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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

८२....इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ!


 इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ!



का हो कक्का! काहे शुतुरमुर्ग की तरह मुँह फुलाये बैठे हो! का तोहरे तबेले में कउनो विशेष बात हो गई!  अरे नाही रे कलुआ! अब तोहसे का बतायें! बड़ा दरद है! कलुआ- "कउन बात का?" 
"का कौनो चोट-वोट लागी राही!"
"अरे नाही" 
"का कहें तोहसे!" 
"और कैसे?"
हमरे तबेले की सभई भैंसिया ऊ चाउमीन वाले झटपट वायरस से मरी जा रहीं हैं औरे जो ज़िंदा बची हैं उन्हें खुजली हो गयी है। कल रात तुम्हरी काकी ने "भैंसिया रिलीफ फंड" खंगाला जो पूरी तरह से ख़ाली रही। अब सोच रहे हैं ऊ थोबड़े की क़िताब औरे मीडिया के ज़रिये इन भैंसियों के नाम थोड़ा बहुत चंदा जुटा लें और इन भैंसियों की दवा-दारू ख़रीद लायें। नहीं तो हमरी सारी भैंसिया गंजी हो जायेंगी। अरे कलुआ तनिक सुन, कहते हुए कक्का ने कलुआ की ओर आशा भरी नज़रों से देखा। कलुआ भी कक्का के नेक इरादे भाँपता हुआ थोड़ा सावधान हो गया- कहो कक्का, इम्मा हम क्या कर सकते हैं ?
कक्का- अरे कलुआ, तनिक तू भी थोड़ा दान दइ दे तो ससुर हमरी भैंसियन के बाल वापस आ जायेंगे चूरनवाले बाबा की कृपा से ।
कलुआ- नाही कक्का, हम नाही देब ई बार चंदा। उस बार हमने तोहरे "गदहों चलो हिमालय यात्रा औरे चमगादड़ों उड़ो अमीरात देश" वाले जनकल्याण प्रायोजित कार्यक्रम के नाम पूरे चवन्नी दान किए रहे। का हुआ उसका ? अगले महीने पता चला ऊ चंदा के फंड से तुमने अपनी पार्टी का तंबू छवा लिया औरे हम बिना छप्पर के संडास में बैठे हैं। उसी फंड के पैसे से तुमने गदहा गाड़ी भी ले ली है और हम अभी तक ग्यारह नंबर की गाड़ी से ग्रामीण -यात्रा कर रहे हैं। उसी पैसे से तुमने चुनावी दंगल में शुतुरमुर्ग-भैसियन की ख़रीद-फ़रोख़्त की है औरे अपनी लँगड़ी सरकार भी बना ली औरे हम अभी ताँगा हाँक रहे हैं। उहे पैसे से तुमने ख़बरियों के सारे अख़बार ख़रीद लिये औरे हम झुनझुना बजा रहे हैं। और तो और गाँव के "केंद्रीय संरक्षित आपदा चिल्लर फंड" को भी तुमने नहीं बख़्शा! उसे भी तुमने ज़ोर-ज़बर्दस्ती से तुड़ा लिया औरे हमको बताया तक नहीं कि उहे फंड का पैसा कहाँ गया! उसी पैसे का चारा खाकर तुम्हरे तबेले की कुछ चंट भैसिया दूसरी भोली-भाली भैसियों के बीच खुले में जा-जाकर गंध मचा रही हैं जिसकी बदबू से वे बौरा-बौराकर आपस में ही लड़ रही हैं।  कई भैसिया तो बिना टिकट के ही ऊपर निकल लीं औरे बची हुई सरकारी दवाख़ाना में अपनी मलहम-पट्टी करवा रही हैं। अब तुमही बताओ कक्का हम तोहरे पर कइसे विश्वास करें कि इहे बार तुम हमार पैसा भैसियन के इलाज़ में ही लगाओगे! इस बार हम तो अपना पैसा ख़ुद ही भैसियन के इलाज़ में डायरेक्ट लगायेंगे और बाक़ी बचे रकम से ऊ टमटम वाला ठेला ख़रीदेंगे ताकि इस शॉकडाउन के दौरान घर में ही बैठकर हम औरे हमार बहुरिया चनाझोर गरम बेच सकें। तुम अपना देख लो कक्का! हाँ! एक शर्त पर हम  'भैंसिया रिलीफ फंड" में चंदा देंगे-
पहला- पैसों का हिसाब-किताब तुम थोबड़े की क़िताब पर अपडेट करोगे!
दूसरा- उस गाढ़ी कमाई के पैसे से मंदिर-मस्ज़िद नहीं भैसियन का तबेला बनवाओगे!
तीसरा- अपनी चंट भैसियन को ई फंड से एक्को रुपल्ली नाही दोगे!
चौथा- ई फंड से सरकारी अस्पताल बनवाओगे न कि देश के कोने-कोने में अपने पार्टी के कार्यालय!
अब आगे आओ, औरे इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ! बाक़ी सब ठीक है।
        
