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सोमवार, 24 सितंबर 2018

६१ .........फिर वापस लौट हिंदी पखवाड़े पर लम्बी-चौड़ी फेंकें ।

कलुआ आज अपनी 'दी' के यहाँ हिंदी पखवाड़े का विसर्जन करने गया है और कक्का गणपति जी को ! अजब महिमा है हिंदी में 'दी' नया शब्द ! अंग्रेजी में 'दी' प्राचीनतम ! चलो कक्का 'ब्रो' ! तनिक हिंदी कविशाला में थोड़ा अंग्रेजी युक्त हिंदी बांच आयें। फिर वापस लौट हिंदी पखवाड़े पर लम्बी-चौड़ी फेंकें । ....... हा ..हा ....हा। काहे मज़ाक करते हो भाई !
  
'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  

                                                           चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........

     

 एक ही बहर और वज़न के 
अनुसार लिखे गए शेरों का समूह ग़ज़ल के रूप में जाना जाता है।

  उनको बतलाएँ, ज़मीं हड़ के उन्हें सहती है,
ज़िन्दा लाशों से ज़मीं, पाक नहीं रहती है.



बहुत हो चुका अब लगाओ निशाना 
मुझे अपने दुश्मन का डर देखना है

क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 


 राजीव गाँधी के राज में धर्म-विकृति 
अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी. 
सवर्ण हिन्दू निर्लज्ज होकर अपने दलित भाइयों की आहुति दे रहे थे.
शाह बानो प्रकरण में इस्लाम के अंतर्गत स्त्री-अधिकार की समृद्धि परंपरा की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं.

 अब नयी-नयी 

तरकीबों के साथ 

चिड़ियों को उड़ाने नहीं 

जान से मारने हेतु 

प्रकृति से उलझ बैठा है। 


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धन्यवाद।
टीपें
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'एकव्य' 


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सभी छायाचित्र : साभार  गूगल

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