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता,कहानी,लेख व जीवनियाँ प्रकाशित ।
उद्देश्य-सकारात्मक सोच द्वारा देश की सेवा करना ही जीवन का उद्देश्य है । 
वर्तमान पता- निशा गुप्ता 
पति श्री एल.पी गुप्ता 
आर.के.विला 
बाँसबाड़ी, हिजीगुड़ी, 
गली- ज्ञानपीठ स्कूल
तिनसुकिया, असम 
786192

ई-मेल आईडी : nishaguptavkv@gmail.com
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तो चलिए ! चलते हैं इस सप्ताह के कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर 


ख़्वाहिशे पैग़म्बरी
कुछ ख़ता पैदा करुँ, फ़िर कुछ सज़ा पैदा करुँ,

मौत से पहले ही इक, यौमे जज़ा3 पैदा करुँ.

सफ़र ..... 
ट्रेन में
खिड़की वाली
सीट पर बैठी
पीछे छुटते हुए तमाम
दृश्य को अपनी
आँखों में बसा लेने के
प्रयास में चली जा रही हूँ,

 अम्ल भरकर बौछार करते हुए
ताजा हो रहा है वो पल एक बार फिर
कि जो मन से कभी उतरा ही नहीं,
आज फिर ज़िन्दगी 

  जिन किताबों में फूल थे सूखे
शेल्फ से वो निकाल रक्खी हैं 

हैं तो ये गल्त-फहमियाँ लेकिन
चाहतें दिल में पाल रक्खी हैं

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

नहीं बिल्कुल नहीं भीगी थी 
बारिश की फुहारों में 


रोटी ,कपड़ा और मकान 

 और 
‘अब के सावन में 
शरारत ये मेरे साथ हुई 
मेरा घर छोड़ के 
कुल शहर में बरसात हुई.’
कभी भुलाए नहीं भूलते.

 इस जीवन के माने क्या थे,
तुमसे मिलने की घड़ियाँ थीं !
गर वो उधार की खुशियाँ थीं
तो उनको अब वापस ले लो !
इतनी इनायत और करो.....

 सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥


पहली बारिश में तर-ब-तर 
आया कोई  उसके  नीचे 
ख़ुद को बारिश से बचाने 
थमने  लगी  बरसात
माटी की सौंधी गंध 

आदरणीय गोपालदास 'नीरज' जी 


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सोमवार, 9 जुलाई 2018

५२ .............ब्रह्माण्ड के असीमित ज्ञान

कहते हैं सीखना मनुष्य की आजीवन प्रवृत्ति होती है। और मानव का यह अप्रतिम गुण समय के साथ बढ़ता जाता है। सीखने की इच्छा का ख़त्म होना मनुष्य के मरण का द्योत्तक है। वर्तमान में मानव सीखने की प्रवृत्ति से विमुख एवं अपने ही अंदर संकुचित ज्ञान के आवेश में आकर इस ब्रह्माण्ड के असीमित ज्ञान को धता बता रहा है। ऐसा नहीं है कि सीखने की लालसा जीवित नहीं रही अभी भी बहुत से मानव इस अथाह ज्ञान को अर्जित करने में निरंतर प्रयत्न कर रहे हैं। इसी का एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं 
आदरणीया रोली अभिलाषा जी जिन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाईयों का सामना किया परन्तु अपने सीखने की प्रवृत्ति का त्याग नहीं किया जिसके फलस्वरूप इन्होंने स्वयं की एक अलग पहचान इस साहित्य जगत में बनाई है। जिसका परिणाम इनकी प्रथम पुस्तक के रूप में आप सबके समक्ष प्रस्तुत है। 
'लोकतंत्र' संवाद मंच आदरणीया रोली अभिलाषा जी को उनके प्रथम पुस्तक ''बदलते रिश्तों का समीकरण''  के प्रकाशन हेतु ढेरों शुभकामनाएं देता है और आशा करता है कि भविष्य में साहित्य के नैतिक मूल्यों की स्थापना के प्रखर पक्षधर इस मंच को आपका अमूल्य सहयोग मिलता रहेगा।
  
'रोली' जी के विषय में कुछ शब्द लेखकों की ओर से....... 


आदरणीय रविन्द्र सिंह यादव जी

रोली अभिलाषा जी का रचना संसार जीवन के उन उपेक्षित अँधेरे कोनों पर रौशनी डालता जिनमें कश्मकश की तहों में दबे ज़िन्दगी के मासूम सवाल बाहर आने को आतुर हैं। रचनाकार का स्पष्ट दृष्टिकोण उसकी लेखनी को पैनापन देता है। रोली जी की रचनाओं को पढ़ते-पढ़ते आपको वैचारिक गहराई में उतरते जाने का एहसास कुछ इस प्रकार होता है कि पाठक के लिये बिषय के विभिन्न आयाम तलाशना कभी उलझन भरा तो कभी सुकून देने वाला होता क्योंकि बेबाकी अपना प्रभाव दिखाने से नहीं चूकती। हमारी शुभकामनायें।


-रविन्द्र सिंह यादव ( प्रगतिवादी कवि व लेखक )  

आदरणीया अपर्णा वाजपई जी ( लेखिका )

