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बुधवार, 22 अप्रैल 2020

८५..प्रिय कक्का,.... हमरी जूती, हमरा सर!



प्रिय कक्का,
चरणों में प्रणाम स्वीकार करें!  

स प्रकार कोरोना नामक धूर्त युद्ध में मारा गया और रामायण, महाभारत के साथ सात समंदर पार कोस्टा रिक्का के वनों में 'सवा सेर गेहूँ' लेने मुंसिपल्टी की लंबी कतार में खड़ा हो गया जहाँ हस्तिनापुर से आये पाँच-पाँच सौ के नोट फ़ोकट में ही विजयगढ़ की सेना को रोटी और नमक से साथ बिना मिर्च के ही बाँटे जा रहे थे। "अरे भीम! पीछे काहे खड़े हो? ज़रा आगे आकर भोजन तो परोसो!" बड़ा अच्छा हुआ जो हमने कश्मीर को लॉक कर दिया।  अरे बदहवास जी कोई कविता या गीत मंच से चढ़कर ज़रा भारतीयता की याद दिलाते हुए बाँच दीजिये जनता-जनार्दन के बीच। इस प्रकार दिल्ली के सिंहासन का द्वन्द शांत हुआ परन्तु वर्चस्व और धर्मरक्षा का पुलिंदा फूट पड़ा! नहीं! नहीं! ऐसा नहीं हो सकता! एक दिन मेरा बेटा विश्वगुरु अवश्य बनेगा आप देख लीजियेगा मैं कहे देती हूँ। सत्य कहती हो लाजवंती, हमरी तो मति मारी गई थी।  झूठ-मूठ ही मैं इसे निकम्मा समझता था। बताओ पढ़े-लिखे आला अधिकारी हमरे अँगूठा-छाप बेटे की ग़ुलामी करते हैं आज! औरे ई, जिसकी पाँचवीं कक्षा का अंक-पत्र आज तक उहे 'दादा उमानाथ' के जलेबी की दुकान पर रखा है इस इंतज़ार में कि कभी न कभी हमरे कर्ण और अर्जुन आयेंगे कि साहेब अभी भी बख़त है, पैकेट वाला दूध इस्तेमाल कर लो क्योंकि समूल-स्प्रे की कंपनी के मज़दूर, मज़बूरी में रस्ता नाप लिए औरे विधायक जी का लौंडा कोटा में पब-पब खेल रहा था परन्तु शॉक-डाउन के बाद वहाँ के सारे ठर्रा मालिक पाकिस्तान चले गए औरे पब बंद हो गया! तभी इन्द्र देव को इन बेचारे नौनिहालों के ऊपर दया आ गई और सभी गंधर्व पुत्रों एवं पुत्रियों को शीघ्र-अतिशीघ्र गाँव वापस लाने हेतु उन्होंने जूहू और चौपाटी की चौपट सेना को श्रीलंका के लिए रवाना कर दिया। पुल को पार करने हेतु प्रत्येक पाषाण पर अत्यंत शोषित वर्ग के बैलों के नाम स्वर्ण-अक्षरों में चॉक और डस्टर से झमा-झम लिखे जा रहे थे तभी पप्पू ने कहा- ऐसा तो नहीं कि पुल के पार रावण हो ही न! और हम फर्ज़ी में मुँह पिटा लें! सुना है मुंशी जी को आज के शक्तिमान लेखक पसंद नहीं करते! इस प्रकार सम्पूर्ण साहित्य जगत नौकरशाहों के अनूठे साहित्य-प्रेम से आलोकित एवं पुलकित होने लगा। औरे कलुआ को खुज़ली हो गई यह कहते-कहते कि अब साधारण साबुन से ही हाथ धोने से ''बी हंड्रेड प्रतिशत श्योर" ऊ काहे कि मार्केट से हैंडवाश ख़तम हो गया रहा! सादर 
प्रिय विधायक जी! सादर नमस्कार! कल से हमार बकरी छबीली पचास लीटर दूध दे रही है। हम सोच रहे हैं आप हमरी बकरी छबीली को अपने पार्टी का टिकट प्रदान करें! पढ़ी-लिखी ज्यादा तो नाही है परन्तु पैर का अँगूठा लगा लेती है औरे रही-सही भाषण की कसर भी पूरी कर ही देती है जब अपने मुँह से हमेशा टी.वी. स्क्रीन पर एक ही शब्द निकालती है। सुन लो हमरा लप्रेक! हमरी जूती, हमरा सर! बाक़ी सब ठीक बा!                


  'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।

इस माह की चुनी गईं नौ श्रेष्ठ रचनाएं

स माह की चुनी गईं नौ श्रेष्ठ रचनाएं आप सभी के समक्ष वाचन हेतु प्रस्तुत हैं। अगले सप्ताह इन नौ रचनाओं में से सर्वश्रेष्ठ तीन रचनाएं पाठकों द्वारा भेजी गयी टिप्पणी और हमारे निर्णायक मंडल के निर्णय के आधार पर चुनी जायेंगी जिसे हम अगले बुधवारीय अंक में प्रकाशित करेंगे। हम आपसभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों से यह अपेक्षा करते हैं कि आप इन रचनाओं पर अपने स्वतंत्र विचार रखें!



             लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी पाठकों का स्वागत करता है। 
तीन अंको से नौ श्रेष्ठ रचनाएं अपने लिंकों के साथ पुनः आपके समक्ष वाचन हेतु प्रस्तुत हैं।   

 क. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 

1 भूख अब पेट में नहीं रहती

 हम बिदेश तो नहीं गए न साहब
हम तो आपकी सेवा में थे
हम ड्राइवर थे, धोबी थे, रसोइया थे
हम घर की साफ़ सफाई वाले थे
सडकें, गटर साफ़ करने वाले थे।



 जयकार में उठी कलम,क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में,खतरनाक लिखेगी !


3. कविता...... निकल गयी  

मस्ते!
नमस्ते!!
कहते हुए एक मीटर फासले से
निकल गयी कविता।

ख.लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद ) 


 हर साहित्यकार की रचना एक सुशिक्षित , 
सुसंस्कृत और सभ्य समाज की रचना के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी होता है। 


 "एक ठो चिरैया रही, कुछ खास 
किसिम की रही. उसका पेट तो एक्कै ठो था 
लेकिन उसका मुंह था दो. समझ लो कि दोमुंही रही ऊ चिरैया... 
उस चिरैया का नाम था भारुंड..." रात को सोते समय दादी ने दो पोतों को किस्सा सुनाना शुरू किया। 


. एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए

र दुकाँ बन्द है आंखों की  तरह  नशेबाज की
क्या एक भी दुकाँ नही थोड़े  से  कर्जे  के  लिए

ग.  पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)


 झर झर बरसे मोती अविरल
नेत्र दृश्य कुछ तोल रहा था।
मूक अधर शरीर कंपित पर
भेद विदित का डोल रहा था। 


 खुद़ा के वासते तनहा ही रह कर 
अमा इक चैन की बंशी बजा ले 


 तपती धूप के रेगिस्तान में मैंने कोशिश की
धूल के साथ उड़ कर
तुझे छूने का प्रयास किया

इस भाग की विशेष चयनित रचनाएं 
( बाल रचनाकार )

 १. एक दूजे का साथ देना होगा (  प्रांजुल कुमार/ बालकवि ) 
 हम अब भी खुशियों को सजा सकते हैं,
उन टूटे खिलौनों को फिर बना सकते हैं |
इस शुभ कार्य को अब ही करना होगा,
इस भीड़ भाड़ की दुनियाँ में
एक दूजे का साथ जीवन भर देना होगा।



 खाओ सदा पौष्टिक खाना,
रहो तंदुरस्त और जिओ ज़माना। 



उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 

 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें!



आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

८४....हमरा हवा-हवाई चप्पल टूट गया है!

कक्का! हमरा हवा-हवाई चप्पल टूट गया है! 
बड़ा दिक्कत महसूस हो रहा है भागने में। औरे ससुर ई शॉक 
डाउन में कउनो दुकान भी नहीं खुली है। का करें बड़ा तकलीफ़ में हैं, 
औरे उधर रोज़ी-रोटी के लाले भी पड़े हैं। परसों ऊ छगनलाल बनिया के 
यहाँ गये रहे सवा सेर गेहूँ ख़ातिर, कह रहा था गेहूँ नाहीं है मैदा खाओ और मैदा न 
हो तो सूजी खाओ! अब आप ही बताओ, मैदा खाने में कितना तकलीफ़ होता है।
 पिछले साल हम मुजफ़्फ़रपुर गये थे तब सुबह-सुबह मैदा का पूड़ी खाये रहे आलू की तरकारी के साथ, वापस लख़नऊ आये तो डॉक्टर साहेब बता रहे थे कि मैदा खाने से तुम्हें पेचिस हो गया है। उन्होंने बताया हिमालय जाकर लाल कालीन पर चारों-खाने चित होकर दो-सौ-दो महाभुसण्डी महाराज का जाप करो औरे उसकी फोटू वाट्सअप यूनिवर्सिटी पर वायरल करवा दो! जितने लाइक आयेंगे तुम्हरी पीड़ा उतनी ही तेज़ी से जाती रहेगी। परन्तु का बतायें कक्का! हमने यह भी करके देख लिया पर आराम तो हराम बनकर रह गया। फिर ससुर ई तकलीफ़ लेकर हम "तुम बजाओ हम कमायें लोक हिट पार्टी" वाले बाबा के पास गये। उन्होंने कहा तुम अपनी सारी श्रद्धा हमरी ई पार्टी ख़ातिर थोबड़े की क़िताब पर दिखाओ और प्रति दो रुपये ट्रोल मज़हबी वैमनस्यता को फैलाने के साथ-साथ शीघ्र स्वास्थ्य लाभ पाओ! उन्होंने अपनी धोती बाँधते हुए फिर कहा अगर यह नहीं कर सकते तो 'सामुदायिक साहित्य चिट्ठा' के नाम पर की एक कंपनी बनाओ और कई साहित्य से जुड़े कर्मचारियों को साहित्यसेवा के नाम पर उस काम पर रखो! हम तुम्हें सालाना दस-बीस लाख रुपये तो दे ही देंगे और तुम मैगियों के देश में जाकर इन पैसों से अपना बेहतर ढंग से इलाज कराओ! का बतायें कक्का ऊ ससुर  "तुम बजाओ हम कमायें लोक हिट पार्टी" वाले बाबा के चक्कर में हमने ठेका तो ले लिया परन्तु ससुर अब भोग रहे हैं। ससुर जो वायरस हमने मोहल्ले वाली मुर्ग़ी में फैलाया था ग़लती से उसी मुर्ग़ी के अंडे का ऑमलेट हम निगल लिये रहे। डॉक्टर झटपटिया कह रहे थे कि अब इसका इलाज संभव नहीं है आप अपना इंतज़ाम तैयार रखें कभी भी बुलावा भेजा जा सकता है। बाक़ी सब ठीक है!                     


