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सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

३२.........रचनाधर्मिता की 'स्वतंत्रता'

रचनाधर्मिता की 'स्वतंत्रता' 
बड़ा अच्छा लगता है न, 
सुनने में। क्यों सही कहा ना ! 
अब तनिक अपने आप से पूछिए ! 
क्या हम इस धर्म का ईमानदारी से निर्वाह 
करते प्रतीत हो रहे हैं ? अथवा दूसरों के सुझाए 
विषय पर अपने मूल उद्देश्यों से विमुख होते नज़र आ रहे हैं। सृजनशीलता किसी भी मानव के अपने विचार और स्वयं के अंतर्मन से प्रस्फुटित, निरंतर प्रवाहित होती वे लहरें हैं जिन्हें दूसरों के दिमाग़ पर आधारित विषयवस्तु पर आदेशानुसार प्रवाहित करना, 
अपने  भविष्य में श्रेष्ठ 'सृजन' के उद्गम पर स्वयं के द्वारा अंकुश लगाना है। न कि अपने श्रेष्ठता के 'मापदण्डों' को तय करना ! अब सोचना आपको है, मैं तो वही "लोकतंत्र" संवाद मंच वाला बड़बड़िया हूँ। हमेशा की तरह बड़बड़ाऊँगा और केवल आपको स्मरण दिलाऊँगा। 

मत बाँधिए सृजन को !
उनके हल्के से लालच में 
अंतर्मन जो हलचल उठती है
केवल सुनिए, उस आहट को
मैं तो ठहरा ! एक बड़बड़िया
एक रोज दिखाने आऊँगा 
मैं पागल हूँ, है सत्य यही 
तुझे 'सत्य' बताकर जाऊँगा  !
"लोकतंत्र" संवाद मंच 
साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में आपसभी का स्वागत करता है।




हमारे इस सप्ताह की रचनायें  हैं :

 दिखेगें इन्द्रधनुषी रंग
बसारत कई खुश रंग की,
बसीरत की रंगों से

 कपास के जंगल से उड़कर
असुंदर,रंगीन गुदगुदा गोला
युद्धरत आदमियों के बीच गिरा

 मत टिकाओ
उम्मीद को अपनी
किसी लफ़्फ़ाज़ के सहारे, 


 रंग बसन्ती छाया है
पुलकित उर हरषाया है
कन्त भी मेरे पास नहीं
मिलने की कोई आस नहीं


 वहाँ न तो दिन होता है
न रात होती है,
न जश्न होता है
न बारात होती है..

 ख़त में लिखा था घर आने का
मंसूबें गिनाया था छुट्टियां मनाने का
मन पसंद की सूची व्यंजन पकवान की

 र्थ अनर्थ है,अक्सर बेटा !
शब्द अर्थ,रूपान्तर बेटा !

 लक्ष्य भी हमें साधता है
जब हम हताश हो
उम्मीद की परिधि से हट जाते हैं



 कैसे कहूँ उस डगर की बात
चलना छोड़ दिया जिस पर
अब याद नहीं


 तुम्हारे गुस्से भरे
बनते-बिगड़ते चेहरे की ओर
देख पाने का साहस नहीं कर पाती हूँ


  यह दिन में भी
दिखता है ।
फर्क बस इतना है
रात वाला चाँद,

हर कोई 
सुकून की तलाश में 
भटक रहा है 

नई पुस्तक मिली
 

 हमारी नयी किताब आयी है | 
कहानियों की पहली किताब | 
हिन्दी-साहित्य में सेना और सैनिक 
हमेशा से एक अछूता विषय रहा है | 
गिनी-चुनी कहानियाँ हैं सैन्य-जीवन पर...
गिने-चुने उपन्यास हैं | एक अदनी सी कोशिश है 
उसी कमी को थोड़ा कम करने की | कुछ कहानियाँ 
आपलोग इस ब्लौग पर पहले ही पढ़ चुके हैं | कुल 
इक्कीस कहानियाँ हैं....कुछ छोटी और कुछ बड़ी,  जिनमें से 
चंद पहले ही हंस, वागर्थ, पाखी, परिकथा, कथादेश, लमही, जनसत्ता, अहा ज़िन्दगी जैसी पत्रिकाओं में आ चुकी हैं | अब ये सब की सब संकलित होकर राजपाल प्रकाशन से किताब के रूप में आप सब के सामने है :- 


