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बुधवार, 27 मई 2020

९०.. जब बुद्धिजीवी लेखक गधे को गधा कहना छोड़ दे!





"जब बुद्धिजीवी लेखक गधे को गधा कहना छोड़ दे और भेड़िए को मेमना बताना प्रारंभ कर दे, तब समझ लीजिए साहित्य के बुरे दिन चल पड़े हैं।"
'लोकतंत्र संवाद मंच'
'नई प्रतिभाओं की खोज' 
के अंतर्गत आज हम दो नये रचनाकारों का इस प्रायोगिक मंच पर तहेदिल से स्वागत करते हैं।

 आप दोनों रचनाकारों का 'लोकतंत्र संवाद मंच' हार्दिक अभिनंदन करता है।


१. आदरणीय अनिल यादव जी 

अनिल यादव जी की एक रचना उनके ही फेसबुक वाल से 

ब नहीं करता मैं मुहब्बत की बातें
सामने एक मजनूँ फटेहाल आ रहा है

ऐ ज़िंदगी अब छोड़ दे तू सपने देखना
इधर-उधर से अब बवाल आ रहा है

वादे उसके, उसको कैसे याद दिलाऊँ मैं
जवाबों के बदले अब सवाल आ रहा है

ख़ामोशी से गया था वो रक़ीब के पास
मगर अब लौटकर वो बेहाल आ रहा है

इस जाड़े में सूरज भी छुप गया है कहीं
जिसे देखिए, वो पस्त चाल आ रहा है

न करो सियासत की बातें मेरे यारों अब
नाज़नीनों के दिल में उबाल आ रहा है

ख़ुशियाँ उसके मुकद्दर में है, ये माना मैंने
यहाँ भी हर ग़म नज़र ख़ुशहाल आ रहा है

बचकर रहना इस बार वक़्त से ऐ अनिल
सुना है कि साथ उसके बेताल आ रहा है
                                                                                (आदरणीय अनिल यादव जी की कलम से) 

 वांकुर और प्रतिभा संपन्न लेखिका  


२. आदरणीया प्रियंका पांडेय 'नंदिनी' जी,

प्रियंका जी की एक रचना 


कितना अच्छा है न... 
ये शांत वातावरण
न गाड़ियों की पीं-पीं
न वो सरदर्द बढ़ा देने वाले हॉर्न
आज लोगों की 
चहल-पहल भी नहीं
एकदम शांत.... उन्मुक्त। 
बाहर बैठने पर आज 
हवा की सरसराहट 
महसूस हो रही है। 
सुनाई दे रहा है 
वो पत्तियों का झड़ना। 
अच्छा हाँ, पतझड़ आ गया शायद। 
देखो तो..., 
                                                     (प्रियंका जी की कलम से )


   'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३  में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।

के अंतर्गत प्रस्तुत है ये रचनाएँ,


  
 (पर्दा उठता है )
सूत्रधार -   एक जोगन राजस्थानी 
              और बृज की है ये कहानी
               कृष्णा के गुण गाती आई  
          मीरा प्रेम दीवानी।




 जिन्हें अहंकार था सर्वेसर्वा होने का 
वे एक वायरस की चुनौती के समक्ष 
मजबूरन नत-मस्तक हुए हैं
दंभी,मक्कार, झूठे-फ़रेबी 
आज हमारे समक्ष बस मुए-से हैं।


साहित्य विशेष कोना 
'साहित्य विशेष कोना' के अंतर्गत हम आपको सदैव अनोखी प्रतिभा से मिलवाते हैं।

 वीना की कविताएँ


हुजनों को
अंबानियों-अडानियों,
टूंटपूंजिए ब्राहमण, ठाकुर,
संघियों का गुलाम बनाने के
षड़यंत्र नहीं रचता


नदियां, पहाड़, खेत-खलिहान
जंगल, खदान नहीं डकार जाता

दरणीय ज्योति खरे जी की कविता  

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


आज्ञा दें!



आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं।   

बुधवार, 20 मई 2020

८९...... जागते रहो!




जागते रहो!