'लोकतंत्र संवाद' मंच 
'भारतरत्न' बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी को 
कोटि-कोटि नमन करता है।


  'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।  इस भाग के दूसरे चरण में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं-
( रचनाएं वरीयता क्रम में नहीं बल्कि सुविधानुसार लगायी गयी हैं। कृपया भ्रमित न हों! )


१. भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर

  भारतीय संविधान के रचयिता
भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की आज जयंती है जो देशभर
में उत्सव की भाँति मनाई जाती है। 14 अप्रैल 1891 को जन्मे बाबा साहब का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा।

 "मेरी प्रशंसा और जय-जयकार करने से अच्छा है मेरे दिखाए मार्ग पर चलो।"

२.  भूख अब पेट में नहीं रहती

 हम बिदेश तो नहीं गए न साहब
हम तो आपकी सेवा में थे
हम ड्राइवर थे, धोबी थे, रसोइया थे
हम घर की साफ़ सफाई वाले थे
सडकें, गटर साफ़ करने वाले थे।

३.  बीत गया मधुमास सखी 

 मंजरी बिखरी आँगन में 
बीत गया मधुमास सखी।
पीत किसलय हुए पल्लवित 

हिय उमड़ा विश्वास सखी ।।

४.  ग़म के डब्बे

 क डब्बे का ढक्कन
पूरा  बंद ही नहीं होता,
रोज़-रोज़ की 
खिच -खिच से बनता है
ये वाला ग़म।  
इस ग़म की गंध से,
दिल तक़रीबन रोज़ ही 

भरा रहता है,

५. सांस्कृतिक चेतना का पर्व -- बैशाखी -- 

 ये तो है घर प्रेम का --  खाला का घर नाहि--
शीश उतारे भूईं  धरे -तब  बैठे इह माहि ||


 मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता
मुझे सन्नाटों का भी खौफ़ नहीं

'भारतरत्न' बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर 
जी का बी.बी.सी के साथ साक्षात्कार का एक दुर्लभ चलचित्र।    
उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 

 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं। 

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

८३....... घनन-घनन, घिर-घिर आये बदरा!





घनन-घनन, घिर-घिर आये बदरा!

नन-घनन, घिर-घिर आये बदरा! घन-घन घोर कारे छाये बदरा! मन धड़काये बदरवा ....... मन-मन धड़काये बदरवा........ ! का रे कलुआ! काहे फ़ोकट में पगलाये पड़ा है। अरे कक्का! काहे नमक में पानी डारे रहे हो! कभी तो ठीक से जवाब दे दिया करो। हम तो इहे कह रहे थे कि शॉक डाउन ससुर ख़तम हो रहा है संभवतः!
का बात कह रहे हो! हमने तो कोई श्वेत कारड नहीं बनवाया अभी तक! अरे ए कलुआ!  तनिक चंपकलाल से कह कर उहे हमार श्वेत कारड भी बनवा दो औरे हज़ार ठो रुपल्ली भी दिला ही दो आख़िर वो मगध के हाकिम काहे बने बैठे हैं। इस प्रकार करोना ससुर साहित्यकार से होते हुए पल्लीदार के घर मा अपना टाँग पसार कर सवा सौ किलो अनाज का बँटवारा देखता रहा। चतुर्थ श्रेणी के चतुरचालक वर्ग ने अपने चार मंजिला मकान में बैठकर शाम का ज़ाम लड़ाते हुए व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी पर ज्ञान प्राप्त कर इस बँटवारे के न्यायपरक कार्यक्रम पर लंबा-चौड़ा लेख विरोधी लोगों के मुँह पर दे मारा। अग्रज युधिष्ठिर! बोलो दुष्यंत! क्या कष्ट है तुमका? अरे ससुर ऊ शॉक डाउन ख़तम होने को है तनिक हमहू को ऊ श्वेत कारड आरक्षित करा दें अग्रज महोदय! इस प्रकार समस्त हस्तिनापुर राजा युधिष्ठिर की दानवीरता और सत्यता के आवेश में आकर स्वयं को चार सौ चालीस वोल्ट के आवेश से आवेशित कर बैठा! चूँकि सम्पूर्ण हस्तिनापुर की बिजली गुल थी परन्तु राज्य के प्रत्येक सिपहसालारों के हृदय करोना जीव के प्रोटीन से चहुओर आलोकित थे जहाँ एक तरफ़ साहित्यकार समाज  करोना के ख़ौफ़ से परेशान था वहीं दूसरा तबका करोना के महिमामंडन से अपना राजनीतिक कॅरियर 'नन्दवंश' के बाद स्थापित करने पर आमादा था। क़िताबघरों और पुस्तक की दुकानों से कौटिल्य के अर्थशास्त्र दे-दना-दन औने-पौने दामों पर डेटॉल हैंडवॉश की जगह ब्लैक में धड़ल्ले से बिक रहे थे। अमेज़ॉन और स्नैपडील के जंगलों से कुछ लोग कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार इबारती लकड़ियाँ चोरी-छुप्पे काटने में व्यस्त थे। तभी शहर में यह ख़बर जंगल की आग की भाँति फैल गई कि पांडव पुलवामा में मारे गये जबकि बी.डी.सी. के संवाददाता ने बताया कि आज बारह बजकर पाँच मिनट पर पांडव न्यूयार्क सिटी के एक पंचसितारा रेस्टोरेंट में कौरवों के साथ लूडो खेलते देखे गये! इस धकाधक् न्यूज़ को पढ़कर चेतक नदी के मुहाने पर अधमरा पड़ा था!
बाक़ी सब ठीक है! 


