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सोमवार, 22 जनवरी 2018

२५.....इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - २० वां ) कुछ दिग्गज़ों के साथ

छन्नु लाल - अरे भागवान ! 
क्या बात करती हो ,सामने जवान 
बेटा बैठा है। मेरे बारे में क्या सोचेगा ! 
मंथरा - अरे ! सोचे, उसे जो सोचना है मैं चुप थोड़े बैठूँगी। 
छन्नु लाल - अच्छा छोड़ो ये सब ! सब बेकार की बातें हैं। तुम बताओ 
जो बता रही थी। आखिर चोट कैसे लगी इस नामुराद को ?मंथरा-अरे होना क्या था ,मियाँ हज़रतगंज गए थे लड़कियों के कालेज और वहाँ लड़कियों को अपना स्टंट दिखा रहे थे बाईक पर। फिर क्या था ! आगे से एक लारी आ रही थी ,उसी की चपेट में आ गए। अरे भला हो ! उस नयनसुख का, जो इन्हें घर तक ले आया। नहीं तो नगर निगम वाले कूड़ा समझ कर उठा ले जाते तुम्हारे इस कूड़े बेटे को। हमारी तो क़िस्मत ही फूटी है ,भगवान ऐसी औलाद किसी को न दे ! छन्नु लाल - क्यूँ रे ! दुकान में बैठने को कहो तो आनाकानी करता है और घूम-घूम कर गली -गली लड़कियाँ देखता है। हँसमुख - क्या बापू ! आप भी तो अपने जवानी के दिनों में ऐसे ही रहे होगे। 
( और आगे ....) 

"लोकतंत्र" संवाद मंच 
आपका हार्दिक स्वागत करता है। 


हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीय अरुण रॉय 
  • आदरणीया शैल सिंह 
  • आदरणीया रेणु बाला 
  • आदरणीया आशा सक्सेना 
  • आदरणीय विश्वमोहन जी 
  • आदरणीया अभिलाषा जी 
  • आदरणीय हर्षवर्धन जोग 

चलिए ! उतरते हैं आज के मंच पर 



 राजपथ से
जब भी निकलती है
तोपें


थपुवा,नरिया,खपड़ा,मड़ई,टाठी
गोईंठा,कंडा,इन्हन,चिपरी,छान्हीं



 ये मन कितना अकेला था 
एकाकीपन में खोया था

सागर का जल खारा
पर वह इससे भी न हारा



 सरकी परते धरती की
फटी माटी परती की
और भूचाल न हो।
फिर! बवाल न हो?


 बहुत दिमाग घुमाया
सर चकराया
गुस्सा भी आया,


न्यूज़ीलैण्ड के साउथ आइलैंड 
का नाम माओरी भाषा में ते वाइपोनामु है.
 इस द्वीप में झीलें बहुत हैं. छोटी झील, बड़ी झील, 
चौड़ी झील, लम्बी झील, गहरी झील जिसमें छोटे जहाज़ 
भी चल जाएं. याने पानी ज्यादा और जमीन कम! बहारहाल 
जमीन पर सड़कें अच्छी हैं और रख रखाव भी अच्छा है. 

आज के हमारे ''पाठकों की पसंद'' 
की इस कड़ी की पाठिका हैं। आदरणीया रेणु बाला जी 
कहते हैं प्रतिभा इस संसार में प्रत्येक स्थान पर मौज़ूद है ! 
आवश्यकता है उन्हें पहचानने और तराशने की। और रेणु जी में 
यह ख़ूबी विद्यमान है। "लोकतंत्र" संवाद मंच रेणु जी की इस प्रतिभा को नमन करता है। 

"लोकतंत्र" संवाद मंच
'शब्द नगरी' के इन 'दिग्गज़ों' का स्वागत करता है। 


'शब्द नगरी' के दिग्गज़ रचनाकार : 
  •   आदरणीय  मनोज कुमार खँसली "अन्वेष"
  •   आदरणीय   एस. कमलवंशी
  •    आदरणीय  महातम मिश्रा
तोड़ लूँ,...
उस नक्षत्र को जिस ओर कोई इंगित करे,
मुझे वो उड़ान चाहिए,
हाँ - हाँ मुझे चाँद चाहिए |


सितारे सिमट आए थे, दमके वफा के दामन में,
शब्ब-ए-शमा अल्फ़ाज़ थे, बरसे वफा के आँगन में ।

याद आती पाठशाला पटरी को पढ़ते कर गई।
चाक जब होते मधुर थे डगरी को हँसते कर गई।

आज्ञा दें !



