समर्थक

बुधवार, 3 जनवरी 2018

. ६ ......इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - 'पाँच' )

 ......ख़ैर छोड़िए इन बातों को ,बातों में क्या रखा है। 
आज कुछ और कल कुछ और , 
वैसे भी लखनऊ की वो अल्लहड़ शाम ,
हज़रतगंज की वो चकाचौंध ,बॉस्केट चाट का लुफ़्त  ! 
और दर्शन का मन करे न्यूयॉर्क सिटी का तो आ जाइये गोमती नगर ! 
मैं वहीं जाता हूँ कभी -कभी, वो अलग बात है अकेले ! 
दुर्भाग्यशाली हूँ ,गर्लफ्रेंड नही है हाँ ! 
पर दूसरों पे नज़रें हमेशा मुस्तैद रखता हूँ। 
अब देखिए ! लखनऊ के इक्कीसवीं सदी के बॉयफ्रेंड 
जिनके पास ज़ेब में पैसे भले न हों ,परन्तु प्रेम-मिलाप 
बड़े ही शाही अंदाज़ में होना तय मानिए। 
वेन्यु की क्या बात करें !
इनके लिए दस रुपए का टिकट, 
और पूरा गुलशन इनका। फिर चाहे भोर हो या साँझ !
मुझे स्मरण है। 
( शेष अगले अंक में )

सादर अभिवादन। 

आज के रचनाकार :

  • आदरणीया जेन्नी शबनम 
  • आदरणीया शालिनी रस्तोगी 
  • आदरणीय श्याम कोरी 'उदय'
  • आदरणीया मीना भारद्वाज  



चंद अक्षर  
सम्पूर्ण गाथा गहे  
हाइकु प्यारे।  

विदेह हो जाना 
सीमाओं के पार। 


 लो दोस्तो ... मैं चला ..
गुजरा वक्त हूँ .. गुजरता साल हूँ .. जा रहा हूँ ...


            और एक आज             
 कल में बीत गया ।
और एक साल
गत में बदल गया ।
जो आज है


आज्ञा दें !


  
.  छायाचित्र स्रोत : गूगल