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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

१२ ..इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - ११ वां )

 .....  छन्नु लाल और मंथरा का सृजन यानि हमारी कहानी का हीरो 
"हँसमुख",इनके बारे में कहा जाता है ! 
लोग रोते -रोते पैदा होते हैं,ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 
इनका जन्म तो एक ऊर्जावान शख़्स के ही रूप में हुआ, 
तभी तो ! ये  तनिक भी रोये नहीं। पैदा होते ही हँसने लगे,
जो आज तक क़ायम है, हमारे देश के लोकतंत्र की भाँति। 
माना कि कई लूपहोल हैं हमारे देश के शासन प्रणाली में ,
एड्जस्ट करना तो हमारी चिरपरिचित परम्परा रही है। 
तो करिए ! 
 .....  ( शेष अगले अंक में )

इस विशेषांक की पहली कड़ी में 
"लोकतंत्र" संवाद ब्लॉग 
आप सभी का हार्दिक स्वागत करता है 


इस कड़ी के रचनाकार :



  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  • आदरणीय दिगम्बर साहब 
  • आदरणीया आशा जोगलेकर 
  • आदरणीय अरुण साथी 
  • आदरणीय अरुण रॉय 
  • आदरणीया शैल सिंह 
  • आदरणीय अजीत जी 
  • आदरणीया प्रतिभा सक्सेना 
  • आदरणीय सागर साहब 
  • आदरणीय आनंद विक्रम त्रिपाठी 
  • आदरणीया रश्मि शर्मा 
  • आदरणीय राजेश कुमार राय 
  • आदरणीय विश्वमोहन जी 
  • आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'
  • आदरणीया साधना वैद जी  
  • आदरणीया मीना शर्मा 


 फूल   से  नाराज़   होकर
तितली    सो      गयी     है,
बंद   कमरों   की  अब


 कैनवस की आड़ी तिरछी रेखाओं में
एक अक्स साकार होने लगा

  
 मेरी कविताएं नाचती हैं
 मेरे खयालों में।
घूमती हैं गोल गोल 

 पूछा दोस्तों ने मुझसे 
क्यों प्रेम किया तुमसे


 पतंगों की तरह उडती हूँ
आडम्बरों की डोर से बंधी

 पथ पर जाते एक बटोही को
प्रिय के बिल्कुल रूप सरीखा ।



कहने के लिए
कुछ शेष नहीं रहा

 यहाँ बस हूँ 

यहाँ दिन है
वहाँ तो रात होगी !

बारिश एक दुःख है 



बारिश एक दुःख है 
आलते का पौधा इसे नहीं समझता

   धड़कने दिल की
धड़कने दिल की
धड़कती बहुत है आजकल

 गलत ईंट


दो ईंट तुमने हटाईं
दो मैंने खिसकाईं

मुसव्विर हूँ छोटा तसव्वुर बड़ा है.....


क्या ज़वाब देता उस आख़िरी मिलन में
खामोंश रह गया था मैं हाथ मलते-मलते।


 इंसान की दरकार ! 
 मरघट में मची हाहाकार,
पथरायी मासूम आँखे ,


हम तितली हैं, अमृत-रस को ढूंढ ही लेंगे,
फूलों का साथ है तो, खुशियाँ ढूंढ़ ही लेंगे।

   सर्दी की रात 



काँपे बदन 
उघड़ा तन मन 
गगन तले ! 

 सृजन - गीत 
 उर-उदधि को कर विलोड़ित,
नेह के मोती निकालो !


आपके सहयोग से हमारा यह विशेषांक आगे भी निरंतर जारी रहेगा !

आज्ञा दें !

"एकलव्य"
  छायाचित्र स्रोत : गूगल