ब चूहे मरे कैसे? ई तो साहेब जी और उनके पिट्ठू लोग जानें! बड़े नेकदिल थे बेचारे, कहते थे यदि अँगूर में सुई चुभो दी जाए तो किशमिश बन जाता है और वो भी दुइ हफ़्तों में। 

            ससुर हम भी सोचे कि ई तो अमीर बनने का बड़ा ही नायाब तरीक़ा है। बताइए, अस्सी रुपए किलो अँगूर से चार-सौ रुपए किलो किशमिश झटपट तैयार! गपागप हमने भी दस किलो अँगूर में भरी दुपहरी सुइयाँ चुभों डालीं और छोड़ दिए कड़ी धूप में कोयले को हीरा बनने ख़ातिर। अब जो होना था वो तो होकर रहेगा, सो गया दिनभर के लिए घोड़ा बेचकर। 
अब हमारे कान में थोड़े न आकाशवाणी हो रही थी "मौसम आज बड़ा बेईमान होगा कृपया अपने-अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें! अब बेईमान था तो था, दिखा दिया अपना बेईमानीपन! हमरे सारे अँगूर लँगूर की शक़्ल के दिखने लगे और तो और, दो-तीन दिन में उनसे बास भी आने लगी। 

व्यंग्यनामा से........  



   'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३  में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।

'लोकतंत्र संवाद मंच' 
आप सभी पाठकों का स्वागत करता है। 

इस भाग में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं। 

१. ज़िन्दगीनामा

क बूढ़ा बामन और दूसरा बूढ़ा गंजा - दोनो सोशल मीडिया पे फेल थे और साहित्य जगत में चुके हुए कवि सिद्ध हो चुके थे, अब या तो ये नगदी पुरस्कार की राह देखते या कार से ला - ले जाने वाला कवि गोष्ठी का आयोजन तलाशते - बस दोनो को हाथ फेरने को कोई तो चाहिये था साथ ही जो इनके सड़े गले फ़ासीवादी विचारों को मंच पर बोल सकें या जाति, वर्ग संघर्ष के ख़िलाफ़ उगल सकें

 २. महानगर

 हानगर 
कोई गांव नहीं है कि
इसके हर नुक्कड़ पर हो
कोई पुराना पीपल या बरगद
जिसकी छांव के लिए

नहीं चुकाना पड़े किराया या किश्त।


३. अदृश्य कोरोना

  तुझे बाहर न देख कर ,
फिजाँ भी है खामोश ,ऐ इन्साँ
आये हैं परिन्दे बस्तिओं के करीब ,

तेरा दिल बहलाने को

दरणीय ज्योति खरे जी की कविता उनके ही स्वर में।  

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं।   

बुधवार, 13 मई 2020

८८ .........सामूहिक भाव संस्कार संगम -- सबरंग क्षितिज [ पुस्तक समीक्षा ]




'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' अनोखी पहल है या प्रयोग! अब इसका उत्तर तो हमारे पाठकगण ही दे सकते हैं। आज हम न ही कोई व्यंग्य लेकर आए हैं और न ही कथा क्योंकि 'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' का अस्तित्व में आना ही एक अनोखी कथा है! और इन सबसे इतर इस पुस्तक की समीक्षा आदरणीया रेणु बाला जी द्वारा किया जाना, तो आइए मिलवाते हैं आपको एक सशक्त लेखिका से 
        आदरणीया रेणु बाला जी


परिचय 
नाम  - रेणु  बाला
 शिक्षा - एम. ए .हिंदी 
सम्प्रति : गृहणी 
 कला और साहित्य प्रेमी 
 लेखन अनुभव -- जनवरी २०१७  से  शब्द नगरी से ऑनलाइन लेखन की शुरुआत ,  क्षितिज  और मीमांसा    ब्लॉग पर लेखन |

साहित्यिक गतिविधि : वरिष्ठ संपादक (बाल साहित्य) , अक्षय  गौरव पत्रिका 

  आदरणीया रेणु बाला जी द्वारा 
'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' पुस्तक की समीक्षा 


 साहित्य को समाज का दर्पण 
और व्यक्ति के विचारों की अभिव्यक्ति का    
सशक्त  माध्यम कहा गया है |यह शब्द , अर्थ और भावों की त्रिवेणी  है जो व्यक्ति 
को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर.  उसे दायित्वबोधकराते हुए,  उसकी रचनात्मक प्रतिभा को सार्थक करती है |


'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' पुस्तक के रचनाकार और उनकी रचनाएँ उनके ब्लॉग से । 

आदरणीय विश्वमोहन जी 



 मैं अयप्पन!
मणिकांता, शास्ता!
शिव का सुत हूँ मैं!
और मोहिनी है मेरी माँ!