हम 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ में प्रवेश कर चुके हैं जो दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी है।  इस भाग के दूसरे चरण में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं-
( रचनाएं वरीयता क्रम में नहीं बल्कि सुविधानुसार लगायी गयी हैं। कृपया भ्रमित न हों! )  


 खुद़ा के वासते तनहा ही रह कर 
अमा इक चैन की बंशी बजा ले 


  "मास्क भी नहीं। मैडम आप का भी 
अलग ही चल रहा है। आपको क्या लग रहा कि कोरोना वाईरस 
आपसे पूछेगा - 'मुझसे दोस्ती करोगे?' वो बस गले पड़ जाएगा। आगे आप खुद समझदार हैं।" 

३. एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए

र दुकाँ बन्द है आंखों की  तरह  नशेबाज की
क्या एक भी दुकाँ नही थोड़े  से  कर्जे  के  लिए

४.  तीन उपन्यासों से प्रयोगवाद को प्रतिष्ठित करने वाले थे अज्ञेय

 च्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने कविता,
कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्त, निबन्ध, गीति-नाट्य, ललित निबन्ध,
डायरी जैसी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया।


 यह चराग़-ए-इश्क़ मेरा कब डरा हैंआँधियों से
रोशनी के जब मुक़ाबिल धुंध का बादल घना है



 हक़ीक़त में हो ख़्वाब पूरे ये सब
ऐसे  ख़्वाब हमने सयाने लिखे


 मैं जैसा हूँ
मुझे वैसा ही रहने देना
उस पर फ़िल्टर नहीं लगाना
कुछ और ही नहीं बना देना


 प्रलाप पाखण्ड का यह समय नहीं
अनुशासन विज्ञान के साथ चलो


 "एक ठो चिरैया रही, कुछ खास 
किसिम की रही. उसका पेट तो एक्कै ठो था 
लेकिन उसका मुंह था दो. समझ लो कि दोमुंही रही ऊ चिरैया... 
उस चिरैया का नाम था भारुंड..." रात को सोते समय दादी ने दो पोतों को किस्सा सुनाना शुरू किया। 



 कहनी थी, मुसलसल बात, मगर फुर्सत नहीं थी 
सफर चलता रहा, सरे-रात, मगर फुर्सत नहीं थी 


 खाओ सदा पौष्टिक खाना,
रहो तंदुरस्त और जिओ ज़माना। 


 हर साहित्यकार की रचना एक सुशिक्षित , 
सुसंस्कृत और सभ्य समाज की रचना के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी होता है। 



 जयकार में उठी कलम,क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में,खतरनाक लिखेगी !


