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सोमवार, 18 जून 2018

४९ ...............कक्का जी का नुस्ख़ा !

आजकल कक्का जी लेखनी में कम, व्हाट्सअप पर ज्यादा व्यस्त हैं। अभी कल ही की बात ले लीजिए ,कवि संगोष्ठी का आयोजन हमारे नवाबों के शहर लख़नऊ के कैसरबाग प्रांगण में किया गया। बड़े-बड़े नामी-ग्रामी कवियों का जमावड़ा मंच पर शंखनाद करता नजर आ रहा था। गाये-बघाये मुझे भी उन धुरंधरों के बीच एक आसन मिल ही गया और संयोग से बगल में कक्का जी भी विराजमान थे। परन्तु आज कक्का जी कवि संगोष्ठी में बैठे अवश्य थे परन्तु उनका वो दिखावटी निश्च्छल मन कहीं और मन मार रहा था। तभी एक आवाज हुई, टुन-टुन ,टिन-टिन ! मैं जरा देर के लिए सकपका गया। मेरा सारा ध्यान कक्का जी के हाथ में नज़ाकत से पड़े उस दूरसंचार यंत्र पर गया। अरे वही ! ''कर लो दुनिया मुट्ठी में और आप बैठो छुट्टी पे'' ! मैंने कक्का जी से पूछा -अरे कक्का जी ! कहाँ लगे पड़े हुए हो ? कक्का जी ने हिमालय वाले बाबा के टूथपेस्ट के सहयोग से अपनी चमकती हुई बत्तीसी हमें अनायास ही दिखा दी और मुँह निपोर कर पुनः पूरे मनोयोग से अपने रचनात्मकता में तल्लीन हो गए। तभी मेरे टुटपुँजिया फोन के फेस पर एक तमतमाता और घनघनाता सन्देश तैरता हुआ,हाथ जोड़े खड़ा था।  मैं भी कौतुहलवश उस सन्देश का अनावरण करने में जुट गया। सन्देश की तो पूछिए मत ! सन्देश कम, किसी राजनीतिक पार्टी का एजेंडा ज्यादा प्रतीत हो रहा था जिसमें उस पार्टी के द्वारा किये गए कामों की उपलब्धियों का ब्यौरा, चलचित्रों और कक्का जी के साहित्यिक धरपकड़ रचनाओं के साथ बड़ी ही सावधानी से अलंकृत किया गया था। यकीन मानिए, मैं तो दंग रह गया। कवि संगोष्ठी जैसे ही खत्म हुई मैं और कक्का जी गृह प्रस्थान को साथ हो लिए। अपने इस मोबाइल वाले वाट्सअप मैसेज के पीछे छिपे रहस्य को जानने की बड़ी उत्सुकता हो रही थी परन्तु एक झेंपने की मनोस्थिति न जाने क्यों इस उत्साह को दबाने में सफल हो रही थी। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने एक सनसनाता प्रश्न कक्का जी पर दाग दिया। अरे कक्का जी ! तनिक ई बताइये, ई कवि संगोष्ठी के दौरान आपने कौन सा रंगीला मैसेज भेज दिया था। ससुरके समझ ही नही पाए ई है का। एक तरफ तुम्हरा कविता और दूसरी तरफ उ चमचमाती राजनीतिक पार्टी का लाल-पीयर झंडा ! का था ई,तनिक एक्सप्लेन इट !
