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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

२२...... इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १९ वां )

....उसने अँगुली का 
इशारा करते हुए ख़स्ता 
हालत में पड़े मेरे नालायक़ 
बेटे की तरफ देखा और बोली ! 
जानते हो  तुम्हारे इस लायक़ बेटे ने आज
 क्या नया गुल खिलाया।  मैंने सिर हिलाकर अपनी 
स्वीकृति ना में दी। मंथरा - सब तुम्हारे लाड-प्यार का नतीज़ा है। 
छन्नु लाल - पर मैंने क्या किया है ,ज़रा बताओगी ! मंथरा - अरे ! होना क्या था ,शाहबज़ादे गलियों में लड़कियाँ पटाते फिर रहे हैं। बाप हलवाई ! बेटा गली का रंगरसिया। छन्नु लाल - वो तो मैं इसको इसकी पैदाईश से जानता हूँ ,इसमे नया क्या है ! जैसी माँ ,वैसा बेटा। मंथरा - देखो जी तुम मुझ पर बेकार में अँगुली मत उठाओ ! 
अपनी याद करो ,शादी के बाद भी 
तुम चोरी -छुप्पे मिश्रा जी के घर बेकार 
में 'मिश्राइन' के कहने पर उनका हर काम कर 
दिया करते थे। और मैं लाख बीमार हो जाऊँ, घर का एक 
बर्तन भी तुमसे साफ़ नहीं होता। छन्नु लाल - अरे ! तुम्हें मालूम है। उस समय मिश्रा जी कितने बीमार चल रहे थे और उनके घर भी कोई नहीं था। सो थोड़ी मदद कर दी। मंथरा - क्यूँ ! 
मेरी मदद करने में तुम्हारी नानी मरने लगती है। 
( और आगे )
"लोकतंत्र" संवाद मंच
आप सभी का स्वागत करता है।


हमारे आज के रचनाकार :

  • आदरणीया पूर्णिमा राय 
  • आदरणीया अनिता ललित 
  • आदरणीय विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'
  •  आदरणीया शैल सिंह 
  • आदरणीया अभिलाषा जी 
  • आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव 
  • आदरणीया पूनम मोहन जी 


क़दम बढ़ाते हैं !
आज की रचनाओं की ओर

मन का साथी 

 मनु आहत
कैसी दिखती सृष्टि 
प्रेम- विहीन

 मैं...तुम हो जाती हूँ...
ठहरने लगती हैं !
बनाती हूँ तब मैं 

 माँ.... 



 कभी वो हाथ
सुकोमल से
फेरती थी
मेरे सर पर



 अभिनन्दन तेरा साल नवागत
 नई ऊर्जा लेकर नव वर्ष की आई है नई सुबह
पुलकित मन है नई नेमतें ले आई है नई सुबह।

 समय तेरा जवाब क्या.....!
 आते हुए उसने खटकाया भी नहीं
जैसे दबे पाँव मगर

निडर चला आया हो कोई,

 मुक्तक  

 हद की सीमांत ना करो सवाल उठ जाएगा

गिले शिकवे लाँछनों के अट्टाल उठ जाएगा

यूँ बवाल न होता!!


काश! तुम आते,
चुपके से गले लग जाते,
तो यूँ सवाल न होता।



आज के 'पाठकों की पसंद' की इस कड़ी में हम आपको मिलवाते हैं आदरणीय "देशवाली" जी से 

 बूढ़ा इंतज़ार


उस टीन के छप्पर मैं
पथराई सी दो बूढी आंखें

एकटक नजरें सामने
दरवाजे को देख रही थी



कल फिर उपस्थित होता हूँ नये विचारों के साथ 
आज्ञा दें !

"एकलव्य" 



सभी छायाचित्र : साभार गूगल