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सोमवार, 16 अप्रैल 2018

४१ ...ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित साहित्यकार आदरणीया देवी 'नागरानी' जी से विशेष परिचय

शाम का वक़्त, लखनऊ शहर का हज़रतगंज चौराहा। सड़क के एक तरफ कैफे-काफी डे तो दूसरी तरफ राजभवन और सड़क के एक कोने में झटपटलाल का चटपट चाट भंडार जिसके पानी के बताशे न ही लखनऊ बल्कि दूर-दराज़  के इलाकों में मशहूर हैं। मैं एक कोने में खड़ा सड़क पार करने की प्रतीक्षा में था तभी मेरी नज़रें चाट के ठेले पर आकर ठहर गईं। विश्वास नहीं हो रहा था कक्का जी ! एक हाथ में कुछ श्लोगन लिखीं तख़्तियाँ और दूजे में पत्तल के दोने। मैंने कक्का जी को अनदेखा करते हुए मुँह घुमा कर सड़क पार करने लगा तभी कक्का जी ने आवाज लगाई। अरे कलुआ ! काहे देखकर अनदेखा कर रहा है। मैं क्षणभर के लिए लज्जित  हो गया ! परन्तु कक्का जी के बुलाने पर ठेले के पास जा पहुँचा। क्यूँ रे ! कलुआ हमें देखकर नज़रें चुराता है। नहीं-नहीं कक्का जी ऐसी बात नहीं है वो तो मैं...... ! नहीं -नहीं क्या ? बात काटते हुए अच्छा ये सब छोड़िए आप बताइये आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! अरे तुझे पता नहीं विपक्षी पार्टी ने मंत्री जी पर गंभीर आरोप लगायें हैं उसी के विरोध में प्रदेश साहित्यकार मंच ने मुझे इस विरोध हेतु लीडर चुना है और सारी तख़्तियों पर मेरे ही लिखे श्लोगन अंकित किए गए हैं सो मैं भी चला आया मैदान में मंत्री जी के सपोर्ट में। चल तूँ भी एक तख़्ती थाम ले ! अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं बाक़ी तू स्वयं समझदार है। मैं झल्लाते हुए  वहाँ से चलता बना। आपको ही मुबारक़ हो नेता जी का चुनाव मैं जा रहा हूँ ब्लॉग पर सिर मारने समझे !

ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित साहित्यकार 
आदरणीया देवी 'नागरानी' जी 
'लोकतंत्र' संवाद मंच इस ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित 
साहित्यकार का अपने साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में हार्दिक स्वागत करता है।   

परिचय : आदरणीया देवी 'नागरानी'

जन्मः ११ मई, १९४१, कराची (तब भारत)   
                                                                                                                             
माता-पिता का नाम- किशिनचंद ललवाणी व् हरी बाई लालवाणी

शिक्षाः बी.ए. अलीं चाइल्ड, व गणित में विशेष डिग्री, न्यूजर्सी से।
                                     
मातृभाषाः सिंधी,भाषाज्ञान: हिन्दी, सिन्धी, गुरमुखी, उर्दू, तेलुगू, मराठी, अँग्रेजी,सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी. यू.एस.ए (सेवानिवृत)

प्रकाशित सिन्धी संग्रह:
ग़म में भीगी ख़ुशी (ग़ज़ल-2007), उड़ जा पंछी (भजनावली-2007), आस की शम्अ (ग़ज़ल-2008), सिंध जी आऊँ जाई आह्याँ (कराची-2009), ग़ज़ल-(ग़ज़ल -2012), माँ कहिं जो बि नाहियाँ (कहानी-2016), गुलशन कौर (कहानी-2018), किताबी समालोचनाएं (--प्रेस )

हिन्दी संग्रह:
चराग़े-दिल (ग़ज़ल-2007), दिल से दिल तक (ग़ज़ल-2008), लौ दर्दे-दिल की (ग़ज़ल-2008)
भजन-महिमा (भजनावली-2012), ऐसा भी होता है (कहानी -2016), सहन-ए-दिल (ग़ज़ल-2017)
गंगा निरंतर बहती रही (लघुकथा-2017),कविता की पगडंडियां (काव्य-2017), माँ ने कहा था (काव्य-2017), The Journey (अंग्रेजी काव्य-2009)

हिन्दी से सिन्धी अनुवाद:
बारिश की दुआ (कहानी संग्रह-2012), अपनी धरती (कहानी संग्रह-2013), रूहानी राह जा पांधीअड़ा (काव्य-2014), बर्फ़ जी गरमाइश (लघुकथा-2014), आमने- सामने (हिन्दी-सिंधी काव्य अनुवाद-2016), आँख ये धन्य है (नरेंद्र मोदी काव्य- 2017), चौथी कूट (वरियम कारा का कहानी संग्रह-प्रकाशन-साहित्य अकादमी),