         

 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-१ का परिणाम घोषित।
(निर्णायक मंडल में लोकतंत्र संवाद मंच का कोई भी सदस्य शामिल नहीं है।)  

सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की सूची दिए गये अंकों के साथ एवं उनके लिंक इस प्रकार हैं।   

क. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 




ख.लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद ) 
  




ग.  पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)

१. हायकु /सुधा देवरानी  ( अंक-१ ) ( श्रेष्ठ रचना टिप्पणियों की संख्या के आधार पर )  





अंतिम परिणाम 
( नाम सुविधानुसार व्यवस्थित किये गये हैं। )
 २ . सर्वोपरि / रोहितास घोड़ेला 
३. एक  और  तमस / गोपेश मोहन जैसवाल
 ४. हायकु /सुधा देवरानी ( श्रेष्ठ रचना टिप्पणियों की संख्या के आधार पर ) 
५. एक व्यंग्य : तालाब--मेढक---- मछलियाँ /आनंद पाठक ( रचना की उत्कृष्टता के आधार पर )

नोट: प्रथम श्रेणी में रचनाओं की उत्कृष्टता के आधार पर दो रचनाएं चुनी गयीं हैं। इन सभी रचनाकारों को लोकतंत्र संवाद मंच की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं। आप सभी रचनाकारों को पुरस्कार स्वरूप पुस्तक साधारण डाक द्वारा शीघ्र-अतिशीघ्र प्रेषित कर दी जाएंगी। अतः पुरस्कार हेतु चयनित रचनाकार अपने डाक का पता पिनकोड सहित हमें निम्न पते (dhruvsinghvns@gmail.com) ईमेल आईडी पर प्रेषित करें!  अन्य रचनाकार निराश न हों और साहित्य-धर्म को निरंतर आगे बढ़ाते रहें। हम आज से इस पुरस्कार योजना के अगले चरण यानी कि 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ में प्रवेश कर रहे हैं। जो आज दिनांक ०१ /०४ /२०२० (बुधवार) से प्रभावी होगा। इस भाग में चयनित कुछ स्तरीय रचनाएं इस प्रकार हैं-

१. भेद विदित का        

 झर झर बरसे मोती अविरल
नेत्र दृश्य कुछ तोल रहा था।
मूक अधर शरीर कंपित पर
भेद विदित का डोल रहा था।

२. पूर्णविराम   

 ध्वंश हो गयी ध्वनि बेला
कुदरत के नए तांडव गांडीव से आज
अभिलेख ऐसा लिखा मानव ने
कायनात अपनी ही रूह से महरूम होती जाय