अरे कलुआ ! कछु नहीं, तैं पगला गए हो। जानता नहीं चुनावोत्सव आने वाला है अउर यही तो मौसम है हमारे इस कलम की स्याही के दाम निकालने का। और वैसे भी हमें करना ही क्या रहता है ये सब तो व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी का कमाल है बाकी सब बेहाल हैं। उधर से पार्टी का बना-बनाया पोस्टर अथवा वीडियो हमें प्रेषित कर दिया जाता है और हम उस चलचित्र अथवा चित्र के नीचे बढ़ा-चढ़ाकर अपने कलम का कमाल दिखा देते हैं बस। 'हर्रे लगे न फिटकरी ,और रंग भी चोखा' और मौके पर, ले चौके पर चौका। अरे कलुआ ! इ चुनाव का अचूक हथकंडा है। कुलहिन काला, बाकी सब सफेद ! हमरा का जाता है ? बस बनावटी शब्द न ,अउर इ बता !मुफत की कमाई किसे काटती है ? बस हमें उ राजनीतिक पार्टी का चुनावी एजेंडा ही तो अपने वाट्सअप ग्रुप में घुमाना है। इसमें हमरा का दोष ? अरे ! इ काम तो आजकल ब्लॉगजगत में अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे मुँहबोले कवि ,लेखक और व्यंगकार तक करने में लगे पड़े हैं और फिर हम तो केवल इ पार्टीव्यंजन वाट्सअप पर ही परोस रहे हैं। मैंने कक्का जी को डांटते हुए- अरे ! का बात करते हैं कक्का जी ,आप तो पूरे शेठिया गए हैं। तनिक इ बताइये।
 घोटाला कौन करता है ?
कक्का जी - उ राजनीतिक पार्टी का मंत्री।
कलुआ -जनता के प्रति जवाबदेही किसकी ?
कक्का जी - उ पार्टी के मंत्री की।
कलुआ - तो संसद में कौन बैठा है ?
कक्का जी - उ पार्टी का सदस्य।
कलुआ - तो फिर उसके द्वारा किये गए उचित अथवा अनुचित कार्यों का ब्यौरा आप काहे देंगे ?
कक्का जी ( समझाते हुए ) - अरे कलुआ ! तू नाहक ही गुस्सा होता है अरे इसमें हमरी का गलती ! हमें तो ये वाट्सअप मैसेज और ब्लॉगों पर अमुक पार्टी के पक्ष में लेख अथवा कविता लिखने का पइसा मिलता है अउर का ! इसमें  हर्ज़ ही का है। खैर बात करते-करते कक्का जी का घर कब आ गया पता ही नहीं चला। कक्का जी को उनके गेट तक छोड़कर मैं गुस्से में फनफनाते हुए वहाँ से जाने लगा। गोमती के तट पर बने ऊपरगामी पुल पर जैसे ही कदम रखा तभी मेरा वो टच-वच वाले स्क्रीन वाला फोन अपने पूरे दम-खम से मेरे पैंट के साइड वाले जेब को फाड़ने लगा। मैंने फोन झट से निकाला और देखा वाट्सअप यूनिवर्सिटी से एक सन्देश मेरी ओर लपलपा रहा था। मैंने सन्देश का अनावरण किया तो देखा कक्का जी का वो राजनीतिक पार्टी के एजेंडे से लबालब भरा सन्देश उनकी स्वरचित रचना के साथ मुझे मुँह चिढ़ा रहा था। मैं थोड़ा मुस्कराया और बोला - इ कक्का जी ! अबहीं न सुधरी। कहते हुए मैंने अपना टचस्क्रीन वाला वो जंतर-मंतर उसी गोमती में विसर्जित कर दिया और अपने कर्म का निर्वाह करते हुए अपने निवास स्थान की ओर चल दिया।   
आदरणीया 'शशि' पुरवार जी
'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला की इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है। 