 तपती धूप के रेगिस्तान में मैंने कोशिश की
धूल के साथ उड़ कर
तुझे छूने का प्रयास किया


 उसे प्रतीक्षा होती है उस फूल की
जो उसका राजकुमार लाएगा
जूड़े में लगाने को। 


 तीलियाँ निभातीं हैं 
ख़ामोश होकर 
साथ रहने की रस्म,
अगर ये लड़ने-झगड़ने 
ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने पर 
उतर आयें 
तो हो जाएगी 
माचिस की डिबिया भस्म।   

दरणीय हेमंत मोहन जी के स्वर में एक 'कहानी' 

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 

 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।





आज्ञा दें!






आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं। 

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

८२....इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ!


 इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ!



का हो कक्का! काहे शुतुरमुर्ग की तरह मुँह फुलाये बैठे हो! का तोहरे तबेले में कउनो विशेष बात हो गई!  अरे नाही रे कलुआ! अब तोहसे का बतायें! बड़ा दरद है! कलुआ- "कउन बात का?" 
"का कौनो चोट-वोट लागी राही!"
"अरे नाही" 
"का कहें तोहसे!" 
"और कैसे?"
हमरे तबेले की सभई भैंसिया ऊ चाउमीन वाले झटपट वायरस से मरी जा रहीं हैं औरे जो ज़िंदा बची हैं उन्हें खुजली हो गयी है। कल रात तुम्हरी काकी ने "भैंसिया रिलीफ फंड" खंगाला जो पूरी तरह से ख़ाली रही। अब सोच रहे हैं ऊ थोबड़े की क़िताब औरे मीडिया के ज़रिये इन भैंसियों के नाम थोड़ा बहुत चंदा जुटा लें और इन भैंसियों की दवा-दारू ख़रीद लायें। नहीं तो हमरी सारी भैंसिया गंजी हो जायेंगी। अरे कलुआ तनिक सुन, कहते हुए कक्का ने कलुआ की ओर आशा भरी नज़रों से देखा। कलुआ भी कक्का के नेक इरादे भाँपता हुआ थोड़ा सावधान हो गया- कहो कक्का, इम्मा हम क्या कर सकते हैं ?
कक्का- अरे कलुआ, तनिक तू भी थोड़ा दान दइ दे तो ससुर हमरी भैंसियन के बाल वापस आ जायेंगे चूरनवाले बाबा की कृपा से ।
कलुआ- नाही कक्का, हम नाही देब ई बार चंदा। उस बार हमने तोहरे "गदहों चलो हिमालय यात्रा औरे चमगादड़ों उड़ो अमीरात देश" वाले जनकल्याण प्रायोजित कार्यक्रम के नाम पूरे चवन्नी दान किए रहे। का हुआ उसका ? अगले महीने पता चला ऊ चंदा के फंड से तुमने अपनी पार्टी का तंबू छवा लिया औरे हम बिना छप्पर के संडास में बैठे हैं। उसी फंड के पैसे से तुमने गदहा गाड़ी भी ले ली है और हम अभी तक ग्यारह नंबर की गाड़ी से ग्रामीण -यात्रा कर रहे हैं। उसी पैसे से तुमने चुनावी दंगल में शुतुरमुर्ग-भैसियन की ख़रीद-फ़रोख़्त की है औरे अपनी लँगड़ी सरकार भी बना ली औरे हम अभी ताँगा हाँक रहे हैं। उहे पैसे से तुमने ख़बरियों के सारे अख़बार ख़रीद लिये औरे हम झुनझुना बजा रहे हैं। और तो और गाँव के "केंद्रीय संरक्षित आपदा चिल्लर फंड" को भी तुमने नहीं बख़्शा! उसे भी तुमने ज़ोर-ज़बर्दस्ती से तुड़ा लिया औरे हमको बताया तक नहीं कि उहे फंड का पैसा कहाँ गया! उसी पैसे का चारा खाकर तुम्हरे तबेले की कुछ चंट भैसिया दूसरी भोली-भाली भैसियों के बीच खुले में जा-जाकर गंध मचा रही हैं जिसकी बदबू से वे बौरा-बौराकर आपस में ही लड़ रही हैं।  कई भैसिया तो बिना टिकट के ही ऊपर निकल लीं औरे बची हुई सरकारी दवाख़ाना में अपनी मलहम-पट्टी करवा रही हैं। अब तुमही बताओ कक्का हम तोहरे पर कइसे विश्वास करें कि इहे बार तुम हमार पैसा भैसियन के इलाज़ में ही लगाओगे! इस बार हम तो अपना पैसा ख़ुद ही भैसियन के इलाज़ में डायरेक्ट लगायेंगे और बाक़ी बचे रकम से ऊ टमटम वाला ठेला ख़रीदेंगे ताकि इस शॉकडाउन के दौरान घर में ही बैठकर हम औरे हमार बहुरिया चनाझोर गरम बेच सकें। तुम अपना देख लो कक्का! हाँ! एक शर्त पर हम  'भैंसिया रिलीफ फंड" में चंदा देंगे-
पहला- पैसों का हिसाब-किताब तुम थोबड़े की क़िताब पर अपडेट करोगे!
दूसरा- उस गाढ़ी कमाई के पैसे से मंदिर-मस्ज़िद नहीं भैसियन का तबेला बनवाओगे!
तीसरा- अपनी चंट भैसियन को ई फंड से एक्को रुपल्ली नाही दोगे!
चौथा- ई फंड से सरकारी अस्पताल बनवाओगे न कि देश के कोने-कोने में अपने पार्टी के कार्यालय!
अब आगे आओ, औरे इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ! बाक़ी सब ठीक है।
        