३. कविता...... निकल गयी  

मस्ते!
नमस्ते!!
कहते हुए एक मीटर फासले से
निकल गयी कविता।

 ४.सड़कों पर मज़दूरों के हुजूम पर सोचने के लिये कुछ संजीदा बाते 

 हर जगह सोशल डिस्टेंसिंग की बात
की जा रही है। मज़दूरों से अपनी बस्तियों में रुकने
के लिये बोला जा रहा है। जो लोग घरों में राशन जमा
 कर चुके हैं वे मज़दूरों को समझा रहे हैं कि वे गाँव को ना जायें।

 ५. कॉरोना महामारी रूपी प्राकृतिक आपदा

 चहुँ ओर दिखे अंधियारा जब
सूझे न कहीं गलियारा जब,
जब दुखों से घिर जाओ तुम
जब चैन कहीं ना पाओ तुम...



 ६. लॉकडाउन की मज़बूरी --

म खड़े खड़े देखते रहे
सातवें माले की बालकनी से
लॉकडाउन के नाज़ुक
ताले को टूटते हुए।

 ७. दोहे "धीरज रखना आप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 कोरोना से खुद बचो, और बचाओ देश।
लिखकर सबको भेजिए, दुनिया में सन्देश।।

८. याचन में गंतव्य लिए ...

  अनिश्चित जीवन प्रश्न-चिन्ह प्राचीर मनस में पाई है
इस पार करोना बैठा है ,उस पार पर्वत और खाईं है।

९. सन्नाटा 


 सन्नाटे के गाल पर
मारो नहीं चांटा
गले लगाओ इसे

 १०. पंछी बनकर देखें

हुत देख लिया इंसान बनकर,
लॉकडाउन खुलने तक
चलो पंछी बनकर देखें।

११. ठहराव 

 और एक दिन जब
मनुष्य ने ईश्वर को फड़

 १२. नहीं रहेगा 'करोना'!

 पदार्थ के प्रयोग भौतिक जगत के
 वे मूल सूत्र हैं जो  तथ्यों की जाँच-पड़ताल
कर कार्य और कारण सिद्धांत के आलोक में प्राकृतिक घटनाओं
की व्याख्या करते हैं। इसे ही हम भौतिक जगत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं।

१३. स्त्री मन  

काश! तुम समझ पाते
ये ज़िन्दगी एक बार ही मिली है।

 १४. ये लोग देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं

 फिर क्या हुआ...जहाँ वो थे वहां से
उन्हें खदेड़ा जाने लगा. काम से, बसेरे से. भूखे, बेघर जेब से
खाली लोग सड़क पर आ गये. सडक पर आये तो पीटे जाने लगे।

  १५. एक दूजे का साथ देना होगा (  प्रांजुल कुमार/ बालकवि ) 

 हम अब भी खुशियों को सजा सकते हैं,
उन टूटे खिलौनों को फिर बना सकते हैं |
इस शुभ कार्य को अब ही करना होगा,
इस भीड़ भाड़ की दुनियाँ में
एक दूजे का साथ जीवन भर देना होगा।

१६.  २१ दिवसीय लॉक डाउन के बाद कराहती मानवता

 हो तुम वंचित
साधनहीन सर्वहारा
ग़रीब मेहनतकश,
तुमसे समाज का
साधनसंपन्न वर्ग
हद तक नफ़रत करता है
तड़कती है उसकी नस-नस।

आदरणीय सुरेंद्र शर्मा जी 
उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 

 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।





आज्ञा दें!






आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं। 
                          

बुधवार, 25 मार्च 2020

८१.. इस माह की चुनी गईं नौ श्रेष्ठ रचनाएं



स माह की चुनी गईं नौ श्रेष्ठ रचनाएं आप सभी के समक्ष वाचन हेतु प्रस्तुत हैं। अगले सप्ताह इन नौ रचनाओं में से सर्वश्रेष्ठ तीन रचनाएं पाठकों द्वारा भेजी गयी टिप्पणी और हमारे निर्णायक मंडल के निर्णय के आधार पर चुनी जायेंगी जिसे हम अगले बुधवारीय अंक में प्रकाशित करेंगे। हम आपसभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों से यह अपेक्षा करते हैं कि आप इन रचनाओं पर अपने स्वतंत्र विचार रखें!


लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी पाठकों का स्वागत करता है। 


तीन अंको से नौ श्रेष्ठ रचनाएं अपने लिंकों के साथ पुनः आपके समक्ष वाचन हेतु प्रस्तुत हैं।  

 क. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 




ख.  लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद ) 
  




ग.  पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)

१. हायकु /सुधा देवरानी  ( अंक-१ ) 




उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
  
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आज्ञा दें!





आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं। 
                                                                                              
                                                                                             सभी छायाचित्र : साभार  गूगल

बुधवार, 18 मार्च 2020

८०. अरे आजकल हम भी दोहा लिखना सीख रहे हैं!





दोहा दुन-दुन दुइ गुना, भया न रसिया कोय। 
धरम-धरम के चौखड़ी, बेच के घोड़ा सोय।।

धरम-धरम के नाम पर , कलुआ खाये घास। 
कक्का चादर तानके, जनमत पर विश्वास।।

देशभक्ति अब हो चली भारत की पहचान। 
चपला बारे मुफ़त में, यही देश की शान।।

साहित्य है गजभर रो रहा, कहते अपने-आप। 
कक्का का विश्वास है, नेता हमरे साथ।।

धरम-धरम में बोर के, ख़ूब चलाये मंच। 
कल तक थे जो मंत्री, बन बैठे अब रंक।।

हम तो नित्य लगायेंगे, अपनी रचना पास। 
उखाड़ सको सो उखाड़ लो, हम भी तोहरे बाप।।

लोकतंत्र की आड़ में, कबीरा खाये मात।  
कक्का करें हैं चाकरी, कलुआ खाये भात।।  

कलुआ ससुर मुँहफट्ट, कहता रस्सी तान। 
घोर-फेर के चक्कर में, कक्का खाये लात।।

( बदमाश कलुआ की क़लम से )

का रे ससुर कलुआ! ई का कर रहा है। तोहका कउनो काम-धाम नाही है का। जब देखो अनाप-सनाप लिखने बैठ जाता है। अरे कोई ढंग का साहित्य लिख। अरे कक्का! जब भी बोलिहो टेमफुस्स! अरे आजकल हम भी दोहा लिखना सीख रहे हैं। जैसे- छप्पन छुरी बहत्तर चाकू, हिन्दू ख़तरे में है , राष्ट्रभक्त, टी. ए. ए. चार तलाक़, आठ तलाक़, मंदिर ख़तरे में है, मस्जिद ख़तरे में है, अउर तो अउर ससुर अपनी ज़मात ही पूरी ख़तरे में है।  कक्का- पर तू तो साहित्यकार है इनसे तुझे क्या लेना-देना ? अरे कक्का तुम भी रहोगे पूरे धूम-धड़का! अरे  भई! मुझे देना तो कछु नहीं है परन्तु लेना बहुत कुछ है। औरे ऊ का? अरे कक्का थोबड़े की क़िताब और ब्लॉग पर साहित्य के नाम पर धंधा चलाने की फीस! उहे नेताजी देंगे जब उनकी पार्टी सत्ता में होगी! बाक़ी सब ठीक है।                       