सिन्धी से हिन्दी अनुवाद: , सिन्धी कहानियाँ (कहानी-2014), सरहदों की कहानियाँ (कहानी-2015), अपने ही घर में (कहानी-2016), दर्द की एक गाथा (कहानी 2016), एक थका हुआ सच (अतिया दाऊद काव्य -2016), विभाजन की त्रासदी (कहानियाँ विभाजन की-2017), काव्य की पगाडंडियां (काव्य-2017), अहसास के दरीचे (प्रांतीय-विदेशी कहानियाँ-प्रेस), रूमीमसनवी (अंग्रेजी से हिंदी-प्रेस)

अन्य अनुवाद:
सफ़र- (अङ्ग्रेज़ी काव्य का हिन्दी सिंधी अनुवाद--ध्रु तनवाणी-2016)
सिन्धी कथा (सिन्धी कहानी का मराठी अनुवाद- डॉ. विध्या केशव चिट्को-2016), कई कहानियाँ मराठी, तेलुगु, तमिल, मलयालम, पंजाबी, उर्दू व् अंग्रेजी में अनुवाद हुई हैं.

सम्मान - पुरस्कार 
                                                                                                  
अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति, शिक्षायतन व विध्याधाम संस्था NY -काव्य रत्न सम्मान, काव्य मणि- सम्मान- “ProclamationHonor Award-Mayor of NJ, सृजन-श्री सम्मान, रायपुर -2008, काव्योत्सव सम्मान, मुंबई -2008,  “सर्व भारतीय भाषा सम्मेलनमें सम्मान, मुंबई -2008, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषदपुरुस्कार-2009, “ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर सम्मान-2010, हिंदी साहित्य सेवी सम्मान-भारतीय-नार्वेजीयन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, ओस्लो-2011मध्य प्रदेश तुलसी साहित्य अकादेमी सम्मान-2011, जीवन ज्योति पुरुसकार, गणतन्त्र दिवस-मुंबई-2012, साहित्य सेतु सम्मान -तमिलनाडू हिन्दी अकादमी-2013, सैयद अमीर अली मीर पुरुस्कार- मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-2013, डॉ. अमृता प्रीतम लिट्ररी नेशनल अवार्ड, नागपुर-2014, साहित्य शिरोमणि सम्मान-कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़-2014, विश्व हिन्दी सेवा सम्मान-अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ,यू.पी-2014, भाषांतर शिल्पी सारस्वत सम्मान- भारतीय वाङमय पीठ-कोलकता-जनवरी 2015,

हिन्दी सेवी सम्मानअस्माबी कॉलेज, त्रिशूर-केरल- सितंबर 2015,  हिंदी गौरव सम्मान-साठे कॉलेज, मुंबई-मार्च 2017, ‘प्रवासी साहित्यकार सम्मान विश्वभाषा साहित्य और रामकथा-अन्तराष्ट्रीय संगोष्ठी प. दीनदयाल महाविश्वविध्यालय, सागर (म.प-2017)

सिन्धी अनुदित कथाओं को अब सिन्धी कथा सागर के इस लिंक पर सुनिए.


आदरणीया देवी 'नागरानी' जी की एक रचना 

पहचानता है यारो, हमको जहान सारा
हिंदोस्ताँ के हम है, हिंदोस्ताँ हमारा

यह जँग है हमारी, लड़ना इसे हमें है
यादें शहादतों की देंगी हमें सहारा

 इस मुल्क के जवाँ सब, अपने ही भाई बेटे
करते हैं जान कुर्बाँ, जब देश ने पुकारा

 मिट्टी के इस वतन की, देकर लहू की ख़ुशबू
ममता का क़र्ज़ सारा, वीरों ने है उतारा

 जो भेंट चढ़ गए हैं, ज़ुल्मों की चौखटों पर
कुर्बानियों से उनकी, ऊंचा है सर हमारा

 लड़ते हुए मरे जो, उनको सलाम 'देवी'
निकला जुलूस उनका, वो याद है नज़ारा


चलिए ! चलते हैं इस सप्ताह के श्रेष्ठ रचनाओं की ओर 


 उसे तो जाना था , वो जा चुकी, है शिकवा क्या
वो कितना खींच भी सकती थी मेरी व्हील चेयर 

  तकनीकी युग में सोशल  मीडिया  
अभिव्यक्ति का एक बेहतरीन  माध्यम बन कर उभरा है |

 तुमसे उजियारा है
गीत मधुर होगा
जब मुखड़ा प्यारा है।


जिन लोगों ने इसकी सृष्टि की 
शिव जी की भांति वही आज 
उससे बचने के लिए 
इधर -उधर भाग रहे हैं 

 हर मृत्यु के बाद
रोज़मर्रा की साँसे
ले ही लेता है इंसान ! 

 तेरी धरा पर, ओ मां भवानी,
हर नेत्र में है, क्यों  आज पानी,
तुझसे मांगे थे फूल जो,


 कौन यहाँ किसको ढूंढे है 
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी 
पल भर का नहीं ठिकाना है !

