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सोमवार, 9 जुलाई 2018

५२ .............ब्रह्माण्ड के असीमित ज्ञान

कहते हैं सीखना मनुष्य की आजीवन प्रवृत्ति होती है। और मानव का यह अप्रतिम गुण समय के साथ बढ़ता जाता है। सीखने की इच्छा का ख़त्म होना मनुष्य के मरण का द्योत्तक है। वर्तमान में मानव सीखने की प्रवृत्ति से विमुख एवं अपने ही अंदर संकुचित ज्ञान के आवेश में आकर इस ब्रह्माण्ड के असीमित ज्ञान को धता बता रहा है। ऐसा नहीं है कि सीखने की लालसा जीवित नहीं रही अभी भी बहुत से मानव इस अथाह ज्ञान को अर्जित करने में निरंतर प्रयत्न कर रहे हैं। इसी का एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं 
आदरणीया रोली अभिलाषा जी जिन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाईयों का सामना किया परन्तु अपने सीखने की प्रवृत्ति का त्याग नहीं किया जिसके फलस्वरूप इन्होंने स्वयं की एक अलग पहचान इस साहित्य जगत में बनाई है। जिसका परिणाम इनकी प्रथम पुस्तक के रूप में आप सबके समक्ष प्रस्तुत है। 
'लोकतंत्र' संवाद मंच आदरणीया रोली अभिलाषा जी को उनके प्रथम पुस्तक ''बदलते रिश्तों का समीकरण''  के प्रकाशन हेतु ढेरों शुभकामनाएं देता है और आशा करता है कि भविष्य में साहित्य के नैतिक मूल्यों की स्थापना के प्रखर पक्षधर इस मंच को आपका अमूल्य सहयोग मिलता रहेगा।
  
'रोली' जी के विषय में कुछ शब्द लेखकों की ओर से....... 


आदरणीय रविन्द्र सिंह यादव जी

रोली अभिलाषा जी का रचना संसार जीवन के उन उपेक्षित अँधेरे कोनों पर रौशनी डालता जिनमें कश्मकश की तहों में दबे ज़िन्दगी के मासूम सवाल बाहर आने को आतुर हैं। रचनाकार का स्पष्ट दृष्टिकोण उसकी लेखनी को पैनापन देता है। रोली जी की रचनाओं को पढ़ते-पढ़ते आपको वैचारिक गहराई में उतरते जाने का एहसास कुछ इस प्रकार होता है कि पाठक के लिये बिषय के विभिन्न आयाम तलाशना कभी उलझन भरा तो कभी सुकून देने वाला होता क्योंकि बेबाकी अपना प्रभाव दिखाने से नहीं चूकती। हमारी शुभकामनायें।


-रविन्द्र सिंह यादव ( प्रगतिवादी कवि व लेखक )  

आदरणीया अपर्णा वाजपई जी ( लेखिका )

रोली अभिलाषा सिर्फ़ नाम या एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक ऐसा प्रेरणा पुंज है मेरे लिए जो जीवन के जटिलतम क्षणों में भी सकारात्मकता का उजास लेकर आती हैं। एक साहित्यकार के तौर पर उनका सफ़र समाचारपत्रों में पत्र लेखन से शुरू होकर आज एक स्थापित लेखिका के रूप में अनवरत जारी है और वो रचनाकार के तौर पर नित नए आयाम गढ़ रही हैं। हिंदी, अंग्रेजी, और उर्दू तीनों भाषाओँ में महारत रोली अभिलाषा आज हिंदी ही नही बल्कि अंग्रेजी साहित्य में भी अपना योगदान दे रही हैं। कई समाचार पत्रों, ब्लॉग और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ साथ वे दिव्यांग बच्चों के अभिभावकों को परामशर्क के रूप में अपनी सेवाएं देती हैं और उन्हें निराशा के गर्त से बाहर लाकर जीवन की संभावनाओं का मार्ग दिखाती हैं।
'बदलते रिश्तों का समीकरण' उनकी उस दौर में लिखी गयी किताब है जब वे एक बेहद खतरनाक दुर्घटना के कारण दोनों पैरों में प्लास्टर चढ़ाकर बिस्तर पर थीं और असहनीय दर्द से गुजर रही थी. ऐसे समय में एक सामान्य व्यक्ति अवसाद में डूब जाता है और स्वयं को दूसरों की दया का पात्र समझकर नकारात्मकता के अंधेरे में अपनी क्षमताएं खो देता है। शारीरिक चुनौतियों को नजरअंदाज करते हुए मोबाइल पर एक लघु उपन्यास लिख देना रोली अभिलाषा की जिजीविषा को दर्शाता है।
70 से 80 के दशक के उत्तर भारत में निम्न माध्यम वर्ग के सामजिक संजाल के बीच फंसे स्त्री-पुरुष के रिश्तों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करता हुआ यह लघु उपन्यास अपने आप में अनोखा है जो पाठक को अंत तक इस प्रकार जोड़े रखता है कि उसके चरित्र कई दिनों तक दिमाग में चलते रहते हैं और पाठक मन ही मन उनसे गहन साक्षात्कार कर लेता है।
अपने अनूठेशिल्प, विशिष्ट शैली और यथार्थ कथ्य के लिए यह उपन्यास बार-बार पढ़ा जाना चाहिए जो साहित्य जगत में रोली अभिलाषा का अनुपम योगदान है।
                                                                                                -अपर्णा वाजपई 