 कभी पसारो
बाहें नभ-सी तुम,
मुझे भर लो


 अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 
में एक वर्कशॉप के सिलसिले में वहां 
15 दिन रहने का मौक़ा मिला. वहां उर्दू 
प्रेमियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. ज़ुबान 
की मिठास, शायिस्तगी और नफ़ासत में तो वो लखनऊ वालों को भी मात करते थे. 

 जाने प्रियतम कब आ जाएँ,
खोले रखना द्वार !


 निर्मल, अविकारी सी ,
 कहीं जन्मती कहीं मिल जाती -
नियति की मारी सी !!


नयनाभिराम सुलोचना थी वो,
शब्दों में मुखरित विवेचना थी वो!
नयनों से वो अन्तर्धान हुई!

 साहब ... यही किलेबंदी है ....
शह है ... मात है .... !!


 बहुत दिन हो गये
सफेद पन्ने
को छेड़े हुऐ
चलो आज फिर से 




ईमानदारी का धंधा कोई गन्दा नहीं होता कभी,
ये भी एक रोजगार भर है , अब तो ये जान लो।





अपने ही ख्यालों में गुम मीनू चौंक उठी, घर के 
भीतर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, सूना आंगन उसके मन को कचोट रहा था,



 विचारधारा के इस कथित 
झगड़े में फायदा सरकार और 
विपक्ष के आलावा आजकल अपराधियों 
को भी हो रहा है | कोई नीजि दुश्मनी हो, खुन्नस हो ,
चर्चा में आना हो , अपनी राजनीति चमकानी हो या
 कोई नीजि पूर्वाग्रह हो | अपराधी आराम से अपने अपराध 
को विचारधारा का चोला पहना अपराध कर लेता है


  प्रजातंत्र  के मन्त्र से  ...
जनता  है  बेहाल !
खाल पहिन के शेर की...
चालें चले श्रगाल !



  काश !!!
तुम्हारी ख्वाहिश का,
मैं कुछ कर पाता.


  रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य लकीर।
कर ले दो दो हाथ तो, बदल जाय तकदीर।।



आदरणीया शुभा मेहता 
टीपें
 अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार,
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें !

"एकलव्य"


 सभी छायाचित्र स्रोत : साभार गूगल

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

३१..........दर्द के मायने

दर्द के मायने हमारे 
जीवन में विविध रूप लिए 
हुए विभिन्न दिशाओं में अपने -अपने 
स्वार्थ के लिए निरंतर गतिमान हैं। कल मुझे 
चोट लगी पड़ोसी देखकर ठहाके लगाता नजर 
आया। संभवतः उसे मेरे दर्द का एहसास नहीं था। 
परसों उसको चोट लगी चीख-चीखकर बवाल मचा दिया। 
परन्तु उसके पीड़ा का अनुभव मुझे हो रहा था। जाहिर है उस दौर से कल 
मैं भी गुजरा था। देश में सरकारें कायदे -कानून बनाती हैं। कुछ के लिए असहनीय ,पीड़ादायक।  कुछ के लिए, छोड़ो ! मेरा क्या जाता है। भूलिए नहीं आज जो आपको तकलीफदेह नहीं प्रतीत होता संभव है ! कल किसी न किसी रूप में आपके लिए अवश्य ही नुकसानदेह होगा। हाँ ! बात कुछ और है कुछ विलंब होगा ,पर अंधेर ही होगा। सरकारी बज़ट आया है हर लोगों की आम राय ! कुछ हताहत ,कुछ बेहद निराश और कुछ को मुझे क्या लेना इस मग्झ-मारी से ! मेरी तो दाल-रोटी चल ही रही है ,मुझे क्या लेना -देना। दूसरा बज़ट, अरे ! सरकार ने हमारे साथ बड़ा अन्याय किया हमारे मुँह का निवाला ही छीन लिया । याद रखिए ! आग अगर पड़ोस में लगी है निश्चित है ! लपटें आपके भी पर्दे जला देगी, हाँ यह जरूर है पड़ोसी के घर जलने के बाद। परन्तु पड़ोसी आपसे बेहतर होगा ,क्योंकि उसकी चींखे सुनने के लिए आप बगल वाले घर में मौज़ूद होंगे ! पर आपकी चींखे सुनने वाले पड़ोसी कब के कालकलवित हो चुके होंगे। अब आप स्वयं इतने ज्ञानी हैं कि विचारों के आशय भांप सकते हैं ! मैं तो मात्र बड़बड़िया हूँ। कल फिर मिलूँगा किसी चौराहे पर लगी चाय -पान की दुकान पर बक-बक करते हुए आपको ! नए टॉपिक के साथ।
"लोकतंत्र" संवाद मंच के साप्ताहिक 
सोमवारीय अंक में आप सभी गणमान्य 
रचनाकारों एवं पाठकों का हृदय से स्वागत है।

  •   रचनाओं की संख्या अधिक होने के कारण लिंक चार कड़ियों में  प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
 हमारे इस सप्ताह के रचनाकारों की प्रथम कड़ी :

  •  आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 

 बसंत (हाइकु )
खिला बाग़ीचा
फूलों पे चढ़ा रंग
रंगी है भोर

  • आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा 
   खुदातर्स
 परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, अहंकार से दूरी रखते है जो,
उद्भवन करते हों जो सद्गुण का,

  • आदरणीय लोकेश नदीश
  सुबकते रहते हैं

याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं


  • आदरणीय राजीव जोशी
  फ़िज़ूल ग़ज़ल
 है मुहब्बत का अजब ढंग निराला कैसा
कोई आँखों से ही बस दिल में उतर जाता है।


  • आदरणीया अभिलाषा जी
  .वो अदा हो तुम 
  इतना आसां न था
ये सफ़र तय करना
तेरे बग़ैर ये जीवन 


  • आदरणीया  जयश्री वर्मा   
 हम करें तो गुस्ताखी
 आते-जाते मेरी राहों पर,
आपका वो नज़रें बिछाना,

  • आदरणीया शैल सिंह
  ऐसा मय पिला गईं दो आँखें चलते-चलते,
 हर्फ़ उल्फ़त के पढ़ लेना ग़ौर से
लफ्जों की पोशाक पेन्ही हैं ऑंखें


उसे रहूँ मैं याद 
किसी न किसी शक्ल में 

  • आदरणीया  जेन्नी शबनम
मरघट 
 ऐ उम्र! अब चली भी जाओ 
बदल न पाओगी दास्ताँ जीवन की।  


  • आदरणीया रश्मि शर्मा
  माघी पूर्णिमा का चंद्रग्रहण.....
देखा मैंने चाँद को 
बढ़ते-घटते



 रचनाकारों की दूसरी कड़ी :

  • आदरणीया मधुलिका पटेल 
  • आदरणीया शालिनी रस्तोगी 
  • आदरणीय विजय बोहरा 
  • आदरणीया अनिता निहलानी 
  • आदरणीया श्वेता सिन्हा 
  • आदरणीया मीना भारद्वाज 
  • आदरणीया अनिता ललित 
  • आदरणीया प्रतिभा कटियार 
  • आदरणीया 'रेवा' जी 
  • आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी
 अजनबी अजनबी
 यह जीवन जब
भीड़ में गुम हो जाने के बाद
धीरे - धीरे तन्हा होता है