आदरणीय रवींद्र सिंह यादव जी 



 माँ तो केवल माँ होती
ईश्वर का साक्षात रूप है माँ
जो हर हाल में साथ होती है
माँ की मुस्कुराहट क्या होती है

आदरणीया पम्मी सिंह 'तृप्ति' जी 

 और कुछ हो न हो पर..पहरेदारी के आड़े
इसकी, उसकी,सबकी टोपी खूब उछालें जायेंगे,

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा जी 

 उन्हीं, असीम सी, रिक्तताओं में,
हैं कुछ, ढ़ूंढ़ने को मजबूर,
मुट्ठी भर आसमां, कहीं गगन पे दूर,
या, अपना, कोई आकाश,
लिए, अंतहीन सा, इक तलाश!

आदरणीया अपर्णा वाजपई जी 



 अपनी नागरिकता अपने चेहरे पर लादे हुए,
एक कप चाय के साथ
बांट लिए थे उन्होंने
अपने अपने देश.

आदरणीया अनीता लागुरी 'अनु' जी  

 शहरों में कहाँ ख़ाली हो गए मज़दूरों के घर
बन बंजारा मज़दूर चल दिए
 अपने गाँव - घर
रास्ते की थकान को कम करने के लिए
 वह लिखता है ख़ुद पर एक कविता-

आदरणीया श्वेता सिन्हा जी 


 रथ पर सज्ज
साधते हो नित्य
दृश्यमान लक्षित सत्य, 
भेद्य,दुर्ग प्राचीर!!

आदरणीया नीतू रजनीश ठाकुर जी 


 तुकबंदी क्रियापद,
विशेषण व वर्तनी,
बिम्ब जो स्वतंत्र बने,
कथ्य से बचाइये।

आदरणीया सुधा सिंह 'व्याघ्र' जी  


 कर्म पथ पर ही थी निगाहें मेरी । 
मंजिल ही एक ध्येय, मेरी बनी थी। 


'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' पुस्तक से संबंधित कुछ अन्य अविस्मरणीय छायाचित्र 



   साहित्य परिषद और रुसी विज्ञान एवं सांस्कृतिक केन्द्र, नई दिल्ली के तत्त्वावधान में आयोजित 'दोहा गोष्ठी' में देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों के कर कमलों द्वारा हम दस ब्लॉगर साथियों (विश्वमोहन-वरिष्ठ संपादक, रवीन्द्र सिंह यादव-सूत्रधार, पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा-संपादक पद्य खंड, पम्मी सिंह 'तृप्ति'-अध्यक्षा:सलाहकार मंडल, सुधा सिंह 'व्याघ्र'-संपादक गद्य खंड, श्वेता सिन्हा -संपादक पद्य खंड, अपर्णा बाजपेयी-संपादक गद्य खंड, नीतू ठाकुर-प्रवक्ता एवं सदस्या:सलाहकार मंडल, ध्रुव सिंह 'एकलव्य'-संपादक गद्य खंड एवं प्रचार-प्रसार प्रभारी, अनीता लागुरी 'अनु'-सदस्या:सलाहकार मंडल ) की साझा पुस्तक 'सबरंग क्षितिज:विधा संगम' का लोकार्पण। 




"सबरंग क्षितिज" पुस्तक का राँची में विमोचन  
तस्वीर (आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा जी )


प्रसिद्ध साहित्यकार उषा किरण खान जी को भारत भारती सम्मान 2018 नवाजे जाने की हार्दिक बधाई! इसी हिंदी दिवस को हमारी ( दस साहित्यकारों की )साझा पुस्तक ' सबरंग क्षितिज' अपने हाथों में लिए उषा जी के संग एक अविस्मरणीय पल।

लोक संपर्क एवं संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय, पटना में हिन्दी दिवस समारोह
 पुस्तक “सबरंग क्षितिज विधा संगम” का हुआ लोकार्पण। 

पुस्तक “सबरंग क्षितिज विधा संगम” की कुछ रचनाओं का वाचन



उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
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स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


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आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं।   

बुधवार, 6 मई 2020

८७..... कल हमरा धमाकेदार चप्पल टूट गया रहा!




दरणीय कक्का,
चरणों में प्रणाम स्वीकारिए!