         

 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-१ का परिणाम घोषित।
(निर्णायक मंडल में लोकतंत्र संवाद मंच का कोई भी सदस्य शामिल नहीं है।)  

सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की सूची दिए गये अंकों के साथ एवं उनके लिंक इस प्रकार हैं।   

क. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 




ख.लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद ) 
  




ग.  पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)

१. हायकु /सुधा देवरानी  ( अंक-१ ) ( श्रेष्ठ रचना टिप्पणियों की संख्या के आधार पर )  





अंतिम परिणाम 
( नाम सुविधानुसार व्यवस्थित किये गये हैं। )
 २ . सर्वोपरि / रोहितास घोड़ेला 
३. एक  और  तमस / गोपेश मोहन जैसवाल
 ४. हायकु /सुधा देवरानी ( श्रेष्ठ रचना टिप्पणियों की संख्या के आधार पर ) 
५. एक व्यंग्य : तालाब--मेढक---- मछलियाँ /आनंद पाठक ( रचना की उत्कृष्टता के आधार पर )

नोट: प्रथम श्रेणी में रचनाओं की उत्कृष्टता के आधार पर दो रचनाएं चुनी गयीं हैं। इन सभी रचनाकारों को लोकतंत्र संवाद मंच की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं। आप सभी रचनाकारों को पुरस्कार स्वरूप पुस्तक साधारण डाक द्वारा शीघ्र-अतिशीघ्र प्रेषित कर दी जाएंगी। अतः पुरस्कार हेतु चयनित रचनाकार अपने डाक का पता पिनकोड सहित हमें निम्न पते (dhruvsinghvns@gmail.com) ईमेल आईडी पर प्रेषित करें!  अन्य रचनाकार निराश न हों और साहित्य-धर्म को निरंतर आगे बढ़ाते रहें। हम आज से इस पुरस्कार योजना के अगले चरण यानी कि 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ में प्रवेश कर रहे हैं। जो आज दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी होगा। इस भाग में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं-

