समर्थक

सोमवार, 17 सितंबर 2018

६० ...........नटखट 'कलुआ' की कलम से

       
कक्का जी आजकल बहुत ज्यादा ही व्यस्त चल रहे हैं। अरे भई ! चुनाव नज़दीक है और रचनाओं का आर्डर भी धूम-धड़ाके से मिल रहा है चलो ! अच्छा ही हुआ बहरूपियों का अनावरण तो हुआ, नहीं तो पता ही नहीं चलता कि इस ब्लॉग जगत के समंदर में कौन सत्य की खोज में है और कौन लाल-पीली,हरी-नीली झंडे वाली पार्टियों की। 
तो अर्ज़ किया है 
हम तो बैठे थे सामने ही तेरे 
तू ही अंधा था सादगी में मेरे 
वक़्त आ गया अब, काहे को रुकूँ  
तू चिल्लाता जा ! पगला जो ठहरा 
वे आएंगे दौड़े-दौड़े, अंधे हैं ! बंदगी में मेरे 

                                                           -नटखट 'कलुआ' की कलम से    


'लोकतंत्र' संवाद मंच 
अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत करता है।  

चलते हैं इस सप्ताह की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की ओर ........

समलैंगिक प्रेम

 अपराध है सभ्य समाज में,
नथ और नाक के रिश्ते की तरह,
बड़ा गज़ब होता है,
एक होंठ पर दूसरे होंठ का बैठना,

 बदबूदार ख़ज़ानें
 माज़ी1 का था समंदर, देखा लगा के ग़ोता,
गहराइयों में उसके, ताबूत कुछ पड़े थे,
कहते हैं लोग जिनको, संदूकें अज़मतों2 की,
बेआब जिनके अंदर, रूहानी मोतियाँ थीं.


कौन अब वादा वफ़ा करता है
  हो मुहब्बत के हो नफ़्रत की कशिश
जी को मौला ही अता करता है

 वक्त-वक्त की बात
 चौकीदार अपना, दरोगा अपना, पंच-सरपंच सब अपने
बस ..
तू ... लूट .... लूट .... लूट .....

लूट .. लूट के लूट ... फिर लूट के लूट ....

लंदन जा .. न्यूयार्क जा .. मेलबोर्न जा .. पेरिस जा
कहीं भी जा के बैठ ...

 दो क्षणिकाऐं
 जनता कहती

सता रही है

महँगाई की मार,

नेताओं को

पहनाओ अब

सूखे पत्तों के हार।

 हिंदी दिवस
 कितनी नक़ल करेंगे, कितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ की, जीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों का, दामन वो थाम लेंगे,
हिंदी दिवस पे ही बस, हिंदी का नाम लेंगे.



उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।


 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें  !



'एकव्य' 


आप सभी गणमान्य पाठकजन  पूर्ण विश्वास रखें आपको इस मंच पर  साहित्यसमाज से सरोकार रखने वाली सुन्दर रचनाओं का संगम ही मिलेगा। यही हमारा सदैव प्रयास रहेगा।
सभी छायाचित्र : साभार  गूगल