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मंगलवार, 2 जनवरी 2018

५ .... इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग -'चार' )

.....प्यार में माप -तौल बदले हैं। 
माप-तौल के औज़ार !
अब वो रोज़ मिलने की जगह भले ही मैसेज ने ले लिए हों। 
परन्तु इनकी भी मंज़िल वही !
इक्कीसवीं सदी में प्रेमियों का सूर्योदय रात के बारह बजे ,
भौंकते हुए गली के आवारा कुत्तों के साथ 
और साँझ,भोर के पाँच बजे पॉलिट्रीफार्म के 
'आर्टिफिशियल' मुर्गे या यों कहिए 
व्हाट्सअप पर तैरते हुए कई बार चिरपरिचित तालाबों में 
डुबकियाँ लगाने के बाद नए रूप में नई सूचना के साथ। 
इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड जिसका एक पात्र 
हमारे मोहल्ले की तीसरी गली के छठें मकान में बने 
गैस की दुकान में विराजते हैं। 
( शेष अगले अंक में )

''लोकतंत्र'' संवाद 
आपका 
हार्दिक स्वागत करता है। 


आज के रचनाकार :

  • आदरणीया प्रतिभा सक्सेना 
  • आदरणीय शिवजी श्रीवास्तव 
  • आदरणीया वंदना शर्मा 
  • आदरणीया रक्षा सिंह ( नवोदित कवियत्री )




दिग्भ्रमित मति 
नये मंगल-आचरण का भाष्य पाये !



 सारे रिश्ते बेनाम करे
नेह भरे सम्बोधन,
बीते कल के नाम करे।


 तेरे ही दरस की पिपासा,
है, बस अब यही  मेरी आशा।



 फिर भी क्यों निर्मम बन जाता हूँ, 
नफ़रत के सागर में 
न जाने कितने गोते लगाता हूँ।
ममता ,विवेक ,दया और प्रेम 


आज्ञा दें !


 छायाचित्र स्रोत : गूगल