सभी छायाचित्र : साभार गूगल 

रविवार, 21 जनवरी 2018

२४..........अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ खास मायने

'अभिव्यक्ति' की स्वतंत्रता 
के कुछ खास मायने हैं। हम 
अपने-पराये के छदम्ब से उठकर 
न्यायपरक बातों पर अपना सम्पूर्ण ध्यान 
आकृष्ट करते हैं। भेद-भाव की दहलीज़ लाँगते 
हुए पूरी कर्मनिष्ठा से अपने गंतव्य की ओर बिना किसी 
लागलपेट के प्रस्थान करते हैं।अंततः हमें उस सत्य का ज्ञान 
होता है, जिसकी खोज में प्रत्येक प्राणिमात्र निरंतर गतिमान है। यही परमसत्य है ! और इस परमसत्य का साक्षात्कार आपसे करवाने हेतु  "लोकतंत्र" संवाद मंच सदैव तत्पर है। 

( तो आइये ! चलते हैं इसी परमसत्य की खोज में )
  
इस स्वतंत्र 'अभिव्यक्ति' अंक में 
आपसबका हार्दिक स्वागत है। 

हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीय दिगम्बर नासवा साहब 
  • आदरणीया राधा तिवारी 
  • आदरणीया श्वेता सिन्हा 
  • प्रिय कुलदीप कुमार ( 'नन्हे' कवि )
  • आदरणीया 'रेवा' जी  
  • आदरणीय टी. एस. दराल   
  • आदरणीया साधना वैद 




झांकती तो थी मेरे आँगन  
पर मैं समझ न सका
वो प्यार की आंख-मिचोली है

 याद आने लगे वो हमें चुपके चुपके 
दिल को लुभाने लगे  चुपके चुपके 

 स्वर्ण मुकुट सुरभित वन उपवन रंगों की फूटे पिचकारी।
ओढ़़ के मुख पर पीली चुनरी इतराये सरसों की क्यारी।।


 वहाँ के फल हम खाएंगे | 
नए - नए जगह हम घूमेंगे,

जितना अमृता को पढ़ती हूँ 
उन्हें और 


 दुनिया की रीति है कि बच्चों से ही घर बनता है ,
तिनका तिनका जोड़कर बस इक घर बनता है।

 क्यों ढूँढते हो मुझमें
राधा सी परिपक्वता
सीता सा समर्पण
यशोधरा सा धैर्य


आज्ञा दें !

 

सभी छायाचित्र : साभार गूगल 

शनिवार, 20 जनवरी 2018

२३...... ज़र्रे को उड़ते देखा है !

कहते हैं !
चाहते हो अगर नाम 
बदनाम तो जगज़ाहिर है 
सिर से पाँव तलक 
उन गलियों में !
फिर भी, एक तसल्ली है 
अरे ! ओ दुनियाँ वालों 
ले तो रहे हो नाम। 
क़ब्रिस्तान में ही सही 
रोज़ आकर 
मेरी क़ब्र पर 
ज़रा एक फूल तो रख दो !
तुम्हारा क्या चला जाता है ?
एक रुपये तो ख़र्च किए हैं 
तुमने !
अपनी शिद्दत दिखाने में। 

( "एकलव्य" की क़लम से )


"लोकतंत्र" 
संवाद मंच आज आपका 
परिचय करवाता है उस शख़्स 
से जिसे हिंदी ब्लॉग जगत में ख़ास 
परिचय की आवश्यकता नहीं। क्योंकि 
उनकी लेखनी से निकले एक -एक शब्द उनके परिचय 
का साक्षी है। हम बात कर रहे हैं आदरणीय'रविंद्र' सिंह यादव जी की। जो एक सशक्त रचनाकार ,समीक्षक और प्रगतिवादी व्यक्तित्व के धनी हैं। इनके अनमोल विचारों का संकलन इनकी पुस्तक "प्रिज़्म से निकले रंग" के माध्यम से आप तक पहुँचे "लोकतंत्र" संवाद मंच यही कामना करता है ! और इन्हें इस अथक प्रयास हेतु हार्दिक बधाई देता है। 

"लोकतंत्र" संवाद मंच 
आपका हार्दिक स्वागत करता है। 

हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीय राजीव जोशी 
  • आदरणीया पम्मी सिंह 
  • आदरणीया रेणु बाला जी 
  • आदरणीया मीना शर्मा 


तो चलिए ! चलते हैं 
मज़िल की ओर 

 हमसे भी कुछ बात हमारी किया करो
सोच समझकर दुनियादारी किया करो।



 सुर्खियों में बवाल भी बिकते हैं
जो इघर रुख करें..
तो दिखाए बवाल इनकी..