हाल-चाल कुशल-मंगल है। हस्तिनापुर की गर्मी बड़ा पसीना बहा रही है। वैसे गांधारी काकी कुंती बहन के साथ मज़े में हैं। परंतु चार दिन पहले गांधारी काकी को एकठो सपना आया रहा और ऊ रतिया में उठकर चिल्लाय पड़ीं! 
"गो कोरोना जो!"
"गो कोरोना जो!"
"का बताएं!" 
"हम तो चौंधिया के उठ बैठे!"
हमने काकी को बहुत समझाया कि हमें कउनो ख़तरा नाही है ऊ कोरोना से। हम तो मंत्री जी के बँगले पर हैं। परंतु ऊ नाही मानीं और कहने लगीं कि उन्हें पटना जाना है कउनो क़ीमत पर। हम भी का करते भागे ससुर हस्तिनापुर रेलवे स्टेशन की तरफ़ मुफ़त वाले टिकट के लिए जहाँ पहुँचकर पता चला कि टिकट कउनो मुफ़त-वुफत में नाही मिल रहा बल्कि वहाँ तो धृतराष्ट्र बाबा का फ़रमान रहा कि ससुर एक-एक प्रजा से चवन्नी तक वसूला जाए मगध पहुँचने पर मगधनरेश से। औरे यदि मगधनरेश कउनो प्रजा के टिकट का पइसा न चुका पाए तो उस प्रजा का कच्छा तक नीलाम कर दिया जाए हस्तिनापुर के करनॉट प्लेस पर शाम के पहरे! अंत में हमरे बहुत समझाने पर गांधारी काकी मान गईं और अपना डेरा-तम्बू अभी तक हस्तिनापुर के कन्हैयापुर में गाड़े पड़ी हैं।                   
               आगे ख़बर बड़ा दुखद है! कल हमरा धमाकेदार चप्पल टूट गया रहा। ससुर मोची की सघन तलाश हस्तिनापुर के जंगलों में ढिबरी-बत्ती लेकर की गई परंतु सब बेकार गया। अंत में ले-देके एकठो मरियल-सा मोची दिखाई दिया जो टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले विश्वविद्यालय के गेट पर बैठा रहा। ससुरा शक्ल से ही कम्युनिष्ट लग रहा था! 
और रह-रहकर समता मूलक समाज के नारे भी लगा रहा था। बात किया तो पता चला, जन्मेजय साहेब उसकी लड़ाई सत्तर बरस से कोरट मा लड़ रहे हैं। मसला कुछ ई रहा कि,

पिता धृतराष्ट्र पुत्रमोह में आकर पूरा हस्तिनापुर उजाड़ने पर तुले हुए हैं! बीच-बीच में वह मरियल मोची पुरानी बिसलेरी की बोतल से मुन्सिपलिटी के सौजन्य से लगाए गए टुटपुँजिया नल का पानी पी-पीकर मामा शकुनी को भी दस-पाँच गाली रशीद करता चला जा रहा था। 

     आइए! अब आपको सीधे ले चलते हैं हस्तिनापुर के झटपट दरबार में। बने रहिए मेरे साथ। 
नमस्कार! 
मैं राजा कवीश कुमार, 
       "सत्ता जब बहरी हो जाए तो भूखी-नंगी जनता का चिलचिलाती धूप में सड़कों पर इस महामारी के कठिन दौर में निकलना लाज़मी हो जाता है। जहाँ एक तरफ़ हस्तिनापुर राज्य में फल-सब्ज़ियों की दुकानें ठेलों,शॉपिंग मॉलों से उठकर मंदिरों और मस्ज़िदों में पलायन कर गईं! हमारे विशेष संवाददाता ने बताया है कि राष्ट्रहित में  फल और सब्ज़ियों की ख़रीद-फरोख़्त में अब ए.टी.एम. की जगह आधारकार्ड धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है और वहीं हस्तिनापुर के देशभक्त 'कोरोना प्यारी महामारी' के आतंक से सफ़ेदपोश मुँह पर  नक़ाब पहनकर राज्य के मैख़ानों में घूम रहे हैं! 

