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मंगलवार, 16 जनवरी 2018

१९........ इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १७ वां )

... मेरी प्राण प्यारी फूट -फूट कर महाभारत गा रही है और रुक -रुक कर मुझे भी चार गालियाँ अपर्ण कर रही है। दूसरी तरफ मेरा 
नालायक़ बेटा और भी नालायक़ बने बैठा है। सिर पर 
बैंडेज की झालर चिपकाए ,गले में पट्टियों की माला 
पहने सोफ़े पर आराम से फ़िल्मी सपने सँजोने 
में व्यस्त है। हाथ में चोट लगी है ! परवाह नहीं 
टप -टप ,टुन -टुन व्हाट्सअप चला रहा है। 
मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ ,मुझे उससे 
यही उम्मीद थी। फिर भी मैंने अपनी 
प्राण प्रिये से तकल्लुफ़ 
करता हुआ 
पूछ ही बैठा ! 
भाग्यवान क्या हुआ ? 
क्यूँ अपने आँसुओं को यूँ ज़ाया 
कर रही हो। इन्हें बचाकर क्यूँ नहीं रखती ? 
मेरे दूसरे भोज पर काम आयेंगे। तभी मेरी प्राण प्रिये ने 
एकाएक रोना बंद कर दिया और पास में रखी कटोरी मेरी तरफ हवा में उछाल दी। 
( .... और आगे )


"लोकतंत्र" संवाद मंच 
आपका हार्दिक स्वागत करता है।

आज के हमारे रचनाकार :

  • आदरणीय अरुण कुमार निगम 
  • आदरणीया रेखा जोशी 
  • आदरणीया आशा सक्सेना 
  • आदरणीय गोपेश जस्वाल 
  • आदरणीया रिंकी राउत 
  • आदरणीया साधना वैद 


तो चलिए चलते हैं आज की रचनाओं की ओर.....  


 गूंगे बतलाने चले, देखो गुड़ का स्वाद
अंधा बाँटे रेवड़ी, रखो कहावत याद।।

 सूनी  शाखाओं को 
नव कोपलों का इंतज़ार 

आपके शब्दों की कसक
कानों में गूंजती रही वर्षों तक !

 मन चंगा तो कठौती में गंगा 

 कोई रैदास था जो गंगा-स्नान के दिन काशी जी में रहते हुए भी 
गंगा जी में स्नान करने के लिए जाने के स्थान पर अपने 
किसी ग्राहक का जूता गांठने के लिए चमड़े को 
पानी से भरी कठौती में भिगो रहा था. 


 
 पतंग
नापने आसमान का छोर
ज़मीन छोड उड़ चली



यह पतंग भी ना 
हू ब हू मेरे जैसी है !
पहली पहली बार उड़ाने की कोशिश में


आज्ञा दें !




छायाचित्र स्रोत : गूगल