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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

७ ......इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - छः )

......कुछ वर्ष पहले एक महामारी फ़ैली 'मुँहनोचवा' बड़ी ही भयावह ! 
क़िस्सा कुछ यूँ हुआ करता था। आसमान से उतरने वाले कुछ स्वर्गदूत 
लोगों के मुँह घायल करके न जाने किस पतली गली में 
अंतर्ध्यान हो जाया करते थे। लोगों में 'मुँहनोचवा'  शख़्स का बड़ा ही 
ख़ौफ हुआ करता था उन दिनों। कुछ समय बाद पता नहीं 
किसी हिमालय वाले बाबा के दिए हुए चूर्ण के प्रतिदिन सेवन से 
इसका निस्तारण हो गया। आज उस हिमालय वाले बाबा की 
बड़ी -बड़ी कम्पनियाँ स्थापित हो गईं हैं। जो चूर्ण के बाद 
तेल ,साबुन ,मच्छर मारने वाले क्रीम का भी निर्माण कर रही है। 
 ( शेष अगले अंक में )

"लोकतंत्र" संवाद 
आपका हार्दिक स्वागत करता है। 

आज के रचनाकार :

  • आदरणीय श्यामल सुमन 
  • आदरणीया मीना गुलयानी 
  • आदरणीया अलकनंदा सिंह 
  • आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा 
                                                                        

 आज कहाँ कानून है, कैसा हुआ समाज?
मारे जाते, जो करे, अब ऊँची आवाज।।


 कभी कभी तो ज्वारभाटा
और कभी ज्वालामुखी बन
नागिन सी फुँफकारती हैं
कभी गर्मी की तपिश तो




 वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है....


 जो छोड़ गए हैं तन्हा,
वो पूछते हैं अक्सर, कैसे हो?
शायद! तन्हाई में कैसे जीता हूँ,
यही जानना चाहता है वो!


आज्ञा दें !


 .  
छायाचित्र स्रोत : गूगल