     उधर बाबा धृतराष्ट्र जहाँ एक तरफ़ इस विकट 'महामारी कोरोना प्यारी' की चोली खींच रहे हैं और अपनी भूखी-नंगी जनता को राजकोष ख़ाली हो जाने का हवाला देते नज़र आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ हस्तिनापुर का प्राचीन, भव्य-भवन मुगल-ए-आज़म द्वारा बनाए जाने की बात कह उसे ज़मीं-दोज़ कर नये मल्टीप्लेक्स राजभवन का निर्माण कराने का मसौदा बापू के तीनों बंदरों के बीच रखते नज़र आ रहे हैं। 

       चिंता की बात यह है कि, बापू के ये प्यारे तीनों बंदर आजकल थोबड़े की किताब पर मस्त हैं या तो ट्विटर हैंडल पर पस्त हैं। इतनी व्यस्तता के चलते ये बंदर बाबा धृतराष्ट्र के मसौदे की बारीकियाँ समझने में अक्षम से प्रतीत होते हैं जबकि परम-पूज्य बाबा धृतराष्ट्र ने अपने हर-फ़न-मौला ट्विटर हैंडल के माध्यम से बिना समय गँवाए साफ़तौर पर प्रजा को यह बताया है कि नया मल्टीप्लेक्स राजभवन को बनाने में बीस हज़ार करोड़ चिल्लर डॉलर राज्य के प्रजा की गाढ़ी कमाई का ख़र्च बैठेगा और दूसरी तरफ़ राजतंत्र के कुनबे के अर्धनग्न कर्मचारियों के विभिन्न मदों वाले भत्ते काटे जाएंगे। 

       प्रजा और राज्य का भार सँभालने वाले परम प्रतापी, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के सफ़ेदपोश वंशज सदृश,शास्त्री जी की खादी टोपी पहनने वाले और राज्य के भूखी-नंगी प्रजा को टोपी पहनाने वाले अतिविशिष्ट नागरिकों के वेतन-भत्ते में इज़ाफ़ा  किया जाएगा, और दुर्योधन के पाँच-सौ-दो पताका छाप जाँघिए का पैसा ग़रीब प्रजा के हित में डाला जाएगा!

 बाबा धृतराष्ट्र ने गोद लिए न्यूज़ चैनल को बताया-
"हम ग़रीब प्रजा का दर्द भली-भाँति समझते हैं इसलिए हमने इस 'महामारी कोरोना प्यारी' से निपटने का उपाय ढूँढ निकाला है!"
"अब हम रेड-जोन में आने वाले छोटे राज्यों में एक-एक तालाब खुदवाएंगे और उसमें गाँधी के डांडी-यात्रा वाला नमक स्वादानुसार मिलवाएंगे।"
"राज्य के प्रत्येक नागरिक को मिर्चा खाना मना होगा जिसके लिए हम 'रैपिड ऐक्शन बल' की दस हज़ार टुकड़ियाँ भेजेंगे ताकि पानी का समुचित बँटवारा किया जा सके!"
"अनाज से बनी दारू विदेशों में दवा के तौर पर भिजवाई जाएगी जिससे कि हमारे मित्र-राष्ट्रों की संख्या में दिनों-दिन इज़ाफ़ा हो सके।"

"अरे भइ!"
"चप्पल सिल गई कि पूरी महाभारत हमें यहीं सुना दोगे!"

"अरे साहब!"
"हम ग़रीब आपको क्या सुनाएँगे!"
"हम तो ई भूखमरी में अपने ही पेट की आवाज़ तक नहीं सुन पाते।"
"ससुर दिनभर गैस बना करती है!"
"लो बाबू जी!"
"हो गई तैयार तुम्हरी 'लोकतंत्र की चप्पल'!"
"घिसो इसे 'पाँच बरस' हस्तिनापुर के जनपथ पर!"      
      

                    'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३  में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।

'लोकतंत्र संवाद मंच' 
आप सभी पाठकों का स्वागत करता है। 

इस भाग में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं। 

१. मरहमी स्पर्श

मुझे जुगनुओं के
द्वीप की तरह

हर बार,

२.साबरमती आश्रम 

 युवाओं में उनके प्रति जो रोष है,
उसका भी जिक्र हुआ. गांधीजी के बारे में आज
की पीढ़ी कितना कम जानती है, सुनी-सुनाई बातों से वे अपनी राय बना लेते हैं. 

३.लॉकडाउन  

 कतई ऐसा न था, जैसा मैं आज हूँ,
जैसे पहेली, या मैं इक राज हूँ,
बिल्कुल, अलग सा,
तन्हा, सर्वथा लाॅकडाउन हूँ,
बुत इक अलग , मैं बन गया हूँ !

४. अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ

 गिरजा कुलश्रेष्ठ जी को उनके ब्लॉग के
माध्यम से कई साल पहले से जानती हूँ लेकिन उनसे पहली
मुलाकात इसी महीने फरवरी में इंदौर महिला साहित्य समागम में हुई।

५. कहानी : अनकहा दर्द

 निकेत स्वप्नलिखित सा
कहीं दूर क्षितिज में आकाश और धरा
को एक दूसरे में समाहित होते देख रहा था ..... 

