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सोमवार, 5 मार्च 2018

३५ ...........''योग्यता और अयोग्यता की कसौटी''

''योग्यता और अयोग्यता की कसौटी'' बड़ा मुश्किल होता है कहने में, कौन योग्य है ? और कौन अयोग्य ? कहते हैं, 'कक्का' जी बड़े योग्य व्यक्ति हैं। इतनी सधी लेखनी के मालिक,वाकपटु और 'उ' कलुआ मारो ! वह तो फेंकता ही रहता है। और 'कक्का' जी जब देखो तब देश के प्रगति की बातें करते रहते हैं और जनता निहाल होती रहती है। एक बार की बात बताता हूँ आपको, 'कक्का' जी माइक पर मैकिया रहे थे। मंच पर तभी कलुआ भीड़ से निकल कर माइक छीनने लगा और इतना ही नहीं वह उदंडी 'कक्का' जी की बुराई करने लगा फिर क्या था पब्लिक ने आव न देखा ताव दे द ना दन जो चप्पलों और घूँसों से धोया, कलुआ फिरकी बन गया। कुल मिलाकर वह आज भी किसी मंच के निकट जाने में भी भय खाता है। अयोग्य जो ठहरा ! हम भी कितने पगले हैं लोगों की बातों में पट से आ जाते हैं। कभी -कभी मैं सोचने पर विवश होता हूँ कि कलुआ अयोग्य कैसे था उसको तो हमने बोलने का मौका ही नहीं दिया जबकि 'कक्का' जी दिन-रात अपनी कथा लोगों के बीच बाँचा करते हैं। यानि कुल मिलाकर निष्कर्ष ई भया जो चिल्लाया 'उ' शेर बाकि गीदड़ ! हा.. हा हा। हँसने में भी बड़ा कष्ट हो रहा है। जनता की ई पगलैटी देखकर। चलिए छोड़िये ! ''हिंदी मीडियम'' देखते हैं शायद कुछ बात पल्ले पड़ ही जाय। यह कुछ और बात है, लोग पॉपकार्न खाकर ही पैसे वसूल करने में लगे रहते हैं और कवि संगोष्ठियों में कवि कहलाने वाले चुटकुले सुनाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। साहित्य का तो पता नहीं लालित्य की दुहाई अक्सर दिया करते हैं। चलिए क्या करें ! हम शुतुरमुर्ग जो ढहरे जब खड़े होकर ही सारे नज़ारे दिख जा रहे हैं तो उड़ने की मूर्खता कौन करे। परन्तु मैं क्या करूँ ? पता नहीं यह उड़ने वाला कीड़ा मेरे अंदर न जाने कहाँ से आ गया है। बार-बार उड़ने का प्रयत्न करता हूँ और मेरे शुतुरमुर्ग भाई मेरी दो लम्बी टाँग पकड़कर खींच लेते हैं चलो ! आज भी एक नई पहल करता हूँ। कल आसमान के पार जाने का मौका मिल ही गया सो एक छुपे रुस्तम से मुलाक़ात हो ही गई तो सोचा तनिक आपसे भी साक्षात्कार करवा ही दूँ ! और फिर कल किसने देखा है उड़ने का यह स्वर्णिम अवसर फिर मिले या न मिले। 
मेरी एक नई 'खोज'
आदरणीय  विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


'लोकतंत्र ' संवाद मंच  
आदरणीय  विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' जी का  अपने साप्ताहिक सोमवारीय  अंक में 
हार्दिक स्वागत करता है। 

परिचय 
  -विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'       ( व्यग्र पाण्डे )
जन्म तिथि :-01/01/1965
पता-कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी , स.मा.(राज.)322201
मोबाइल-9549165579
विधा - कविता, गजल , दोहे, लघुकथा,
           व्यंग्य-लेख आदि
सम्प्रति - वरिष्ठ शिक्षक (शिक्षा-विभाग)


साहित्यिक जीवन 

प्रकाशित कृति -  

(1) कौन कहता है...(काव्य-संग्रह) 


                      

 











 (2) पाण्डे जी कहिन...(काव्य-संग्रह)













 प्रकाशन - 
साहित्यअमृत,मधुमती, दृष्टिकोण, अनन्तिम, राष्ट्रधर्म, शाश्वत सृजन, जयविजय, गति, पाथेय कण, प्रदेश प्रवाह, सुसंभाव्य, शिविरा पत्रिका, प्रयास, शब्दप्रवाह, दैनिक नवज्योति,दैनिक भास्कर आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित |
प्रसारण - आकाशवाणी-केन्द्र स. मा. से
           कविता, कहानियों का प्रसारण ।
सम्मान - विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्त। 

 टिप्पणी 

वर्तमान काव्य मंचों पर...