 समर्पण 
तुम ही कहो ,अब मेरे देवता 

 ईगो
अजीब सी बात है 
समझ नहीं पाता मैं 

  कल जो चाहा आज मिला है


मंजिल की है चाह जिन्हें भी
कदमों को किसने रोका है,


 कोमल मन हूँ मैं 
 ज्योति मैं पूजा की पावन
गीतिका की छंद हूँ मैं


  "भड़ास"  
  भौगोलिक परिवेश में
धरती की हलचल ।


 डस्टबिन -लघुकथा 


 पुकार लेना बारिश 

 कई बार चाहा अपना नाम बदल लूं, 
नदी रख लूं अपना नाम. कभी जी करता 
कोई बारिश कहकर पुकारे तो एक बार. बहुत 
दिल चाहता कोई गुलमोहर कहता कभी. कभी मौसम  

   डर

मन में एक अजीब 
सी हलचल 

 दिल में कोई लहर उठी सी है
 देखता  जा  रहा  हूँ  मुद्दत   से ।
सुर्ख  होठों पे  तिश्नगी  सी  है ।।




 रचनाकारों की तीसरी कड़ी :

 आदरणीया मीना शर्मा 
आदरणीया रेणु बाला 
आदरणीया किरण मिश्रा 
आदरणीय ओंकार जी 
आदरणीय ज्योति खरे 
आदरणीया रिंकी राउत 
आदरणीया निभा चौधरी 
आदरणीया महिमा श्री 
आदरणीय विश्वमोहन जी 
आदरणीया साधना वैद 
आदरणीया अपर्णा त्रिपाठी

 देखो
अप्रतिम सौंदर्य के साथ
सम्पूर्ण क्षितिज पर

 भरी बदरी में बंसवारी के भीतर
भुवन के भव्य भीत महल में,

  आदमी यूँ हो रहा बदनाम है।
मर रही संवेदना हर गाम है।

मुरली वाले तू सुनले पुकार
नैया मेरी, फंस गई मजधार

 बहुत दिनों से हूँ
मैं पतझड़ के
इंतजार में

अपराधियों की दादागिरी
साजिशों का दरबार
वक्त का जालिम करिश्मा
अंधी है सरकार

 अगर यह भी संभव नहीं,
तो आओ, ख़ुदा से कहें 

 घनघोर अंधेरे में जो दिखती है,
वो उम्मीद है जीवन की

 ये कौन   तूलिका  है ऐसी -
जो  ज़रा नजर नहीं आई है ?
पर  पल भर में ही देखो   

 प्रेम नहीं, शैय्या का सुमन,
वह पावन पुष्प देवघर का !


सुनो जी  
अपना सामान बांध लो  !

  रचनाकारों की चौथी कड़ी :

आदरणीया रेखा जोशी 
आदरणीया नीतू ठाकुर
आदरणीय नीरज 'नीर'
आदरणीया पूनम जी 
आदरणीया आशा सक्सेना 
आदरणीया रक्षा सिंह "ज्योति"
आदरणीया कविता रावत 
आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

 खिले खिले  रंगों ने महकाया उपवन
नन्ही ओस की बूँदों से नहाया उपवन

सूरज की प्यासी  किरणे जब 
बारिश से मिलने जाती है 

सूर्य वही चाँद वही 

होठों को भींच लेने से क्या होगा 
तुम्हारा नाम जो 

  सर्दी का मौसम लगता बड़ा प्यारा
इसी प्रलोभन ने मुझे मारा

माँ इंतज़ार है मुझे 
तेरी दुनिया में आने का 
तेरी गोद में सोने का 
  देख तेरी प्यार भरी निगाहें
दिल तुझमें डूबने लगता
इतना प्यार भरा है दिल में
 बादल छटें,
निकला है सूरज,
ठंड भी गई। 


टीपें
 अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, 
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित 
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें !


सभी छायाचित्र : साभार गूगल