६.आखिर कब तक ? (कहानी) 

 "पापा मैं दो घंटे में ज़रूर लौट आऊँगी। मेरी कुछ फ्रेंड्स मुझे
अलग से बर्थडे ट्रीट दे रही हैं। वहाँ से लौट कर मैं अपने घर के फंक्शन में शामिल हो जाऊँगी।
… प्लीज़ पापा!... मम्मी, पापा को बोलो न, मुझे परमिशन दे दें।" -धर्मिष्ठा ने आजिज़ी करते हुए कहा।

७.काला टीका,माँ और संयोग

 "अब मेरा बिटवा और अधिक मन लगाकर पढ़ेगा। पढ़-लिखकर गुरूजी बनेगा।"
"लेकिन अँग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय का शुल्क वहन करने की हमारी क्षमता नहीं है।

८.   मैं श्रमिक --- कविता --

 इंसान हूँ मेहनतकश मैं -
नहीं लाचार या बेबस मैं !
किस्मत हाथ की रेखा मेरी
रखता मुट्ठी में कस मैं !!

९. माँ और उसकी कोख 

 दादा की बेरंग सोच,
दादी के बेढंग बोल,
पिता की अनकही वेदना,
काकी की नष्ट होती चेतना,
को देखकर ;

साहित्य विशेष कोना 
'साहित्य विशेष कोना' के अंतर्गत हम आपको सदैव अनोखी प्रतिभा से मिलवाते हैं।

'सवा दो अक्षर'  

मैंने कहानियाँ ज़्यादा नहीं लिखी हैं।


आदरणीय ज्योति खरे जी की कविता उन्हीं के स्वर में 

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


आज्ञा दें!



आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं।   

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

८६.....'मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड'


 'मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' 
कक्का! ई शॉक डाउन में बड़ा कड़की मची पड़ी है औरे ख़ाली क़लम घिसाई से बात नहीं बन रही है परंतु आपकी तोंद तो दिनों-दिन आठवें आसमान की ओर बढ़ रही है, ई माजरा क्या है तनिक हमें भी तो सुनाओ! अरे कलुआ तू भी बड़ा नादान है! अरे, साहित्य भी एक बिजनेस है तोका नाहीं पता! ऊ कैसे कक्का? अरे टैम्फोस! बड़ा गदहा-घमोचर है रे तू! तनिक इधर ध्यान लगा, आज मैं तुझे अपने मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के बारे में विस्तार से बता रहा हूँ। तो सुन, पहले मैंने 'धमा-चौकड़ी कवितावली' का आविष्कार किया फिर पड़ोस वाली तितली बाई को अपना पर्सनल सेक्रेटरी नियुक्त किया। औरे ऊ 'तितलीबाई' ने दूसरे मुर्ग़ी मारक रचनाकारों को हमरी कंपनी तक ले आई फिर क्या था। ई पुराना गाना सुन!
एक तितली 
अनेक तितलियाँ 
एक मुर्ग़ी, 
अनेक मुर्ग़ियाँ 
सूरज एक 
तारे अनेक!