रोली अभिलाषा सिर्फ़ नाम या एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक ऐसा प्रेरणा पुंज है मेरे लिए जो जीवन के जटिलतम क्षणों में भी सकारात्मकता का उजास लेकर आती हैं। एक साहित्यकार के तौर पर उनका सफ़र समाचारपत्रों में पत्र लेखन से शुरू होकर आज एक स्थापित लेखिका के रूप में अनवरत जारी है और वो रचनाकार के तौर पर नित नए आयाम गढ़ रही हैं। हिंदी, अंग्रेजी, और उर्दू तीनों भाषाओँ में महारत रोली अभिलाषा आज हिंदी ही नही बल्कि अंग्रेजी साहित्य में भी अपना योगदान दे रही हैं। कई समाचार पत्रों, ब्लॉग और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ साथ वे दिव्यांग बच्चों के अभिभावकों को परामशर्क के रूप में अपनी सेवाएं देती हैं और उन्हें निराशा के गर्त से बाहर लाकर जीवन की संभावनाओं का मार्ग दिखाती हैं।
'बदलते रिश्तों का समीकरण' उनकी उस दौर में लिखी गयी किताब है जब वे एक बेहद खतरनाक दुर्घटना के कारण दोनों पैरों में प्लास्टर चढ़ाकर बिस्तर पर थीं और असहनीय दर्द से गुजर रही थी. ऐसे समय में एक सामान्य व्यक्ति अवसाद में डूब जाता है और स्वयं को दूसरों की दया का पात्र समझकर नकारात्मकता के अंधेरे में अपनी क्षमताएं खो देता है। शारीरिक चुनौतियों को नजरअंदाज करते हुए मोबाइल पर एक लघु उपन्यास लिख देना रोली अभिलाषा की जिजीविषा को दर्शाता है।
70 से 80 के दशक के उत्तर भारत में निम्न माध्यम वर्ग के सामजिक संजाल के बीच फंसे स्त्री-पुरुष के रिश्तों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करता हुआ यह लघु उपन्यास अपने आप में अनोखा है जो पाठक को अंत तक इस प्रकार जोड़े रखता है कि उसके चरित्र कई दिनों तक दिमाग में चलते रहते हैं और पाठक मन ही मन उनसे गहन साक्षात्कार कर लेता है।
अपने अनूठेशिल्प, विशिष्ट शैली और यथार्थ कथ्य के लिए यह उपन्यास बार-बार पढ़ा जाना चाहिए जो साहित्य जगत में रोली अभिलाषा का अनुपम योगदान है।
                                                                                                -अपर्णा वाजपई 

चलते हैं आज की श्रेष्ठ रचनाओं की ओर .......

 खूब हँसते है
अकेले मे
अंदर ही अंदर
खुद को
पढ-पढ कर रोते है |

 फिर रचे जा रहे चक्रव्यूह
फिर कोई अकेला अभिमन्यु
फंसकर इस चक्रव्यूह में
गंवा देगा अपने प्राण
हर और विराजमान हैं धृतराष्ट्र

 हेरी माई देउ सगुनिया परिअ दुअरि दुलहिन के पाँवा |  
कंठि हारु कर करिअ निछावरि तृन तोरत सिरु बारि फिरावा ||   

बस भी करो अब देवी कहना
पहले समझो तो इंसान मुझे
दिखलाओ जरा साथी बनकर
अब न मानूंगी भगवान तुझे

 क्षितिज पर बृक्ष का संहार
नभ में छाँव बोना चाहता है -
तमस में दीप का उपक्रम नहीं
खोजता है पथ सुघर

 ऐसी कोई वनस्पति है ही नहीं, 
जो किसी न किसी व्याधि की चिकित्सा में उपयोगी न हो

 वीर रस, जन गण सुहाने गा रहे हैं
पंक्तियों में गुनगुनाते जा रहे हैं,
तारकों की नींद को विघ्नित करे जो
गीत, वे कोरे नयन दो गा रहे हैं।

ल रहा हर कण धरा का
अनुतप्त हैं रवि रश्मियाँ,
एक शीतल परस कोमल
ताप हरता हर पुहुप का  !

  सँकरी नदी 
थे उस पार आप  
गुफ़्तुगू आसाँ 

समाज सुधारक और पत्रकार की 
भूमि में हम  हैं। तो हमें अपनी कथनी, 
करनी और लेखनी पर ध्यान देना होगा। रह -रह कर इन्हें 
टटोलना होगा। बड़ा ही संघर्ष भरा काम है यह हम सभी के लिये। 
मेरा मानना है कि उपदेश बनने से पहले एकांत में स्वयं को भलीभांति परख लेना चाहिए।

 ओस की बूंद से भीगने वाली लड़कियों
कैसे सीखोगी तुम दर्द का ककहरा,
आटा गूंधते हुए
नेल पेंट बचाती हुई लड़कियों
ज़िन्दगी मिलती नहीं दोबारा,

 ब्लॉगिंग का एक साल
 समय निरंतर प्रवाहमान होते हुए अपने अनेक 
पड़ावों से गुजरता हुआ - जीवन में अनेक खट्टी मीठी 
यादों का साक्षी बनता है जिनमे से कई पल अविस्मरनीय  बन जाते हैं|

एक मनमोहक आवाज आदरणीया शुभा मेहता जी 

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हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
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