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सोमवार, 2 जुलाई 2018

५१....कक्का जी और कलुआ जब जा पहुँचे शाम-ए-अवध !

कक्का जी और कलुआ जब जा पहुँचे शाम-ए-अवध ! तो फिर क्या था, दे ताली पर ताली। कलुआ का मंच पर फर्राटेदार आगमन चारों ओर शांतिमय वातावरण ,कक्का जी भी बनारसी अंदाज में दे दनादन सीटी पर सीटी कलुआ के सपोर्ट में। बगल वाला श्रोता - काहे फर्जी में शोर मचा रहे हो कक्का जी,तनिक कलुआ को बकने तो दो ! तब गा लिहो तुम भी। कक्का जी शर्म से पानी-पानी ! उधर कलुआ माइक से गला फाड़ना आरम्भ कर दिया। 
कौन कहता है बादल में होल नहीं 
हमने कल ही फटे चादर से देखा था। 
उधर से आवाज आई। अबे तू क्यूँ नहीं फट गया ? कलुआ -अबे पूरा सुन तू खुद-ब -खुद फट जायेगा। 

मैंने कल ही अपने हाथ से बनी मैगी खाई 
तब जाकर दोस्तों,तुम्हारी मरी नानी याद आई। 
तभी दर्शक दीर्घा से एक व्यंग भरी आवाज आई। अबे कलुवे ! तुझे शायरी किसने सिखाई। 

फ़ब्तियाँ कसते हो अरे ओ ! दुनिया वालों
 कुछ दर्द ज़रूर है दिल में तुम्हारे घरवाली का 

शेर को शेर न कहो,चलो माना हमने 
गर दिल-ए-दर्द है,तबियत से चप्पल तो उछालो यारों। 

तभी बिजली चली गई और मंच पर सच में किसी ने चप्पल फेंक दिया। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल। भीड़ में कक्का जी का कीमा बन गया। जैसे-तसे कलुआ मंच से उतरा और कक्का जी को घसीटता हुआ पंडाल से बाहर आया और बोला 
जान बची सो लाखों पाए !
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