दिन के प्रत्येक पहर
 का अपना सौन्दर्य होता है | 
जहाँ भोर प्रकृतिवादी कवियों के लिए
 सदैव ही नवजीवन की प्रेरणा का प्रतीक रही है 
वहीँ प्रेमातुर व्यक्तियों और प्रेमवादी विचारधारा के कवियों व 
साहित्यकारों के लिए रात्रि के प्रत्येक पल का अपना महत्व माना  है | 



 वीणावादिनी ! वरदहस्त तुम
मेरे सिर पर धर देना...
अपनी कृपा के सुमनों से माँ,
आँचल मेरा भर देना !


ज़र्रे को उड़ते देखा है 
आसमानों में, बिन पंखों के !
आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 


पुस्तक के बारे में 

 जीवन में  भावात्मक -सौन्दर्य 
या  यथार्थ  की कुरूपता कहीं न कहीं  
हमसे टकराती रहती है।  जो बातें  बार-बार  
मन-मस्तिष्क को  खंगालती  रहती हैं , अनेक  प्रकार  
की काल्पनिक चित्रावली उभरती  रहती है ,मन -बुद्धि-संस्कार के विराट  आयाम  स्वस्फूर्त  प्रेरणा  बनकर वर्तमान  में पुस्तकों  का पुराना  स्वरुप  बदलती तकनीक ने  हाशिये  पर  ला दिया  है  फिर भी  मुद्रित  पुस्तक से  जुड़े  सुखद  साहित्यिक  अनुभव अपना  असर  बनाये  हुए  हैं। नई  पीढ़ी  में  साहित्य  के प्रति  उदासीनता  भूमंडलीकरण  का दुष्प्रभाव  है जिसने  बाज़ारवाद  को हमारे जीवन  में आक्रामक  रूप  से स्थापित  कर दिया है।

और अंत में आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही' जी द्वारा प्रस्तुत उनकी आवाज में उनके द्वारा रचित 'रचना' "तुम्हारा साथ - 2" का पाठ 


आज्ञा दें !



सभी छायाचित्र : साभार गूगल 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

२१..... "लोकतंत्र" संवाद मंच का एक 'वैचारिक' अंक

कहते हैं इस धरा पर 
कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं ! 
बात अलग है अपनी मिथ्या पूर्णता 
पाने हेतु यह मानव,जीवन भर अपूर्णता के 
वन में स्वयं में पूर्ण बनकर विचरण करता रहता है,
और स्वयं की अपूर्णता स्वीकारने से भी भय खाता है। 
परिणाम गहरे अज्ञानता का प्रारम्भ ! मानव इस भ्रम के 
गहरे अंधकार में रहना सहर्ष स्वीकार करता है जहाँ उसे क्षणभर का भौतिक आनंद अवश्य मिलता है परन्तु भविष्य में अदृश्यमान कठिनाईयाँ उसे दृश्यमान नहीं होती। अंततः परिणाम आजीवन पछतावा मात्र !   

"लोकतंत्र" संवाद मंच 
'दार्शनिक' भाव भरे अंक में आपका स्वागत करता है। 


हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीय विश्वमोहन जी 
  • आदरणीया ऋतु आसूजा 
  • आदरणीय राजेश कुमार राय 
  • आदरणीय विजय बोहरा 
  • आदरणीया अनीता लागुरी 
  • आदरणीया शकुंतला 'शाकु'
  • आदरणीय ज्योति खरे 
  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  • आदरणीया रिंकी राउत  



तो चलिए ! चलते हैं 
आज की रचनाओं की ओर 


 विज्ञान, पुराण और इतिहास 
सभी इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कश्मीर  
पुरा काल में जलोत्प्लावित था और सतीसर के नाम से जाना जाता था


  मनुष्य जीवन में ,तन का अस्तित्व 
राख हो जाना ,आत्मा रूपी शक्ति ,जिससे 
मनुष्य तन पहचान में आता है , यानि  मनुष्य का अस्तित्व 
धरती पर तभी तक है जब तक तन में आत्मा की ज्योत रहती है ।


    हुई जब शाम शम्मा जल गयी अब देख लो मंज़र 
हजारों आशिकों का कारवाँ उस पर मचलता है


 क्यों थक गए तुम,
चलते चलते।
क्यों रुक गए तुम,
मंज़िल तक पहुंचने से पहले।


 रुक जाओ
मत भागो
मैं नहीं थोपूँगा 
अपनी पराजय तुम पर

 गुलिस्तां में सजाएं होते अपने यादों के फूल
कहीं न कहीं तो बाहर आई होती

गंगा की छाती पर
जब भरने लगता है महाकुंभ
महाकुंभ में बस जाती हैं
कई कई बस्तियां

   माँगी थीं 
जब बिजलियाँ,  
उमड़कर 
काली घटाएँ आ गयीं। 

 साहित्य बहुत व्यापक और 
विस्तृत शब्द है, एक विशाल समुंदर 
के समान जिसकी गहराई और छोर नापना 
कठिन है वो हर इन्सान जो लिखने में रुचि या कहे लिखने की 
हिम्मत रखता है,वो हिंदी साहित्य में अपना छोटा सा योगदान देना 
चाहता है या हिस्सा बनना चाहता है

फिर उपस्थित होता हूँ 
"इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड" के अगले अंक के साथ। 
तब तक आज्ञा दें  !


