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सोमवार, 8 जनवरी 2018

११ ....इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - 'दस' )

........पढ़े -लिखे कम ,हिसाब कर लेते थे। 
आगे पढ़ने की ख़्वाहिश नहीं थी ! 
पुत्र भी इनका, कुछ इनकी ही तरह। 
भई ! क्या करिएगा ,जेनेटिक कोड का कमाल है। 
पत्नी इनकी 'मंथरा' ''यथा नाम तथा आचरण''  
दिनभर कोई ख़ास काम नहीं, एक को छोड़कर। 
दूसरों के घरों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप। 
इनकी भी शिक्षा शिरोधार्य ''टू कपटी" वाली , 
ख़ैर ! क्या रखा है , इन आधी -पौनी बातों में।  
 .....  ( शेष अगले अंक में )
"लोकतंत्र'' संवाद 
की इस रोचक कड़ी में आप सबका स्वागत है।  


आज के अनमोल रचनाकार हैं :

  • आदरणीया शुभा जी 
  • आदरणीया शकुंतला 'शाकु' जी 
  •  आदरणीया नित्या द्विवेदी 
  • आदरणीया प्रतिभा कटियार 
  • आदरणीय नीरज कुमार 'नीर'
  •  आदरणीया पम्मी सिंह जी 




कुछ भी कहिये इन्हें
दूल्हा मियाँ या नौशा मियाँ

 माँ तुम तो थी ममता की मूरत
आज क्यों हो गई माँ तुम हृदय हीन

 मंज़िलें
दिखती ना हो तो
थक ही जाया करते है



 खुद के लिए लम्हे चुराउंगी 
बनूँगी थोड़ी और मुंहफट




बरगद का वो बूढ़ा पेड़ 
खड़ा चुपचाप सड़क के किनारे 




इक नई रंग में ढलते देखा
हमारे हिस्से की धूप हमीं तक थी,
मन में कुछ सुकून सी थी..



आज्ञा दें !


"एकलव्य" 

    छायाचित्र स्रोत : गूगल