१. भेद विदित का        

 झर झर बरसे मोती अविरल
नेत्र दृश्य कुछ तोल रहा था।
मूक अधर शरीर कंपित पर
भेद विदित का डोल रहा था।

२. पूर्णविराम   

 ध्वंश हो गयी ध्वनि बेला
कुदरत के नए तांडव गांडीव से आज
अभिलेख ऐसा लिखा मानव ने
कायनात अपनी ही रूह से महरूम होती जाय

३. कविता...... निकल गयी  

मस्ते!
नमस्ते!!
कहते हुए एक मीटर फासले से
निकल गयी कविता।

 ४.सड़कों पर मज़दूरों के हुजूम पर सोचने के लिये कुछ संजीदा बाते 

 हर जगह सोशल डिस्टेंसिंग की बात
की जा रही है। मज़दूरों से अपनी बस्तियों में रुकने
के लिये बोला जा रहा है। जो लोग घरों में राशन जमा
 कर चुके हैं वे मज़दूरों को समझा रहे हैं कि वे गाँव को ना जायें।

 ५. कॉरोना महामारी रूपी प्राकृतिक आपदा

 चहुँ ओर दिखे अंधियारा जब
सूझे न कहीं गलियारा जब,
जब दुखों से घिर जाओ तुम
जब चैन कहीं ना पाओ तुम...



 ६. लॉकडाउन की मज़बूरी --

म खड़े खड़े देखते रहे
सातवें माले की बालकनी से
लॉकडाउन के नाज़ुक
ताले को टूटते हुए।

 ७. दोहे "धीरज रखना आप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 कोरोना से खुद बचो, और बचाओ देश।
लिखकर सबको भेजिए, दुनिया में सन्देश।।

८. याचन में गंतव्य लिए ...

  अनिश्चित जीवन प्रश्न-चिन्ह प्राचीर मनस में पाई है
इस पार करोना बैठा है ,उस पार पर्वत और खाईं है।

९. सन्नाटा 


 सन्नाटे के गाल पर
मारो नहीं चांटा
गले लगाओ इसे

 १०. पंछी बनकर देखें

हुत देख लिया इंसान बनकर,
लॉकडाउन खुलने तक
चलो पंछी बनकर देखें।

११. ठहराव 

 और एक दिन जब
मनुष्य ने ईश्वर को फड़

 १२. नहीं रहेगा 'करोना'!

 पदार्थ के प्रयोग भौतिक जगत के
 वे मूल सूत्र हैं जो  तथ्यों की जाँच-पड़ताल
कर कार्य और कारण सिद्धांत के आलोक में प्राकृतिक घटनाओं
की व्याख्या करते हैं। इसे ही हम भौतिक जगत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं।

१३. स्त्री मन  

काश! तुम समझ पाते
ये ज़िन्दगी एक बार ही मिली है।

 १४. ये लोग देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं

 फिर क्या हुआ...जहाँ वो थे वहां से
उन्हें खदेड़ा जाने लगा. काम से, बसेरे से. भूखे, बेघर जेब से
खाली लोग सड़क पर आ गये. सडक पर आये तो पीटे जाने लगे।

  १५. एक दूजे का साथ देना होगा (  प्रांजुल कुमार/ बालकवि ) 

 हम अब भी खुशियों को सजा सकते हैं,
उन टूटे खिलौनों को फिर बना सकते हैं |
इस शुभ कार्य को अब ही करना होगा,
इस भीड़ भाड़ की दुनियाँ में
एक दूजे का साथ जीवन भर देना होगा।

१६.  २१ दिवसीय लॉक डाउन के बाद कराहती मानवता

 हो तुम वंचित
साधनहीन सर्वहारा
ग़रीब मेहनतकश,
तुमसे समाज का
साधनसंपन्न वर्ग
हद तक नफ़रत करता है
तड़कती है उसकी नस-नस।

आदरणीय सुरेंद्र शर्मा जी 
उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 

 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।





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