अब समझा घमोचर आदमी!
ही ही! कक्का तूहों गज़ब हो! अरे अभी और सुन! इस प्रकार मेरी कंपनी ने कविता सिखाओ और ख़ूब खिलाओ सेंटर का आविष्कार किया। मुर्ग़े/मुर्ग़ीयाँ जुड़ते गए और बिजनेस बनता गया। फिर क्या किया कक्का? फिर, अरे फिर क्या था मैंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई 'मुर्ग़ी कवितावली संग्रह' जिसमें सभी मुर्ग़ियों और मुर्ग़ों को प्रति मुर्ग़ी/मुर्ग़ा फ़ीस ३०० सौ रुपये रखा।  अब सोचो, यदि १५० मुर्ग़ी/मुर्ग़ा हमारी इस 'मुर्ग़ी कवितावली संग्रह' में आकर जुड़ गए तो, ऐसे समझो, 
1.  १५० गुणा मुर्ग़ी/मुर्ग़ा * ३००रुपये  =   45000 जमा ( शुद्ध-शुद्ध लाभ ) संपादक/प्रकाशक की ज़ेब में  
2. अब प्रकाशन के बाद प्रत्येक अतिउत्साही  मुर्ग़ी/मुर्ग़ा अपने प्रियजनों को अपनी रचना दिखाने और अपने लिए वाह-वाही लूटने हेतु कम से कम पुस्तक की तीन-चार प्रतियाँ तो ख़रीदेगा ही ख़रीदेगा सो हिसाब लगा कलुआ! जी कक्का अबहिने लो,
प्रति मुर्ग़ी/मुर्ग़ा द्वारा ख़रीदी जाने वाली 'मुर्ग़ी कवितावली संग्रह' की प्रतियाँ लगभग = 4 
 'मुर्ग़ी कवितावली संग्रह' की एक प्रति का मूल्य = 450 
'मुर्ग़ी कवितावली संग्रह' में शामिल कुल मुर्ग़ी/मुर्ग़ा= 150 , तो 
150 *4 = 600 ( कुल ख़रीदी जाने वाली प्रतियाँ )
कुल मूल्य की ख़रीदी जाने वाली प्रतियाँ = 600 *450 = 270,000( दो लाख सत्तर हज़ार रुपये
संपादक/प्रकाशक द्वारा पुस्तक छपवाने में ख़र्च रुपये = 8000 ( आठ हज़ार रुपये )
संपादक/प्रकाशक को होने वाला शुद्ध लाभ =  270,000 - 8000 = 262,000 (दो लाख बासठ हज़ार )

अब ई तो हुआ प्रति तीन महीने का लाभ क्योंकि मैं संग्रह के नाम पर प्रत्येक तीन महीने पर यह आयोजन करता रहता हूँ। 
अब आओ हमरी पाठशाला में सदस्यता शुल्क पर जो कि वार्षिक 2,000 रुपये/प्रति मुर्ग़ी/मुर्ग़ा रखे गए हैं तो हिसाब लगा कलुआ! जी कक्का अबही लो,
   
  300 सदस्य मुर्ग़ी/मुर्ग़ा तुम्हरी 'झटपट कविता सिखाओ पाठशाला' में सदस्य के तौर पर एडमिशन लिए तो 
कुल जमा हुआ = 300 * 2,000 = 600,000 ( छह लाख ) शुद्ध-शुद्ध लाभ ऊ पाठशाला के मालिक को जो झटपट कविता सिखाओ पाठशाला चला रहा है। अब बता कलुआ साहित्य है ना सदाबहार बिजनेस! क्यूँ, क्या कहता है। वाह कक्का, तुम तो 'साहित्य के आर्यभट्ट' निकले। परन्तु कक्का एक बात हमरे समझ में नाहीं आई कि इतने बुद्धिजीवी लेखक झटपट साहित्य पाठशाला के बातों में कइसे आ गए? औरे ऊ दूसरे अतिमहानबुद्धिजीवी लेखक अभी तक काहे चुप हैं? अरे कलुआ, तुम निकले एकदम बोकस!  कोरोनाकाल चल रहा है अतः सभी ने मुँह पर मास्क पहन रखा है। कहीं उन्हें संक्रमण ना हो जाए! अरे, आजकल के साहित्यकारों को क़िताबों पर कम विश्वास है। उन्हें लगता है कि क़िताब उन्हें ग़लत ज्ञान देगा और झमाझम साहित्यकार पाठशाला वाला गुरु ज़्यादा! औरे सभी को कलही सुमित्रा नंदन पंत औरे निराला जो बनना है! आज देख,हमरी 'मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' कैसे सीना तानकर थोबड़े की क़िताब और ब्लॉगजगत में अपना विजय पताका फहरा रही है। और वैसे भी आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अपने एक निबंध 'भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है' में लिखा है कि "हम भारत के लोग उसी ट्रेन की बोगियों के समान हैं जो बिना सोचे-समझे किसी भी इंजन के पीछे जुड़ जाते हैं चाहे वह ट्रेन खाई में ही क्यों ना जा रही हो!"    
वाह कक्का! वाह! अरे हुज़ूर वाह कक्का नहीं, वाह 'मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' का दिमाग़ बोलिए ! बाक़ी सब ठीक है!               

 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२  का परिणाम घोषित।
(निर्णायक मंडल में लोकतंत्र संवाद मंच का कोई भी सदस्य शामिल नहीं है।)  

सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की सूची दिए गये अंकों के साथ एवं उनके लिंक इस प्रकार हैं।   

क. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 

1 भूख अब पेट में नहीं रहती ( ६/१० अंक )

 हम विदेश देश तो नहीं गए न साहब
हम तो आपकी सेवा में थे
हम ड्राइवर थे, धोबी थे, रसोइया थे
हम घर की साफ़ सफाई वाले थे
सडकें, गटर साफ़ करने वाले थे।


 जयकार में उठी कलम,क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में,खतरनाक लिखेगी !