 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-१ 


त्यंत हर्ष हो रहा है आपको यह सूचित करते हुए कि 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने हेतु अपने पाठकों और लेखकों को प्रोत्साहित करने का एक छोटा-सा प्रयास करने जा रहा है। इस प्रयास का मूल उद्देश्य साहित्यिक पुस्तकों के प्रति पाठकों के रुचि को पुनः स्थापित करना और उनके प्रति युवा वर्ग के आकर्षण को बढ़ाना है। इस साहित्यिक प्रयास के अंर्तगत माह के तीन बुधवारीय अंक में सम्मिलित की गई सभी श्रेष्ठ रचनाओं में से पाठकों की पसंद और 'लोकतंत्र संवाद' मंच की टीम के सदस्यों द्वारा अनुमोदित तीन सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को हम पुरस्कार स्वरूप साहित्यिक पुस्तकें साधारण डाक द्वारा प्रेषित करेंगे। हमारा यह प्रयास ब्लॉगरों में साहित्यिक पुस्तकों के प्रति आकर्षण को बढ़ावा देना एवं साहित्य के मर्म को समझाना है जिससे ब्लॉगजगत केवल इसी मायावी डिजिटल भ्रम में न फँसा रह जाय बल्कि पुस्तकों के पढ़ने की यह पवित्र परंपरा निरंतर चलती रहे। आप विश्वास रखें! इस मंच पर किसी भी लेखक विशेष की रचनाओं के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी पक्षपात नहीं किया जायेगा। निर्णय पूर्णतः रचनाओं की श्रेष्ठता और उसके साहित्यिक योगदान पर निर्भर करेगा।
रचनाएं सीधे लेखक के ब्लॉग से लिंक की जायेंगी और माह के अंतिम बुधवारीय अंक में चयनित रचनाओं के लिंक भी आपसभी के समक्ष प्रस्तुत किये जायेंगे।
यह कार्यक्रम दिनांक ०४/०३/२०२० ( बुधवारीय अंक ) से प्रभावी है।
विधा: हिंदी साहित्य की कोई भी विधा मान्य है। 
योग्यता: ब्लॉगजगत के सभी सक्रिय रचनाकार ( ब्लॉगर ) 

 रचनाओं की चयन प्रक्रिया 

लोकतंत्र संवाद पर प्रकाशित रचनाओं की प्रति तीन सप्ताह उपरांत समीक्षा की जाएगी। इस प्रक्रिया में श्रेष्ठ रचनाओं के चयन का आधार होगा-

1. पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)

2. लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद )  

3. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 

निर्णायक मंडल की निर्णायक प्रक्रिया संबंधी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।        

तो आइये! हम एक ऐसे बेहतर साहित्यसमाज का निर्माण करें जो पूर्णतः राजनीतिक,धार्मिक एवं संप्रदाय विशेष की कुंठा से मुक्त हो! इसमें आपसभी पाठकों एवं लेखकों का सहयोग अपेक्षित है। अतः सभी पाठकों एवं रचनाकारों से निवेदन है कि बिना किसी दबाव और पक्षपात के रचनाओं की उत्कृष्ठता पर अपने स्वतंत्र विचार रखें ताकि हम रचनाओं का सही मूल्याङ्कन कर सकें। 
सादर

हम आपके ब्लॉग तक निर्बाध पहुँच सकें और आपकी रचनाएं लिंक कर सकें इसलिए आपसभी रचनाकारों से निवेदन है कि आपसभी  लोकतंत्र संवाद मंच ब्लॉग का अनुसरण करें !
'एकलव्य'
लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी पाठकों का स्वागत करता है। 

आइए चलते हैं इस सप्ताह की कुछ स्तरीय रचनाओं की ओर  


 जनता की आवाज़ सुनाई दे कैसे
शोर बहुत है सत्ता के गलियारों में


  बस कि वतन में वतनी जहन पैदा हो
बस कि आइंदा से लहू में घुसे
लौहे को सोने का तगमा ना मिले।


   हमने बात की है 
गोताखोरी की 


 पडोसी पार्क में बुलाते रहे पकौड़े खाने को,
डरे सहमे लोग अपने अपने घरों से ही नहीं हिले।


 पूछो न रोज़ रोज़ के आख़िर में क्या हूँ मैं
सोचो तो सारे मर्ज़ की वैसे दवा हूँ मैं