मंचों से जैसे उड़ी, कविताओं की मोर ।

बंद लिफाफा और अब, फूहड़ता का जोर ।।

कविता कम भाषण अधिक, श्रोता सब हैरान ।

लगता जैसे छिन रहा, कविता का सम्मान ।।

  चलभाष -9549165579
ईमेल :-vishwambharvyagra@gmail.com


तो स्वागत है । 
आपसभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों का



 'व्यग्र' जी की  एक रचना

   मैं कवि..

 कभी अक्षर की खेती करता
        कभी वस्त्र शब्दों के बुनता
बाग लगाता स्वर-व्यंजन के
        मात्राओं की कलियां चुनता
मैं कवि, कृषक के जैसा
        करता खेती कविताओं की
और कभी बुनकर बन करके
        ढ़कता आब नर-वनिताओं की
भूत-भविष्य-वर्तमान  सभी
         तीनों काल मिले कविता में
बर्फ के मानिंद ठंडक मिलती
          ताप मिलेगा जो सविता में
मैं भविष्य का वक्ता मुझको
          सूझे तीनों काल की बातें  
 मेरी ही कविता को गायक
          कैसे-कैसे स्वर में गाते
वेद पुराण गीता और बाईबल
          ये सब मेरे कर्म के फल है
डरते मुझसे राजे-महाराजे
          कलम में मेरी इतना बल है

  होली की कथा निष्ठुर ,
एक थे भक्त प्रह्लाद 
पिता  जिनका हिरण्यकशिपु  असुर।  

   ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान 

  पिछली बरस मैं चूक गई,
पर अबकी नहीं छोड़ूँगी।
खेलूँगी मैं तुम संग होरी,
देवर को हू रंग में बोरुँगी।
  अपने नए नए सपनों के लिए
नई नई दुनियाँ खोज रहा था | 

मनमोहक रुपहले रंग
जीवन में,
निरंतर घोलने की
चाहत । 

  मधुशाला  में  भीड़  है , होली  का  उल्लास ।
बुझा  रहे  प्यासे  सभी अपनी अपनी प्यास ।।


 तुम्हारी पलको तले 

 सफेद फूलमालाओं सी
शुभ्र बगुलों की पंक्तियाँ !
 एकांत  बने कब  साथी मेरे -
क्यों ये दर्द  है  नियति मेरी ?
पूछना मत  ! उजालों से दूर -
क्यों हुई  अंधेरों से प्रीति मेरी ;

  आज .. इंकलाब की जरूरत नहीं है
कत्लेआम की है,

 हम भारतीय मांऐं ही नहीं, 
दुनियाभर की मांओं को जिस 
तरह ये नैसर्गिक अधिकार प्राप्‍त है  कि 
 अपने शिशु को स्‍तनपान कराने से ना तो कोई रोक 
सकता है और ना ही इसके लिए  अनुमति की आवश्‍यकता 
होती है, ठीक उसी तरह शिशु को भी मां के दूध से कोई वंचित नहीं  रख सकता।


  जो दिलों से न उतर पाये ,
रंग ऐसे प्यार के चढ़ाओ, तो होली है।



  शीत तमस ने किया पलायन/
सूरज ने ऊष्मा घोली//
कोकिल कुंजित चित चितवन में/
हारिल की हरी डाली डोली// 

  
देख लेना बदलना पड़ेगा तुम्हें ये,
मेरे कर्म मजबूर तुमको करेंगे,

 प्राण पखेरू
उड़  चले व्योम में
दर खोजते

आदरणीय  'कुमार विश्वास ' जी 


   टीपें
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सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


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