चलते हैं आज की श्रेष्ठ रचनाओं की ओर .......

 खूब हँसते है
अकेले मे
अंदर ही अंदर
खुद को
पढ-पढ कर रोते है |

 फिर रचे जा रहे चक्रव्यूह
फिर कोई अकेला अभिमन्यु
फंसकर इस चक्रव्यूह में
गंवा देगा अपने प्राण
हर और विराजमान हैं धृतराष्ट्र

 हेरी माई देउ सगुनिया परिअ दुअरि दुलहिन के पाँवा |  
कंठि हारु कर करिअ निछावरि तृन तोरत सिरु बारि फिरावा ||   

बस भी करो अब देवी कहना
पहले समझो तो इंसान मुझे
दिखलाओ जरा साथी बनकर
अब न मानूंगी भगवान तुझे

 क्षितिज पर बृक्ष का संहार
नभ में छाँव बोना चाहता है -
तमस में दीप का उपक्रम नहीं
खोजता है पथ सुघर

 ऐसी कोई वनस्पति है ही नहीं, 
जो किसी न किसी व्याधि की चिकित्सा में उपयोगी न हो

 वीर रस, जन गण सुहाने गा रहे हैं
पंक्तियों में गुनगुनाते जा रहे हैं,
तारकों की नींद को विघ्नित करे जो
गीत, वे कोरे नयन दो गा रहे हैं।

ल रहा हर कण धरा का
अनुतप्त हैं रवि रश्मियाँ,
एक शीतल परस कोमल
ताप हरता हर पुहुप का  !

  सँकरी नदी 
थे उस पार आप  
गुफ़्तुगू आसाँ 

समाज सुधारक और पत्रकार की 
भूमि में हम  हैं। तो हमें अपनी कथनी, 
करनी और लेखनी पर ध्यान देना होगा। रह -रह कर इन्हें 
टटोलना होगा। बड़ा ही संघर्ष भरा काम है यह हम सभी के लिये। 
मेरा मानना है कि उपदेश बनने से पहले एकांत में स्वयं को भलीभांति परख लेना चाहिए।

 ओस की बूंद से भीगने वाली लड़कियों
कैसे सीखोगी तुम दर्द का ककहरा,
आटा गूंधते हुए
नेल पेंट बचाती हुई लड़कियों
ज़िन्दगी मिलती नहीं दोबारा,

 ब्लॉगिंग का एक साल
 समय निरंतर प्रवाहमान होते हुए अपने अनेक 
पड़ावों से गुजरता हुआ - जीवन में अनेक खट्टी मीठी 
यादों का साक्षी बनता है जिनमे से कई पल अविस्मरनीय  बन जाते हैं|

एक मनमोहक आवाज आदरणीया शुभा मेहता जी 

उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा। 'लोकतंत्र 'संवाद मंच किसी भी राजनैतिक ,धर्म-जाति अथवा सम्प्रदाय विशेष संगठन का प्रचार व प्रसार नहीं करता !यह पूर्णरूप से साहित्य जगत को समर्पित धर्मनिरपेक्ष मंच है । 
धन्यवाद।
 टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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'एकव्य' 
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