                                                                      परिचय  

नाम : आदरणीया 'शशि' पुरवार   ( महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी द्वारा सम्मानित १०० महिला अचीवर्स सम्मान,२०१६

जन्म तिथि : 22 जून 1973 ई0 ।
जन्म स्थान : इंदौर, मध्य प्रदेश ।
शिक्षा : स्नातक- बी.एस-सी.विज्ञान।
स्नातकोत्तर- एम.ए.राजनीति, ( देवीअहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर ), तीन वर्षीय हानर्स डिप्लोमा इन कम्प्यूटर साफ्टवेयर एंड मैनेजमेंट,

भाषा ज्ञान - हिंदी, मराठी, अंग्रेजी

सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन 

लेखन विधाएँ :
देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में आलेख, व्यंग्य, गीत नवगीत,
ग़ज़ल, दोहे, कुण्डलियाँ, छंदमुक्त कविताएँ, तांका, चोका, माहिया, हाइकु , आलेख,
लघुकथा, कविताओं का सतत् लेखन एवं प्रकाशन। 

 प्रमुख प्रकाशन :
सार्थक पत्रिका, दैनिक भास्कर, बाबूजी का भारत मित्र, अपना भारत , समाज कल्याण
पत्रिका, हिमप्रस्थ, साहित्य दस्तक,  लोकमत समाचार , नारी जागृति , गीत गागर,
 वीणा, अविराम, हाइकु लोक, अभिनव इमरोज, दैनिक जागरण, निर्झर टाइम्स, दरभंगा
टाइम्स, रूबरू दुनियां, उदंती, उत्तर प्रदेश साहित्य संस्थान पत्रिका, भारत भारती - ऑस्ट्रेलिया
हरिगंधा, हिंदी चेतना, युग गरिमा, उत्कर्ष प्रकाशन, मधुरिमा, विधान केसरी, वृत
मित्र, उत्तरायण, जागरूक मेल समाचार पत्र झाँसी,  सरिता, अट्ठहास पत्रिका,
शब्द सरिता, नेवा- नेपाल की पत्रिका, सरस्वती सुमन, उर्वशी, शब्द सरिता,
हस्ताक्षर, मधुराक्षर, सृजनलोक, हिंदी हाइकु, अनुभूति, त्रिवेणी, कवि मन,
परिकल्पना, प्रयास पत्रिका, सहज साहित्य, साहित्य शिल्पी, गद्य कोष, कविता
कोष, साहित्य रागिनी, युवा सुघोष, भारत मित्र, .........इत्यादि।   अन्तर्जाल पत्रिकाओं में भी
रचनाएँ प्रकाशित। ब्लॉग सपने नाम से अंतरजाल पर लेखन।

समवेत संकलन : जिनमें रचनाएँ  प्रकाशित हुईं -
 1. 'नारी विमर्श के अर्थ' निबंध संग्रह। संपादन - रश्मि प्रभा
2. 'उजास साथ रखना' चोखा संग्रह। -- रामेश्वर कम्बोज
3. 'त्रिसुगंधी' गीत-नवगीत संग्रह।
4. 'आधी आबादी' हाइकु संग्रह।
5. 'स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता दशा और दिशा' हाइकु आलेख संग्रह।
6 . नयी सदी के नवगीत - गीत संग्रह संपादन - ओम  प्रकाश सिंह रायबरेली
7 . सहयात्री समय के - गीत संग्रह संपादन - रणजीत पटेल
८. कविता अनवरत - गजल प्रकाशन अयन प्रकाशन
९.लेडीज डाट कॉम - व्यंग्य संग्रह
10. आधी आबादी दोहा संग्रह - संपादन रघुवेंद्र यादव
11. स्त्री का आकाश भाग 1 व भाग_2__पर्यावरण संरक्षण  कविताएँ - ग्रीन अर्थ संगठन
१२. शब्द साधना - गीत संग्रह , - हिंदुस्तानी भाषा अकादमी
१३. समकालीन गीतकोष - गीत संग्रह - संपादन नचिकेता
१४. कविता कोष गीत 
   

व्यंग्य संग्रह - व्यंग्य की घुड़दौड़ शीघ्र प्रकाशीय , अन्य  काव्य संग्रह प्रकाशनार्थ 

* विशेष  *- फिल्म डायरेक्टर दर्शन दरवेश द्वारा कुछ कविताओं का पंजाबी
अनुवाद  

 सम्मान/ पुरस्कार :

1. हिंदी विश्व संस्थान और कनाडा से प्रकाशित होने वाली 'प्रयास' के सयुंक्त
तत्वाधान में आयोजित देशभक्ति प्रतियोगिता में 2013 की विजेता।