स्त्री हूँ मैं पर अबला नहीं 

 जब  ही धरा पे
आई तनया..
पराई है,पराई !
पराये घर जाएगी,


 गुज़र रही है उमर कबीरा
हुआ नहीं कुछ मगर कबीरा
बड़ा वक़्त का सच है लेकिन
छोटी तेरी बहर कबीरा

 दुष्यंत कुमार से क्षमा याचना के साथ – 
घर का भेदी कुर्सी पाए -
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना, मेरा मक्सद नहीं, 
मेरी कोशिश है, तेरी, कुर्सी भी मिलनी चाहिए.

हुआ कुछ ऐसा कि शहरी जंगल में बसा  
मेरा दो कमरे का घर 



 कल रात बहुत बारिश हुई,

धुल गया ज़र्रा-ज़र्रा,

चमक उठा पत्ता-पत्ता,

बह गई राह की धूल,


 बच्ची थी ना वो तो
खिलौनों से ही खेलती होगी
गुड़िया लेकर सोती होगी


 जिन्दगी 
शुरु होती है 
और 
गिनतियाँ 
शुरु हो जाती है 

 नंगी प्रजातियों की नंगी ज़बान
थूककर चाट रहे अपने बयान

चेहरों पर कराकर फेशियल 
खोल ली है बारूद की दुकान


 ये बारिशें तुम्हारे मेरे साथ की,

गवाह बन गयी है,

बूंदों ने संग-संग हमे जो छू लिया है..

कुछ और वो भी जवां हो गयी है..


 चाहता है बारम्बार। ज्ञात है 
सभी को अंधकारमय 
नेपथ्य का रहस्य,
फिर भी


 नहीं कटता अकेले 
जिंदगी का सफर 
किसे सुनाएँ 

 कैसा डर ?
किससे डर ?
किस बात का डर ?
डरने की वजह ?


 कुलीन,गांडीवधारी, तू
सखा-गिरधारी,
द्रोण शिष्य,तुणीर भव्य!
लांछित,शापित, शोषित
सहता समाज का दंश
अकेला, मैं एकलव्य!


 ''ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए''।

साकार हुवा सपना
उसे देख कर
पूर्ण तृप्ता हूं मैं ।
मैं गर्वित हूं

 मन अकुला जाता है जब तुम नहीं आते
एक टीस सी उठती है हृदय में 
जैसे आ गया हूँ मैं प्रलय में 

जब कोई तितली, हौले से आकर,
तुम्हारे लगाए फूलों को अपने
मखमली पंखों से सहलाकर,
कहे - 'प्यार'.....
तो उसे तुरंत उड़ा देना !!!

 अरे यार!  परे हट! मालकिन ने देख 
लिया तो मेरी खैर नहीं.....यूँ गली के कुत्तों से मेरा बात 
करना मालकिन को बिल्कुल नहीं भाता....मेरी बैण्ड बजवायेगा क्या?....

 एक नृशंस कालखंड दर्ज हो रहा है इतिहास में
            भीड़ की तानाशाही और रक्तिम व्यवहार
ताकत का अमानवीय प्रदर्शन
क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता शाशन-प्रशासन....

अविद्या क्या है?
दुःख को ना जानना, दुःख के 
उदय को ना जानना, दुःख-निरोध को ना 
समझना और दुःख त्यागने का मार्ग ना जानना अविद्या कहलाता है.


समाचार आया है -
हवाई जहाज़ में 
मच्छर ने यात्री को काटा !
सनसनी-ख़ेज़ समाचार/ ब्रेकिंग न्यूज़  
तब भी बनता 

आप हमारे बीच नहीं है ये सच है
 पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये किरदार 
आज भी सजीव है। चाचाजी आपकी लेखनी और सहृदयता को शत-शत नमन।

 दूसरों के घाव सिलने से नहीं फुर्सत जिन्हें
अपने उधड़े ज़ख्म का उनको कहाँ आभास है 

 वो कहते हैं -   
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।   
मेरे भी सपने थे   
बेटी को पढ़ाने के   
किसी राजकुमार से ब्याहने के   

 यह जो रंगमंच पर हो रहा है
लिखी गयी है इसकी स्क्रिप्ट कहीं और
किसी और उद्देश्य से

 उड गई जो टीन की दीवारें 
         सो लेगें कुछ रोज 
         खुले  आसमाँ के तले 
          जोड लेगें फिर से 
         लगाएगे पैबंद नए.....

 महक उठा मेरा मन
फिर हुआ शुरू
सिलसिला बातों रस्मों का....
ऐसी लगन लगी
आपकी बातों के मोहपाश में

अलगाव की अग्नि: राजन मंगरियो (अनुवाद: देवी नागरानी)


  टीपें
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'एकलव्य' 


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