 फिर उबलते पानी के साथ
देती हूँ कुछ रंग कुछ स्वाद
प्यालियाँ भरकर।


  मेढक सब मज़े उड़ाएँगे ,
मलाई खाएँगे और माल बनाएँगे । 
और हम ? हम इधर बस लार टपकाएँगे ,टापते 
रह जाएँगे।नहीं ,नहीं यह नहीं हो सकता । और उसी दिन से 
अलाना पार्टी वाले ,फ़लाना पार्टी वालों को गिराने की जुगत में भिड़ गए।

आदरणीय शैल चतुर्वेदी

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद। 
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार '
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित

होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आज्ञा दें  !





आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा। रचनाओं  के क्रम  सुविधानुसार लगाये गए हैं। 
                                                                                              
                                                                                             सभी छायाचित्र : साभार  गूगल

गुरुवार, 12 मार्च 2020

७९.. लच्छेदार रचना ज़रा छौंक लगाके लिख ( विलंब हेतु क्षमाप्रार्थी हैं। )





का कक्का! आजकल आप तो अपने मंचों पर स्थान ही नाही देते। का कउनो चूक हो गई का हमसे। नाही तो! अरे तुमका तो ख़ाली वही सिटपिटिया लेखक ही दिखता है हम तो जैसे कछु हैं ही नाही! अरे नाही रे कलुआ! तेरी रचना साहित्य के मापदंडों पर खरी नाही उतरती तो इम्मा हमरा कौन दोष! अरे उहे छक्कन गजोधर को देख कैसी ठुमकेदार रचना लिखता है! तुम भी कउनो लच्छेदार रचना ज़रा छौंक लगाके लिख और फिर देख कैसे झमाझम स्थान मिलता है तोरी स्तरीय रचनाओं को दसों मंचों पर। फिर देख पर्चा मंच अउरो तोहरे लिंकों का आनंद वाले सभई ज्ञानी तुझे कैसे झूला झुलाते हैं। बाक़ी सब ठीक है। 
      'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-१ 


त्यंत हर्ष हो रहा है आपको यह सूचित करते हुए कि 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने हेतु अपने पाठकों और लेखकों को प्रोत्साहित करने का एक छोटा-सा प्रयास करने जा रहा है। इस प्रयास का मूल उद्देश्य साहित्यिक पुस्तकों के प्रति पाठकों के रुचि को पुनः स्थापित करना और उनके प्रति युवा वर्ग के आकर्षण को बढ़ाना है। इस साहित्यिक प्रयास के अंर्तगत माह के तीन बुधवारीय अंक में सम्मिलित की गई सभी श्रेष्ठ रचनाओं में से पाठकों की पसंद और 'लोकतंत्र संवाद' मंच की टीम के सदस्यों द्वारा अनुमोदित तीन सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को हम पुरस्कार स्वरूप साहित्यिक पुस्तकें साधारण डाक द्वारा प्रेषित करेंगे। हमारा यह प्रयास ब्लॉगरों में साहित्यिक पुस्तकों के प्रति आकर्षण को बढ़ावा देना एवं साहित्य के मर्म को समझाना है जिससे ब्लॉगजगत केवल इसी मायावी डिजिटल भ्रम में न फँसा रह जाय बल्कि पुस्तकों के पढ़ने की यह पवित्र परंपरा निरंतर चलती रहे। आप विश्वास रखें! इस मंच पर किसी भी लेखक विशेष की रचनाओं के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी पक्षपात नहीं किया जायेगा। निर्णय पूर्णतः रचनाओं की श्रेष्ठता और उसके साहित्यिक योगदान पर निर्भर करेगा।
रचनाएं सीधे लेखक के ब्लॉग से लिंक की जायेंगी और माह के अंतिम बुधवारीय अंक में चयनित रचनाओं के लिंक भी आपसभी के समक्ष प्रस्तुत किये जायेंगे।
यह कार्यक्रम दिनांक ०४/०३/२०२० ( बुधवारीय अंक ) से प्रभावी है।
विधा: हिंदी साहित्य की कोई भी विधा मान्य है। 
योग्यता: ब्लॉगजगत के सभी सक्रिय रचनाकार ( ब्लॉगर ) 

