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शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

८ .......इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - 'सात' )

......यहीं से शुरुआत होती है 'मुँहनोचवा' के न्यू जेनेरेशन की। 
आप इसका परिमार्जित रूप यानि एक्स्क्लूसिव वर्ज़न भी कह सकते हैं। 
जो आज की प्रेमिकाओं पर फ़िट बैठता है
 ''मुँहतोपवा"  जी हाँ ! लोगों से बचने का नवीन व वैज्ञानिकी तोड़।
 न आस -पड़ोस के लोगों द्वारा पहचाने जाने  की दिक़्क़त 
न ही बदनामी का डर। धूप व 
धूल-मिट्टी से बचाव तो है ही  !
 ( शेष अगले अंक में )


आप सबका अभिवादन। 


आज के रचनाकार :

आदरणीया 'अंकिता' जी 
➣  आदरणीया  'नूपुरम' जी 
        ➢    आदरणीया रश्मि भटनागर  
➢  आदरणीया मीना शर्मा 


 भले घर की लड़की



 भेंट की जाती है 
पुरुष को,
उसके साथ 

पाई नहीं जाती।

 प्राण प्रतिष्ठा

 केवल सिर हिलाती है,
बोल नहीं पाती है ।

पर मोल लेने वालों को

 ढाई अक्षर...


 आज से सदियों पहले
शायद सृष्टि के समय
मैंने दिल की किताब से

कुछ अक्षर चुराये।

 कविता वह मकरंद है.....


 कविता निर्मल निर्झर है,
नहाती हैं जिसमें

सपनों की परियाँ !

  

आज्ञा दें !

"एकलव्य" 




 छायाचित्र स्रोत : गूगल