सभी छायाचित्र : साभार गूगल 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

१८.......नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक'

कहते हैं 
जब तक दुनिया न देखी, 
तब तक हमारा संसार एक दायरे में 
बंध कर रह जाता है।आप सोच रहे होंगे कि 
आज मैं ऐसी बहकी -बहकी बातें क्यूँ कर रहा हूँ ? 
क्या मेरा मानसिक स्तर बराबर है या मेरा जुमलेबाज़ी का मन है। 
 नहीं ज़नाब ! मेरी तबियत पूर्ण रूप से बराबर है और मैं पूरे होशो -हवाश में हूँ। परन्तु एक बात आप सबसे कहना चाहूँगा ! मंज़िलें और भी हैं ,
आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद हैआपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना 
जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी 
रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं। 
ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा !
इसी पावन उद्देश्य के साथ 

"लोकतंत्र" संवाद मंच पर 
 नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' 
में आपका हार्दिक स्वागत है। 


आज के 'विशेषांक' के रचनाकार :

  • आदरणीया पूनम जी 
  • आदरणीया अंजु चौधरी 'अनु'
  • आदरणीय रमाकांत सिंह 
  • आदरणीय आशीष अवस्थी 
  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  • आदरणीया सुमन सिन्हा 
  • आदरणीया टिम्सी मेहता 
  • आदरणीय राकेश मूथा 
  • आदरणीया निधि टंडन 
  • आदरणीय मानव मेहता 
  • आदरणीया अलकनंदा सिंह 
  • आदरणीया शशि पुरवार 
  • आदरणीया साधना वैद 
  • आदरणीया शालिनी कौशिक 
  • आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी 
  • आदरणीय बृजेन्द्र सिंह  

तो चलिए चलते हैं आज की रचनाओं की ओर ...... 



चाँदनी की इनायत हुई.... 
आपने जब दुआ दी मुझे 
ठीक मेरी तबियत हुई। 

 ऐ-री-सखी की एक कविता
 ऐ-री-सखी ,
बता ना मुझे कि

एक लंबी सी खामोशी के बाद

 यज्ञ 

अग्नि प्रज्ज्वलित कर
समिधा को किया समर्पित
स्वाहा को

प्रेम के गीत कुछ...!! 

    प्रेम के गीत कुछ, शब्द में ढल गये..
प्राण चेतन हुये,तन रतन हो गये, 


 कोई रहगुज़र तो होगी ज़रूर .... 
 दिल में 
धक्क-सा हुआ 
शायद आज फिर 
बज़्म में आपकी 


  एहसास 

बस - एक एहसास
नाम और रिश्तों से परे,
मुक्त....

  सुच्चा मोती बना ... 
 टूटा था तारा कहीं,

छूट के गिरा जो 

 हां ,प्यार ही है जीवन का अर्थ 

 क्या है अर्थ इन हवाओं का

इन हरे पेड़ों का

 चुनना 

 तुमने चुनी अपनी सुविधा
अपनी पसंद को जिया

 किताबें धूल फांकती है शेल्फ पर 
 किताबें धूल फांकती है 
शेल्फ पर। 

सबहीं को मुबारक हो हैप्‍पी वाली ''खिचराईं'
  आज मकर संक्रांति है, 
मुझे अपना बचपन याद आ रहा 

बदल गए हालात 
पतझड़ में झड़ने लगे 
ज्यों शाखों से पात 

दीप ले आओ 
  छाँटनी होगी 
ज्ञानालोक के लिए 

मन की धुंध


  वसीयत और मरणोपरांत वसीयत 



  वसीयत एक ऐसा अभिलेख जिसके माध्यम से 
व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद 
अपनी संपत्ति की व्यवस्था करता है  


 सुकूँ के साथ कुछ दिन जी लिया क्या ।

वो अच्छा दिन तुम्हें हासिल हुआ क्या ।।

 पूरा चाँद, अधूरी चाँदनी

 मुझे कुछ दर्द 
कुछ डर सा 

महसूस होता है ...



कल पुनः 
उपस्थित होता हूँ 
"इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड" 
के अगले अंक के साथ
 तब तक आज्ञा 
दें ! 

"एकलव्य"





 छायाचित्र स्रोत : गूगल