 रचनाओं की चयन प्रक्रिया 

लोकतंत्र संवाद पर प्रकाशित रचनाओं की प्रति तीन सप्ताह उपरांत समीक्षा की जाएगी। इस प्रक्रिया में श्रेष्ठ रचनाओं के चयन का आधार होगा-

1. पाठकों की टिप्पणियाँ / समीक्षाएँ (लोकप्रिय रचना के लिये)

2. लोकतंत्र संवाद के समीक्षक मंडल द्वारा चयनित रचना (आलोचकों की पसंद )  

3. स्वतंत्र निर्णायक मंडल द्वारा चयनित रचना(लेखक की पसंद ) 

निर्णायक मंडल की निर्णायक प्रक्रिया संबंधी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।        

तो आइये! हम एक ऐसे बेहतर साहित्यसमाज का निर्माण करें जो पूर्णतः राजनीतिक,धार्मिक एवं संप्रदाय विशेष की कुंठा से मुक्त हो! इसमें आपसभी पाठकों एवं लेखकों का सहयोग अपेक्षित है। अतः सभी पाठकों एवं रचनाकारों से निवेदन है कि बिना किसी दबाव और पक्षपात के रचनाओं की उत्कृष्ठता पर अपने स्वतंत्र विचार रखें ताकि हम रचनाओं का सही मूल्याङ्कन कर सकें। 
सादर

हम आपके ब्लॉग तक निर्बाध पहुँच सकें और आपकी रचनाएं लिंक कर सकें इसलिए आपसभी रचनाकारों से निवेदन है कि आपसभी  लोकतंत्र संवाद मंच ब्लॉग का अनुसरण करें !
'एकलव्य' 


आइए चलते हैं इस सप्ताह की कुछ स्तरीय रचनाओं की ओर  


 ये वहीं है 
जो घरों से बाहर 
निकलते ही
तारते है तुम्हारे
उरोज, नितंब
और मुस्कराते है...


 अपनों में कौन बेगाना है 
कोई तो पूछ बताये हमें 


 सतारूढ़ दल के राजनेता 
काम बोलता है का जुमला उछाले 
हुये थे,तो विपक्ष ने इन्हीं कथित विकास कार्यों 
पर घेराबंदी कर रखी थी, पर वोटर ख़ामोश थे, 
क्योंकि जनता को किसी ने भी फीलगुड का एहसास नहीं करवाया था ।


 काश मैं चुपके से 
जेब की तस्वीर बदल पाती
उसकी वो तलाश मुकम्मल हो जाती..


 प्रेम की इक धार बनकर 
मन अगर खुद से मिलेगा, 
सोंधी सी फुहार छुए  
जो अभी तक जल रहा है !


 अपने हृदय के एकांत में
सर्वाधिकार सौंपकर
होना चाहती है
निश्चिंत


 कितना भी लिखूँ 
स्त्रियों को
क़लम के दायरे से
उफ़नकर
बह ही जाती हैं।


क्तबीज-सी उगूँ
और कण-कण में बिखेर दूँ,
खिलखिलाहट का बीज 


   चिराग़-ए-मुहब्बत बुझा तो रही हो
मगर याद मेरी मिटाओगी  कैसे ?


श्वेत -श्याम एक हुए 
 ना  ऊंच- नीच का भेद रहा 
 रंग एक रंगे  सभी  देखो 
 एक दूजे के  संग -संग गलियों में 
टेसू  फूले ,गुलाब महके . 
उडी भीनी पुष्पगंध गलियों में !!
    
आदरणीय अशोक चक्रधर जी 


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