 2.'अनहद कृति' काव्य प्रतिष्ठा सम्मान - 2014-15।

3. 'राष्ट्रभाषा सेवी सम्मान' अकोला- 2015।

4. हिंदी विद्यापीठ भागलपुर : 'विद्यावाचस्पति सम्मान' -2016।

5. 'मिनिस्ट्री ऑफ़ वूमेन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट' द्वारा भारत की 100 women's 
Achievers of India  2016 सम्मान। महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी 
 द्वारा सम्मानित १०० महिला अचीवर्स सम्मान

6.'हरिशंकर परसाई स्मृति सम्मान' 2016 ।

 ७.  *वुमन इन एनवायरमेंट: बालिका सर्वोदय और पर्यावरण **संवर्द्धन के
अंतर्गत *राष्ट्र स्तरीय महिला कविता प्रतियोगिता *2017  की विजेता  .*

८. अखिल भारतीय पोरवाल महासंघ दिल्ली द्वारा प्रतिभा सम्मान २०१८

९. हिंदुस्तानी भाषा काव्य प्रतिभा सम्मान २०१८ -   हिंदुस्तानी भाषा अकादमी दिल्ली

ब्लॉग - http://sapne-shashi.blogspot.com,

  Email : shashipurwar@gmail.com

एक अनोखा साक्षात्कार  : आदरणीया 'शशि' पुरवार जी 
कृपया नीचे दिए गये लिंक पर जायें। 



  आदरणीया 'शशि पुरवार' जी की कुछ रचानाएं 
    
 १.आँगन की धूप 

धूप आँगन में खड़ी यूँ  
लग रही कितनी अकेली
हो रही जर्जर दीवारें
धूर में लिपटी हवेली

शहर की तीखी चुभन में
नेह का आँगन नहीं है  
गूँजती किलकारियों का
फूल सा बचपन नहीं है

शुष्क होते  पात सारे
बन रहें है इक पहेली
धूप आँगन में खड़ी, यूँ
लग रही कितनी अकेली

छोड़ आये गॉँव  में हम
कहकहों के दिन सुहाने
गर्म  शामें तप रहीं है
बंद कमरों के मुहाने

रेशमी अहसास सारे
झर गए चंपा चमेली
धूप आँगन में खड़ी यूँ
लग रही कितनी अकेली

गर्मियों में ढूँढ़ते है
वृक्ष की परछाइयों को
पत्थरों  पर लिख गयी, वह  
प्रेम की रुबाइयों को

मौन क्यों संवाद सारे
माँ वही है इक सहेली  
धूप आँगन में खड़ी, यूँ
लग रही कितनी अकेली

                                                           .... शशि पुरवार


२. शूल वाले दिन 

अब नहीं मिलते डगर में
फूल वाले दिन 
आज खूँटी पर टंगे हैं 
शूल वाले दिन 

परिचयों की तितलियों ने 
पंख जब खोले 
साँस को चुभने लगे फिर  
दंश के शोले 
समय की रस धार में 
तूल वाले दिन 

मधुर रिश्तों में बिखरती 
गंध नरफत की 
रसविहीन होने लगी  
बातें इबादत की 
प्रीत का उपहास करते 
भूल वाले दिन। 

आँख से बहता नहीं 
पिघला हुआ लावा 
चरमराती कुर्सियों  का 
खोखला दावा 
श्वेत वस्त्रों पर उभरते 
धूल वाले दिन। 

                                                         - शशि पुरवार 
३ 

" गीतों में बहना  "
कभी कभी, अच्छा लगता है, 
कुछ  तनहा रहना। 

तन्हाई में भीतर का 
सन्नाटा भी बोले 
कथ्य वही जो बंद ह्रदय के 
दरवाजे खोले। 

अनुभूति के,अतल जलधि को  
शब्द - शब्द  कहना
कभी कभी, अच्छा लगता है, 
कुछ  तनहा रहना। 

बंद पलक में अहसासों के 
रंग  बहुत बिखरे 
शीशे जैसा शिल्प तराशा 
बिम्ब तभी निखरे।

प्रबल वेग से भाव उड़ें जब 
गीतों में बहना।
कभी कभी, अच्छा लगता है, 
कुछ  तनहा रहना। 

गहन विचारों में आती, जब 
भी कठिन हताशा   
मन मंदिर में दिया जलाती 
पथ की परिभाषा

तन -मन को रोमांचित करती 
सुधियों को गहना
कभी कभी, अच्छा लगता है, 
कुछ  तनहा रहना। 
                                     
      -- शशि पुरवार

चलिए ! चलते हैं साहित्य समाज को गौरवान्वित करती उत्कृष्ठ रचनाओं की ओर 

 हाईकू
 नभ तरसा 
तरसे सरोबर 

जल के लिए 


 आँचल में सीप
 तुम्हारी पलकों ने करवट ली
दुआ में हाँथ उठा 
बीज ने कुछ माँग लिया

मेघ बरसे, 

 बच्चों वाले खेल 
लटटू ,कंचे ,चंग ,लगौरी 
बीते कल के रंग 
बचपन कैद हुआ कमरों में 
मोबाइल के संग। 

 लौटने की मजबूरी
 मजबूरी, फिर भी लौटतीं बहारें - -
जाते - जाते, बरगलाए मुझे। 

उम्र, यूँ तो बीत गई ठीक 

ईद मुबारक़ 
 अब जो भी हो 
प्रेम तो जिन्दा रखना है

अपन दोनों को ----

 दो पग साथ चले
 दो पग पथ पर तुम क्या मेरे साथ चले......

 अमलतास से
 जो कमज़ोर दिखते हैं,
उन्हें अपनी ख़ूबियों के बावज़ूद

पत्थर खाने ही पड़ते हैं.

 स्मृति शेष पिताजी
 उठा है जब से उनका साया -
किसी को हम पर नाज नहीं है
कल थे पिता पर आज नहीं है -

माँ का अब वो राज नहीं है!!!!!!!!!!!!!

 आओ मेघा, बरसो ना !
झंकृत होने दो अब सस्वर,
अंबर भावुक - सा हो जाए

धाराएँ बरसें झर झर झर ।

  जीत लिया है सकल जहान
 गोली खाता रहे जवान, सूली चढ़ता रहे किसान,

 किताबों की दुनिया - 181
 मुझे चुप्पियों से न मार यूँ कोई बददुआ ही तू दे भले
तेरी गालियां भी अज़ीज़ हैं मैं इन्हें रखूंगा संभाल कर

दीपिका घिल्डियाल की कविताए
  सीख लिया था छुपाना
माँ की दी हुई संदूकची में कंचे छुपाये
गुड़िया के कपड़ों के बीच सिक्के

 औरों की बात करो मत तुम , सब अपनी अपनी करते हैं ।

 रूठने और मनाने के दिन खो गए
आपसी रिश्ता मानो जहर हो गया

जब सफर होता है तन्हा
और मंज़िलें होती गुम

नयन से तीर चलाये,उसे अदा कहिये 

 मीलों वॉक करके लौटतीं  
भारत की बेटियों को 
देखा है.....

आदरणीया 'अपर्णा' वाजपेई जी 


  टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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'एकव्य' 

 उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
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 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।



 आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। 

                                                                                                                                  

                                                                               सभी  छायाचित्र : साभार  गूगल भईया       

सोमवार, 11 जून 2018

४८.........स्वर और शब्दों का मेल, एक अनूठी कला !

थक गया हूँ चलते-चलते, 
एक छाँव की आस है।  
बैठ लूँ तनिक और 
न जाने कैसी प्यास है। 
सेहरा में था, न कोई प्यास थी 
अब समंदर में हूँ,तो बुझती नहीं !

 स्वर और शब्दों का मेल एक अनूठी कला जिसका कोई सानी नहीं।

हर कोई प्रयासरत बनने को तानसेन 
अकबर स्वरूपी यूट्यूब के दरबार में। 
प्रजा भी वाह-वाह कहती है 
अपने लाइक भरे अंदाज में।

ज्यादा व्यू मिले सभवतः मार्डन दरबारियों को आपका गीत काफी पसंद आया नहीं तो आप बेसुरे ठहरे ! परन्तु यह आवश्यक नहीं की मॉडर्न दरबारी भी संगीत कला में उतने ही पारंगत हैं जितने की आप। पर क्या करें इन कलमवीरों का जो अपनी लेखनी की ताकत टेस्टट्यूब पर आजमाने चले हैं। काश आज मुंशी जी होते तो कुछ और बात होती। महादेवी जी निराला जी से सीख रहीं होती यूटूब पर अपनी रचनाओं को प्रसिद्धि दिलाने के गुन ! सोजे वतन अंग्रेजों के सामने से बस यूँ ही निकल जाता मानों आगरा और दिल्ली के मध्य चलने वाली संभावित बुलेट ट्रेन ! उन्हें मुंशी जी की रचना की प्रतियाँ आग के हवाले करने की जल्दी न होती। दस हज़ार लाइक और आग गली-गली फैल गई। परन्तु वो आग देखने को न मिलती जो उनकी क्रांतिकारी प्रतियाँ जलाने पर दिखीं थीं। अफ़सोस आज के लेखनी का वीर अपने ही लिखे शब्दों की ताकत पर भरोसा नहीं करता। भरोसा तो है ! परन्तु उस यू ट्यूब वाले व्यापारी पर जिसकी कमाई का स्रोत हमारे आज के ये वीर जिन्हें सभवतः पता हो ! पर निर्भर करता है। व्यापार और साहित्य का मेल बड़ी अतिशयोक्ति सी प्रतीत होती है। उसपर भी हमारे कुछ जागरूक लेखक वाट्सअप की ख़ामियों वाला वीडियो अपलोड करते और वो भी अपने वाट्सअप ग्रुप पर। मतलब 'गुड़ खाए और गुलगुला से परहेज़' ! मेरे भी कुछ शुभचिंतकों ने मुझे अपने वाट्सअप ग्रुप से जोड़ लिया वो तो अच्छा हुआ कि मेरे स्मार्टफोन का स्क्रीन जल्द ही अपना रंग दिखाने लगा और अब कोमा मे है नहीं तो आज ये लेख लिखने में मुझे बड़ी ही शर्मिंदगी का अनुभव होता। वैसे भी मैं पॉलीथीन के उपयोग का पुरजोर विरोध करता हूँ पर क्या करूँ ! थैला तो हमेशा साथ नहीं रख सकता। घर पर गोलगप्पे ले जाने हैं और कपड़े के थैले में पानी रिस जायेगा। कल किसी ने कहा अरे भई ! कैसे आदमी हो ? अपना अंग दान किया की नहीं ? आपको मालूम हो स्वयं उस महाशय ने एक यूनिट रक्त भी कभी दान किया हो तो जानो !  हाँ, ये जरूर है तख़्तियाँ उठाने में उनका कोई जवाब नहीं। एक बार उन्होंने हमें जागरूक किया और मैं भी उनके साथ अपने हॉस्पिटल के रक्तकोष में देशहित में रक्तदान हेतु पहुँचा और सहर्ष ही अपने शरीर की नसों में सुई की एक नाल ठुकवा बैठा। मेरा रक्त तो निकल गया परन्तु जागरुकता अभियान के संचालक महोदय बिना रक्त दिए ही वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गए। पूछने पर पता चला कि उन्हें रक्त देने में प्राण गंवाने का भय है। ऐसे हैं हमारे रक्तदान और अंगदान जागरुकता अभियान के संचालक। दोहरे मापदंड के पक्षधर ! चलिए छोड़िए,क्या रखा है इन गूँगी-बहरी बातों में।       
आदरणीया शुभा मेहता जी
'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है और आपकी लेखनी निरंतर चलती रहे यह कामना करता है। 



परिचय : आदरणीया  शुभा मेहता  

जन्म : कोलकाता (लिलुआ )ननिहाल ..
निवासी :ऐतिहासिक नगरी बूँदी ,राजस्थान 
सम्प्रति :अहमदाबाद ,गुजरात 
शिक्षा : स्नातकोत्तर राजनीति शास्त्र में ,राजस्थान विश्वविद्यालय से ।
संगीत विशारद .
स्वभाव से अन्तर्मुखी....
विपश्यना साधक ..

कुछ  अनमोल  शब्द  स्वयं  आदरणीया 'शुभा' जी के श्रीमुख  से :

 लेखन के बारे में इतना ही कहूँगी कि मैं न तो कोई कवयित्री हूँ न ही कथाकार बस कभी -कभी अन्तर्मन में कुछ विचार उमड घुमड करते है उन्ही को कलमबद्ध करने की कोशिश कर लेती हूँ ,..कुछ कविताएँ कोलकाता से प्रकाशित होने वाले "प्रभात खबर "में छपी हैं जिनमें ..रिश्ते ,चित्रकार ,माँ ,समन्वय ,भोर-किरन  .आदि। मेरी लिखी रचनाओं में से मुझे मेरी एक रचना  "ठूँठ "पसंद है।  
मैं ध्रुव जी को धन्यवाद देना चाहूँगी जो उन्होंने मुझे इस काबिल समझा ...

आदरणीया 'शुभा' मेहता  जी की एक रचना

  ठूँठ..

     हाँ ..... ठूँठ हूँ मैं
      आते-जाते सभी लोग
      लगता है जैसे चिढ़ाते हुए निकल जाते मुझे
        भेजते लानत मुझ पर
     कहते - कैसा ठूँठ सा खड़ा है यहाँ
     इसके रहते इस जगह का सौंदर्य
     जैसे ख़त्म सा हो गया है
     और मैं उनकी बातों पर चिड़चिड़ा उठता
        मन ही मन ,पर पूछ नहीं पाता
        कि मुझे ठूँठ बनाया किसने
      आँसू भी सूख चुके थे अब तक
       ठूँठ जो हूँ.....
          याद है मुझे अभी भी
      जब मैं बीज था
     कुछ बच्चे मुट्ठी में लेकर
      लाये थे मुझे उगाने
     रोज करते थे मेरा जतन
     धीरे -धीरे अंकुर फूटे
       बच्चे कितने खुश थे
      नाच रहे थे ताली बजा -बजा कर
        फिर धीरे -धीरे बन गया मैं एक विशाल वृक्ष
      छाया में मेरी खेला करते बच्चे दिनभर
     कितने ही पक्षियों का बसेरा था
    मेरी शाखाओं में
      कितना खुश था मैं
     फिर अचनक एक दिन ..
   ठाक... एक जोर का प्रहार
    अपनी पीड़ा छुपा के देखने लगा इधय -उधर
     मैंने सुना लोग कह रहे थे
     अरे ये पेड़ तो है अब बेकार
     चलो काट डालो इसे
  मैं अवाक् सा रह गया
    मैँने तो खुशियाँ ही बांटी
     अपना सब कुछ तो दे दिया
    फिर सोचा अरे ये तो इंसान है
अपनों को ही नहीं छोड़ता
   फिर मैं तो पेड़ हूँ
    मेरी क्या बिसात ।
चल रहा है कारवां,ऐ हमसफ़र जरा तू भी चल  
कुछ दूर ही सही,राहों में मुलाक़ात तो होगी।
मैं रहूँ या ना रहूँ ,मंज़िल पर पहुँचने तक 
संग मेरे तेरी याद ही सही, वो सौगात तो होगी।।  
'एकलव्य'  

चल पड़े हैं हम, उनकी तलाश में.....

एक चिड़िया का घर  
 उसकी चूं-चूं सुन,
जागता है सूरज,
उसके पंखों से छन कर, 
आती है ठंढी हवा,

 गुनगुनाती है जब चिड़िया,

टेढ़ी हुई जुबान 
भोर हुई मन बावरा,सुन पंक्षी का गान 
गंध पत्र बांटे पवन,धूप रचे प्रतिमान। 

  कासे कहूं हिया की बात! 
 दहक दहक दिन रात .
सबद नीर नयन बह निकले
भये तरल दोउ गात .

 जीते के हारे : दो क़त्आ
 हम उल्फ़त की बाज़ी को रक्खेंगे ज़ारी
नहीं फ़र्क़ इससे है जीते के हारे

 ऐनक के इस पार
 दूर तक वही बियाबां, वही अंतहीन शून्यता,
प्रतिध्वनियों का इंतज़ार अब बेमानी है,


 चलो आज लगाएं यादों का बाज़ार
 बाज़ार ए इश्क़ में बड़ी चालबाज़ी है

छूके देखिए जनाब ये आज भी ताज़ी है। 

विकलांग 
बीनकर लाये हुए कंडों को सुलगाकर 
गक्क्ड़ भरता बनायेंगे 
तपती दोपहर की छाँव में बैठकर 

भरपेट खायेंगे। 

 महेंद्र झा की दो मैथिली कविताएं
 मुख्य सड़क की दाहिनी ओर
झुके बिजली के खम्भे से सटे 
पूरब की ओर
देसी दारू की है दुकान 
जहां हिलता-डुलता रहता है 
मेरी गली का पता 
दारुबाज 
गोल घेरे में करते रहते हैं गाली-गलौज 
और गली को भूलकर नगरपालिका की नाली में 
गिरे रहते हैं मस्त होकर 

सूअर और भैंस की तरह

आदरणीय सुशील जोशी जी की पसंद 

 जिदंगी के अश्लील चेहरे पर अल्मोड़े का क़रारा तमाचा है शंभू राणा
                 हम सफर थे अलीगढ़ी ताले               

रात भर में खुले नहीं साले

 तितलियां
 दरवाजे बंद हैं सब
तितलियों के लिए,
अब ख़ुद ही करनी होगी उन्हें 
अपने परों की हिफाज़त,
तमाम तितलियों के लिए

यह परीक्षा का समय है।

 सत्ता-भक्ति में शक्ति
 पानी केरा बुदबुदा, अस भक्तन की जात,

पद छिनते छुप जाएंगे, ज्यों तारा परभात.

 कंठ है प्यासा
 दूर-दूर तक भी
पेड़ न कोई
दावानल से सूखे

थे हरे-भरे

 गीता गैरोला की कविताएँ
 झांकती हैं
मुस्कराती हैं
,बैचेन हैं
दरबदर ,बेआवाज हैं

वो आग के खिलाफ है

रिश्ता 
 दूसरे दरवाजे तक का सफ़र 

तय करने में बरसों गुजर जाते हैं ।

 उम्र ठहरती नहीं
 पता नहीं कहाँ चली गई 
नहीं मिली
रेत की तरह 
मुट्ठी से फिसल गई

या रेशा रेशा हो कर 

 चुटकी भर संवेदना…
 क्या पता कौन कहाँ दुश्मन निकल आए

खुद को हर वक्त, पहरे पे लगाए रखिए

 सुबह की चाय में बिस्कुट डुबा कर ...
 फकत इस बात पे सोई नहीं वो

अभी सो जायेगी मुझको सुला कर

फरेब कैसे हैं
  बनते हैं यूँ जैसे कि उन्हें,हमारी कोई तमन्ना ही नहीं , 

अजी जाने भी दीजिये,न पूछिए हुस्न के फरेब कैसे हैं। 

 गुज़रे हुए सालों की तरफ़
 फ़िक़रे और तंज़ का 
वो दौर 
जिसमें नहीं था 

कोई हम-सफ़र।

आदरणीया शुभा मेहता जी की आवाज में यह गीत 


प्रणाम। ........ 


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