3. कविता...... निकल गयी  ( ५/१० अंक ) 

मस्ते!
नमस्ते!!
कहते हुए एक मीटर फासले से
निकल गयी कविता।

ख.लोकतंत्र संवाद मंच के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद ) 


 हर साहित्यकार की रचना एक सुशिक्षित , 
सुसंस्कृत और सभ्य समाज की रचना के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी होता है। 



 "एक ठो चिरैया रही, कुछ खास 
किसिम की रही. उसका पेट तो एक्कै ठो था 
लेकिन उसका मुंह था दो. समझ लो कि दोमुंही रही ऊ चिरैया... 
उस चिरैया का नाम था भारुंड..." रात को सोते समय दादी ने दो पोतों को किस्सा सुनाना शुरू किया। 


. एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए ( ५/१० अंक ) 

र दुकाँ बन्द है आंखों की  तरह  नशेबाज की
क्या एक भी दुकाँ नही थोड़े  से  कर्जे  के  लिए

ग.  पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)


 खुद़ा के वासते तनहा ही रह कर 
अमा इक चैन की बंशी बजा ले 


इस भाग की विशेष चयनित रचनाएं 
( बाल रचनाकार )

 १. एक दूजे का साथ देना होगा प्रांजुल कुमार/ बालकवि ( ३.५/१० अंक )  
 हम अब भी खुशियों को सजा सकते हैं,
उन टूटे खिलौनों को फिर बना सकते हैं |
इस शुभ कार्य को अब ही करना होगा,
इस भीड़ भाड़ की दुनियाँ में
एक दूजे का साथ जीवन भर देना होगा।


 खाओ सदा पौष्टिक खाना,
रहो तंदुरस्त और जिओ ज़माना। 

अंतिम परिणाम 
( नाम सुविधानुसार व्यवस्थित किये गये हैं। )
       1 भूख अब पेट में नहीं रहती ( आदरणीया प्रतिभा कटियार )

  ३. अभी हरगिज न सौपेंगे सफ़ीना----------( आदरणीय राजेश कुमार राय )

  
          नोट: प्रथम श्रेणी में रचनाओं की उत्कृष्टता के आधार पर दो रचनाएं चुनी गयीं हैं। इन सभी रचनाकारों को लोकतंत्र संवाद मंच की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं। आप सभी रचनाकारों को पुरस्कार स्वरूप पुस्तक साधारण डाक द्वारा शीघ्र-अतिशीघ्र प्रेषित कर दी जाएंगी। अतः पुरस्कार हेतु चयनित रचनाकार अपने डाक का पता पिनकोड सहित हमें निम्न पते dhruvsinghvns@gmail.com) ईमेल आईडी पर प्रेषित करें!  अन्य रचनाकार निराश न हों और साहित्य-धर्म को निरंतर आगे बढ़ाते रहें। हम आज से इस पुरस्कार योजना के अगले चरण यानी कि 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३  में प्रवेश कर रहे हैं। जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।  इस भाग में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं-
           

 काहे तू अम्माँ को झूठी बोले है..!"
"ई मुआँ कोरोना ,नासपीटा,करमजला आ गईल वरना काहे हम लोगन गांव जाते..।"
अम्मा जब बोल रही है, थोड़ी देर में गांव पहुँच जाएँगे तो के केरे तू लपड़झपर कर रही है।"


डाल- डाल पे फिरे मंडराती -
बनी उपवन की रानी तितली ;
हरेक फूल को चूमे जबरन -
तु करती मनमानी तितली !


 वात्सल्य में ऐसे विवश हुए
धृतराष्ट्र सब ताले तोड़ चले,
अवाक् ज़माना देख रहा
कैसे क़ानून मुरीद हुआ?


 सौंदर्यमयी स्रोतस्विनी 
उतर रही है
अल्हड़ चंचला-सी
पर्वत-श्रृंखला को 
छेड़ते श्वेत बादलों कीं 


र चूल्हा जलता कब है?
   पूछो उन  मजदूरों से .. ....
    आज बोल कर गया था 

आदरणीय हेमंत मोहन जी द्वारा एक कहानी का वाचन 

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
            टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आज्ञा दें!

 आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं