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सोमवार, 24 सितंबर 2018

६१ .........फिर वापस लौट हिंदी पखवाड़े पर लम्बी-चौड़ी फेंकें ।

कलुआ आज अपनी 'दी' के यहाँ हिंदी पखवाड़े का विसर्जन करने गया है और कक्का गणपति जी को ! अजब महिमा है हिंदी में 'दी' नया शब्द ! अंग्रेजी में 'दी' प्राचीनतम ! चलो कक्का 'ब्रो' ! तनिक हिंदी कविशाला में थोड़ा अंग्रेजी युक्त हिंदी बांच आयें। फिर वापस लौट हिंदी पखवाड़े पर लम्बी-चौड़ी फेंकें । ....... हा ..हा ....हा। काहे मज़ाक करते हो भाई !
  
'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  

                                                           चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........

     

 एक ही बहर और वज़न के 
अनुसार लिखे गए शेरों का समूह ग़ज़ल के रूप में जाना जाता है।

  उनको बतलाएँ, ज़मीं हड़ के उन्हें सहती है,
ज़िन्दा लाशों से ज़मीं, पाक नहीं रहती है.



बहुत हो चुका अब लगाओ निशाना 
मुझे अपने दुश्मन का डर देखना है

क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 


 राजीव गाँधी के राज में धर्म-विकृति 
अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी. 
सवर्ण हिन्दू निर्लज्ज होकर अपने दलित भाइयों की आहुति दे रहे थे.
शाह बानो प्रकरण में इस्लाम के अंतर्गत स्त्री-अधिकार की समृद्धि परंपरा की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं.

 अब नयी-नयी 

तरकीबों के साथ 

चिड़ियों को उड़ाने नहीं 

जान से मारने हेतु 

प्रकृति से उलझ बैठा है। 


उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।
टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें  !



'एकव्य' 


आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा।
सभी छायाचित्र : साभार  गूगल

सोमवार, 17 सितंबर 2018

६० ...........नटखट 'कलुआ' की कलम से

       
कक्का जी आजकल बहुत ज्यादा ही व्यस्त चल रहे हैं। अरे भई ! चुनाव नज़दीक है और रचनाओं का आर्डर भी धूम-धड़ाके से मिल रहा है चलो ! अच्छा ही हुआ बहरूपियों का अनावरण तो हुआ, नहीं तो पता ही नहीं चलता कि इस ब्लॉग जगत के समंदर में कौन सत्य की खोज में है और कौन लाल-पीली,हरी-नीली झंडे वाली पार्टियों की। 
तो अर्ज़ किया है 
हम तो बैठे थे सामने ही तेरे 
तू ही अंधा था सादगी में मेरे 
वक़्त आ गया अब, काहे को रुकूँ  
तू चिल्लाता जा ! पगला जो ठहरा 
वे आएंगे दौड़े-दौड़े, अंधे हैं ! बंदगी में मेरे 

                                                           -नटखट 'कलुआ' की कलम से    


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चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........

समलैंगिक प्रेम

 अपराध है सभ्य समाज में,
नथ और नाक के रिश्ते की तरह,
बड़ा गज़ब होता है,
एक होंठ पर दूसरे होंठ का बैठना,

 बदबूदार ख़ज़ानें
 माज़ी1 का था समंदर, देखा लगा के ग़ोता,
गहराइयों में उसके, ताबूत कुछ पड़े थे,
कहते हैं लोग जिनको, संदूकें अज़मतों2 की,
बेआब जिनके अंदर, रूहानी मोतियाँ थीं.


कौन अब वादा वफ़ा करता है
  हो मुहब्बत के हो नफ़्रत की कशिश
जी को मौला ही अता करता है

 वक्त-वक्त की बात
 चौकीदार अपना, दरोगा अपना, पंच-सरपंच सब अपने
बस ..
तू ... लूट .... लूट .... लूट .....

लूट .. लूट के लूट ... फिर लूट के लूट ....

लंदन जा .. न्यूयार्क जा .. मेलबोर्न जा .. पेरिस जा
कहीं भी जा के बैठ ...

 दो क्षणिकाऐं
 जनता कहती

सता रही है

महँगाई की मार,

नेताओं को

पहनाओ अब

सूखे पत्तों के हार।

 हिंदी दिवस
 कितनी नक़ल करेंगे, कितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ की, जीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों का, दामन वो थाम लेंगे,
हिंदी दिवस पे ही बस, हिंदी का नाम लेंगे.



उद्घोषणा 
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सोमवार, 10 सितंबर 2018

५९...........''मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य''

''मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य''
हिंदी पखवाड़े पर कलुआ और हमारे कक्का जी का विशेष संवाद 

१. मन की अतल गहराईयों से निकले विचार और इन विचारों को मथने की मूलभूत आवश्यकता 
( कम से कम कुछ दिन तो लगेंगे ही निसंदेह, क्यों कक्का जी ! )
↓↓

२. विषयवस्तु नितांत आवश्यक ! एक मौलिक रचना की विशिष्ट माँग। 
( मानता हूँ शब्द पेटेंट नहीं होते और विचार भी ! एक ही विषय पर कई विचार हो सकते हैं। )

उदाहरण  
मूल रचना : हो गई है पीर ,पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। 

हमारा आज का दैनिक सृजन : हो गई है दर्द, हिमालय-सी पिघलनी चाहिए ,इस हिमांचल से कोई यमुना निकलनी चाहिए।  ( आदरणीय कक्का जी 'कलमकार' ) 

३. विषय वस्तु : घर में बैठकर कश्मीर के बारे में लिखना और अखबारों में पढ़कर रोहिंग्या से निर्वासित लोगों के विषय में मुग़ालता पालना ,रेडीमेड किसानों के दर्द का एहसास होना ,बेकार में झोपड़पट्टी वाले बच्चों पर दया दिखाना कि ओह कितनी गरीबी है ( भले कभी उन लोगों के बीच बैठकर भोजन किया हो या नहीं परन्तु अखबारों को देखकर उनके दर्द का अनुभव हमारे आज के रचनाकार बख़ूबी लगा सकते हैं और लगाए भी क्यों न ! नासा वालों ने अपने सारे कीमती उपग्रह आज के रचनाकारों को जो दे रक्खा है ! )
उदाहरण 
मुंशी जी,  राहुल सांकृत्यायन, निराला जी, दुष्यंत जी,फणीश्वरनाथ रेणु जी, बाबा नागार्जुन ,महादेवी वर्मा जी न जाने ऐसे ही कितने महान साहित्यकारों ने गली मोहल्ले ,देश-विदेश,झोपड़-पट्टी ,किसानों के खेतों में उनके साथ बैठकर उनकी सूखी रोटी और चटनी का स्वाद चखा और उनके दर्द को समझा तब उनके बारे में अथवा उनके सम्बन्ध में अनेकों रचनाएं कीं जो वर्तमान की दृष्टि से भी सार्थक हैं। क्योंकि इनकी रचनाएं सत्य अनुभव पर आधारित होती थीं और इसीलिए रोज की रोज एक रचना लिखी जाए ऐसा संभव न था !
तर्क :  इससे सिद्ध होता है कि रोज या दो दिन पर निश्चय ही लिखी जा रही रचनाएं न ही गंभीर विचारों पर गहन मंथन का परिणाम है और न ही मौलिक सृजन ! यह मात्र शब्दों की हेरा-फेरी है। 
उद्देश्य : इनका केवल एक मात्र उद्देश्य अपने ब्लॉग विशेष के पाठक संख्या को बढ़ाना और ब्लॉगजगत में निरंतर बने रहना है। 

४. आज के कलमकारों का किसी विशेष राजनैतिक पार्टी अथवा किसी विशेष विचार धारा जो गलत है या सही बिना सोचे-समझे उनके पक्ष में अथवा विपक्ष में बड़े-बड़े महाकाव्य लिखना !
उदहारण 
महान भारत बनाना है ! 
फला पार्टी को जिताना है। 
(कक्का जी की कलम से)  

शिक़वे किये ,गिले किए 
तेरी रहनुमाई में ऐ ज़ालिम 
तू है की तेरी आँखों में 
शर्म का कतरा नहीं है। 
( कलुआ की कलम से ) 
  

तर्क : ऐसा नहीं है कि कोई भी रचनाकार स्वतंत्र लेखन नहीं चाहता परन्तु उसके चाहने न चाहने से क्या होता है उसकी भी एक मूलभूत विवशता है, वर्तमान में पाठकों की संख्या और उसके ब्लॉग तक पाठकों की पहुँच। जिसके प्रलोभनवश उक्त रचनाकार कुछ तथाकथित सामुदायिक मंचो के संचालकों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है जिसका परिणाम कुछ रचनाकारों का रोज का रोज बिना मंथन और चिंतन के लेखन जारी है इन्हीं की आड़ में कई एजेंडे वो चाहे राजनैतिक हों अथवा सामुदायिक सफल होते नजर आते हैं। 

परिणाम : नए लेखकों के मौलिक विचारों में कमी,उन्मादी लेखन,किसी जाति-धर्म विशेष को ही साहित्यजगत का दायरा मानना और उनके स्वतंत्र लेखन में बाधा जिसे वह समझने में पूर्णतः अक्षम हो चुका है। जाने-अंजाने ही इस लिखने की होड़ में दूसरे लेखकों की मौलिक रचना अथवा उसकी नकल करने में अपनी पूरी बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य एक साथ झोंक रहा है। और यही नहीं इन बिना उद्देश्यपरक रचनाओं की भीड़ में कुछ मौलिक और सार्थक रचना लिखने वाले लेखक दबकर रह गए हैं। इसके दीर्घकालिक परिणाम आपसबको भविष्य में स्वतः ही देखने को मिलेंगे। 

साहित्य आलोचकों की रिक्तता : क्यों रे कलुआ आजकल बड़ा सुपरमैन बना फिरता है हमेशा उड़ता ही रहेगा ! क्यूँ तुझे जमीन पर नहीं उतरना कभी जो घूम-घूमकर लोगों के पके-पकाए दूध में जोरन डालता फिरता है। यदि तुझे साहित्य जगत में रहना है तो एक उसूल रट ले ''तू मेरी पीठ थपथपा और मैं तेरी" बाकी सब 'मोहनलाल' पर छोड़ दे ! ( कक्का जी की कलम से )    

परिणाम :  अच्छे और बुद्धिजीवी साहित्यकारों का ब्लॉग जगत से पलायन ( जो कभी एक ब्लॉगर होना सम्मान का विषय समझते थे ) ! जीवित साहित्य मंचों पर ब्लॉग जगत में रोज-रोज लेखन के मौलिक कारणों पर विचार-गोष्ठियां आयोजित होना।

कुछ बुद्धिमान लेखकजनों का अतुलनीय सहयोग : ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्य के इस गिरते स्तर के लिए केवल छद्दम रचना करने वाले ही ज़िम्मेदार हैं। इसकी जवाबदेही हमसभी को तय करनी पड़ेगी ! 

नवांकुर लेखकों को इनसे बचना होगा ! 
वाह ! बहुत सुन्दर ! ( बिना पढ़े व रचना का सही मूल्याङ्कन किये बिना टिप्पणी देने वालों से )
यदि पाठक रचना पढ़ता है और कोई टिप्पणी नहीं देता यहाँ तक वह पाठक उस रचनाकार के प्रति न्याय करता है वजाय उस रचनाकार को चने के झाड़ पर चढ़ाने के !

निष्कर्ष : हमारे महान पूर्वज साहित्यकारों ने तो अपना धर्म निभा दिया अपनी अनमोल विरासत हमें सौंपकर ! सोचना हमें है कि हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ी के लिए क्या मौलिक चिंतन छोड़कर जायेंगे ! 

तो आइये ! अपनी भाषा व साहित्य के उन्नति के लिए मिल-जुलकर साथ चलें ! याद रक्खें ! हमारा समर्पण साहित्य के उत्थान हेतु होना चाहिए न कि किसी रचनाकार,राजनैतिक अथवा सामुदायिक संगठन के प्रति।   

प्रस्तुत विचार मेरे मौलिक विचार हैं इससे कोई दूसरा सहमत हो यह आवश्यक नहीं ! आपसभी अपने-अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र हैं। ( प्रार्थी : 'कलुआ' )
  
  'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस विशेष कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है। 

हमारे आज के अतिथि रचनाकार जिनकी इस विशेष रचना के आह्वाहन पर इस वैचारिक मंथन भरे अंक का सृजन संभव हो सका। 
आदरणीय "विश्वमोहन'' जी  

'लोकतंत्र' संवाद मंच साहित्य जगत के ऐसे तमाम सजग व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन करता है।  

किसी का जोरन,
किसी का दूध.
मटकी मेरी, 
दही विशुध.

छंद किसी का, 
बंध है मेरा.
'प्लेगरिज्म'
'पायरेसी' का  फेरा.

चौर-चातुर्य, 
रचना उद्योग.
पूरक, कुम्भक, 
रेचक योग.


थोड़ी उसकी पट, 
थोड़ी इसकी  चित.
क्यों लिखे, 
भला, मौलिक गीत!

गर गए पकड़े,
मची हाहाकार,
विरोध में वापस,
पुरस्कार!

कथ्य आयात, 
पात्र निर्यात
'साहित्यिक-डाकजनी' 
सौगात!!!
                
                       -आदरणीय ''विश्वमोहन'' जी की कलम से  
     
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सोमवार, 3 सितंबर 2018

५८..........मितरों के देश में ...




आज आदरणीय काजल कुमार जी के पोस्ट मितरों के देश में से यह विचार मेरे मन में आया कि सचमुच मितरों के देश में ख़तरे बहुत हैं ! इस विचार मंथन से निकलकर आया 'मितरोफोबिया' ! बाकी का आप स्वयं ही समझ लीजिए मुझे तनिक जल्दी है गाड़ी का पेट्रोल ख़त्म हो गया है और चावल भी कुछ अधपका-सा लग रहा है जरा एल.पी.जी. तो भरवा लूँ कहीं उसके दाम रातों-रात पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर न पसर जाए ! मेरी धर्मपत्नी  भी बड़ी गुस्सैल है पता नहीं कब इन बातों को लेकर धरना देना प्रारम्भ कर दे। तो चलिए ! चलते हैं मितरों के देश में थोड़ा खतरा उठाने .......       


आदरणीय काजल कुमार जी  'चित्रांकन' 
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इस कड़ी में सार्थक और साहित्यिक रचनाओं का समावेश है। 



चाय की चुस्कियों में 

 जंगलो की सरसराहट है। 
वो चिंतित और बैचैन है 
अपनी "ड्राइंग रूम" में की अब पलाश की ताप से

 बुझते जलते अदृश्य आग्नेय - 
कण, कभी तुम्हारे मध्य 
कभी मेरे अंदर। 
जीवन के 

 साब जी
उसकी मंशा ठीक नहीं है ...
कहो तो -
गिरफ्तार कर लूँ ?

 निकाल तेरे तरकश में 

जितने तीर हैं 

हमारी क़लम तेरे लिये

 चमचमाती शमशीर है 

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सोमवार, 27 अगस्त 2018

५७......एक पवित्र और प्यारा बंधन !

स्नेह के धागों में बंधा प्यार का बंधन ! रक्षा करने का वचन अपनी बहना का हर संकट की घड़ी में ! 
एक पवित्र और प्यारा बंधन !

आइये ! आगाज़ करते हैं आज की प्रस्तुति का हमारी 'अतिथि रचनाकार' 
आदरणीया 'रेणुबाला' जी की एक प्यारी रचना से 


 जग में हर वस्तु का मोल -
 पर भैया तुम हो अनमोल  !

दर-दर पर शीश झुका करके -
 मांगा था तुझे विधाता से -
तुम सा कहाँ कोई  स्नेही-  सखा मेरा -
मेरा  तो  गाँव तेरे दम से ;
 सुख- दुःख  साझा  कर लूं अपना  
रख  दूं  तेरे  आगे मन  खोल !!

बचपन में जब तुमने गिर -गिर -
 ये ऊँगली पकड चलना सीखा ,
 नीलगगन का चंदा भी -
था तेरे आगे बड़ा फीका ;
 धरती पर मानो देव  उतरे -
 सुनकर तेरे तुतलाते बोल !!

 बाबुल की बैठक की तुम शोभा -
 तुमसे  माँ का उजला अंगना ;
 भाभी की मांग सजी तुमसे -
 हो तुम उसकी प्रीत का गहना ;
तुमसे बढ़ ना कोई धन मेरा -
 चाहे जग दे तराजू  तोल !! 

लेकर राखी के दो तार -
 आऊँ स्नेह का पर्व मनाने ,
 घूमूं बचपन की गलियों में -
 पीहर  देखूं तेरे बहाने ;
 बहना  मांगे प्यार तेरा बस -
 ना मांगे राखी का मोल !!
जग में हर वस्तु का मोल -
 पर भैया तुम हो अनमोल  !!!!!!!!!!!

-आदरणीया रेणुबाला जी 

पल -पल खुशियाँ ढूँढ रहा है 
जीवन यह अनमोल


 इतना गुमसुम रहता है क्या
तुझको भी मरज़े उल्फ़त है

 नए सृजन की आस लिए 
पुराना सब तोड़ आया हूँ
पत्थरों के ढेर पे बैठा हूँ 
तराशने के औज़ार छोड़ आया हूँ


भेड़िया 

मेमने से 

कह रहा है 

आप मेरी शरण में 

महफ़ूज़ हैं, सलामत हैं 

 'प्रेय' पथ की मेरी
प्रेयसी हो तुम।
आकुल आतुर
मिलने को तुमसे
पथिक हूँ तुम्हारा।


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सोमवार, 20 अगस्त 2018

५६ ..अब इ बतावा एमना से शीर्षकवा कउने क याद रही ?

का बात है रे कलुआ ! आजकल भीतर ही भीतर पकौड़े छान रहा है घर से तो निकलता ही नाही है ! का कउनो विशेष आयोजन है का तेरे इहाँ ? अरे का बताईं कक्का आजकल ब्लॉग जगत में कविता अउर कहानी लिखो कम्पटीशन तैर रहा है अउर हम ही फिस्सडी होत हैं हमेशा ! कउनो सौ और कउनो दुई सौ अउर कहीं-कहीं तो हजार ! सभी बड़े भावुक मन वाले मनई हुई गवे हैं लागत हैं दुष्यंत अउर निराला जी पीछे छूट जहियें इ पकड़म-पकड़ाई में। एक दिन में कम से कम तीन रचनाएं और सप्ताह के बेर बिसवत-बिसवत इक्कीस रचनाएं ! तोहि अंदाजा लगावा ! महीना भर में सतक पार ! अब इ बतावा एमना से शीर्षकवा कउने क याद रही ? अउर सच त बोले क हिम्मत कउनो महाशय में बा नाही ! पर का करि ब्लॉगिंग त करहि के हौ सो हमउ झंडा गाड़ेका प्रयास में लागल हई ! कुछ नाही त तीस त पार कराही देब महीने के अंत में ! इ त हौ आजकल के कवियन क हालत !अउर त बाकी सब ठीक बा। 
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इस कड़ी में सार्थक और साहित्यिक रचनाओं का समावेश है। 


 गर हुस्न को बुतों में उतारा तो ठीक था,
पत्थर में आस्था को तराशा तो ठीक था.

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है 
अनुभव से सब कुछ पाया है
अनुभूति जितनी गहरी हो 
ठहरी उतनी ही काया है

 "ये शोख़ी यह अदा यह बाँकपन यह
सुरो संगीत ये मीठे तराने
करेगा क्या तू इतनी इश्रतों का
मेरे हिस्से की मुझको दे ज़माने"


  इक बड़ाकवि अटल नामक इस जगत से टल गया ।। 

 एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले 
ज़माने में वो नेताओं की जमात में एक 
ऐसे नेता थे जिन्हें अपने अनुयायियों का ही नहीं, 
अपितु अपने विरोधियों का भी प्यार और सम्मान मिला था.

 दीमक चाट गयी
डगमगाया है 
काग़ज़ से 


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सोमवार, 6 अगस्त 2018

५५ ...........क्या रखा है टाइटल में !

हम पत्थरों पर सिर झुकाते चले,कुछ करम थे हमारे 
पाखंडी हैं हम कहते-कहते,वे बताते चले। 
मरने लगे अब शर्म से,पी लो गंगा जल थोड़ा !
गटर के पानी को भी शुद्ध अमृत-सा बनाते चले। 

                       मानव तो मानव ही है चाहे वह इस देश का हो अथवा दूसरे देश का। तनिक विचार कीजिए यदि सम्पूर्ण विश्व ही हमारा देश होता और हम इस सम्पूर्ण विश्व के वासी ! न वीज़ा  और न ही कोई पासपोर्ट। सभी स्थानों पर स्वतंत्र रूप से विचरण करने की स्वतंत्रता। तब क्या भारत और क्या अमेरिका, न ही कोई लंदन। न ही कोई संसाधनों की ख़ातिर  युद्ध करता और न ही गज़-भर ज़मीन  के लिए सीमाओं पर रक्तपात होता। हमारे चाचा अमेरिका में और मौसी लन्दन में। न ही कोई ज़ात-पात और न ही कोई धर्म ! न ही हम सिंह होते और न ही आप बिलारी और कोई बादव नहीं और न ही कोई मौतम। न ही वो मंदिर में समय बिताते और न हम मस्जिद में। सब मिलकर विकास और प्रगति की बातें करते। डिनर भी साथ-साथ और लंच भी दबा के। उधर वाइन की बोतल खुलती, इधर ठंडी-ठंडी लस्सी बंटती। गाहे-ब-गाहे कतरबाल और सुप्त जी, जान-लगान, सत्तू-खैयर भी साथ हो ही लेते ! सभी केवल नाम से सम्बोधित किए जाते। अरे हाँ ! टाइटल के एवज में "जी" अवश्य लगा सकते थे। न कोई राजा और न ही कोई प्रजा, सभी समान। तब सच्चे अर्थों में हम बराबरी की बातें करते। एक देश सर्वश्रेष्ठ देश ! क्यों सही है न ! चलिए यदि मेरा सोचना ग़लत भी है तो क्या करना। बझे रहिए इसी "टाइटल" के मायाजाल में और मिथ्या ही रट लगाए रहिए। एक भारत, सर्वश्रेष्ठ भारत ! मेरा क्या है, कल फिर मज़दूरी पर जाना है और शाम को कढ़ी-चावल खाना है तथा उसी फटी टाट पर टाँग पसारकर सोना है। हा .... हा। ....... क्या रखा है टाइटल में !  
'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  
 
 
चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........


तुम संग..
 नभ अम्बर के पृष्ठ भाग पर, सात वर्ण का विक्षेपन हो। 
हरयाली का हरा आवरण, और फूलों का हो अभिनन्दन,

 "षड़यंत्र"
  बगल के कमरे में बैठी निम्मी सब
सुन रही थी और यह सब सुनकर वह सावधान
हो गयी और अकस्मात उसने अपनी अटैची तैयार की 

द्वंद की पीड़ा 
व्यथित हूँ
अंतर्मन में झेल रही हूँ।

 दावत ए फ़िक्र1
 सोचो सीधे शरीफ़ इंसानों!
शख़्सी२ आज़ादी ए तबअ३ क्या है?
यह तुम्हारी अजीब फ़ितरत है,
अपने अंदर के नर्म गोशों में,

 सोच सकते हैं पा नहीं सकते
 ऐसी कुछ शै हैं जैसे तू है जिन्हें
सोच सकते हैं पा नहीं सकते

 मित्र मिला हो तो बताना
 दुनिया में सबसे ज्यादा अजमाया जाने
वाला नुस्खा है – मित्रता। एलोपेथी, आयुर्वेद,
होम्योपेथी, झाड़-फूंक आदि-आदि के इतर एक
नुस्खा जरूर आजमाया जाता है वह है विश्वास का नुस्खा। हर आदमी कहता है 

मैं. .... 
 कुछ सिल्वटे चादर की ना जाने क्यों...!!
उन्हें छूने को हाथ बढ़ाया
पर कांप उठा....!

निर्बल चितवन सारा..!!

 महज़ ख्वाब ही तो था
 पढ़ के बनना था उसे भी डॉक्टर,
क्या हुआ जो बिखर गया
परिस्थितयों की चोट से
महज़ ख्वाब ही तो था...


 चल बैजयंती कंधे पर ....
 ले चल बैजयंती कन्धों पर
अपनी हार देखता हूँ -
जीते नेता हारी जनता

मैं हर-बार देखता हूँ 

बंदी,
ये पहरेदार जो सो रहे हैं,
दरअसल सो नहीं रहे हैं, 
सोने का नाटक कर रहे हैं-


 नील गगन में उड़ने वाले -
ओ ! नटखट आवारा बादल ,
मुक्त हवा संग मस्त हो तुम-
किसकी धुन में पड़े निकल !

 भानू पंडितजीने काले बादलों को देखा, 
अपनी उंगलियों पर कुछ गणना की, पत्रा के 
दो-चार पन्ने पलटे, फिर इत्मीनान से अपने 
मुहं में गुटके की एक बड़ी डोज़ डाल कर बोले 

 मानवी-झुण्ड 
अपने स्वार्थों की रक्षार्थ 
गूढ़ मंसूबे लक्षित रख 
एक संघ का 
निर्माण करता है 


उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
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धन्यवाद।
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