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रविवार, 14 जनवरी 2018

१७......... इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १६ वां )

.... तभी एक सनसनाती तेज गति से आती साइकिल सीधे छन्नु लाल की 
दुकान पर आकर एकाएक रुक गयी। आप सोच रहे होंगे कि 
साइकिल में सीटी ! बात कुछ हज़म नहीं हुई।  
अरे भाई ! पेपर वाले किशन तिवारी अपने ग्राहकों को सतर्क करने हेतु 
अपनी साइकिल में घंटी की जगह सीटी लगवा रखी है 
ताकि सुबह -सुबह उनके ग्राहकों की नींद में ख़लल न पड़े और 
ख़बर भी हो जाए उनके शुभ आगमन की।  
आवाज आई - और छन्नु लाल कैसे हो ? कोई उत्तर नहीं। 
दोबारा आवाज लगाते हुए ,अरे भाई छन्नु हलवाई कैसे हो ?
छन्नु लाल - ठीक कैसे हो सकता हूँ तिवारी ! 
जिसकी औलाद ही फ़िल्मी निकल जाए। अब तो बस बम्बई जाकर 
स्टूडियो के चक्कर काटना शेष रह गया है। 
किशन तिवारी - क्या हुआ भाई छन्नु ? 
अरे क्या बताऊँ ? कोई एक परेशानी हो तो बताऊँ ! 
पहले ही बीबी की रोज़ -रोज़ की किचकिच से परेशान था। 
और अब ये मेरा नया फ़िल्मी सृजन। अब परसों रात की ही बात ले लो ! 
थका -हारा दुकान से जब मैं घर पहुँचा तो देखा। 
(..... और आगे )
"लोकतंत्र" संवाद मंच 
आप सभी का स्वागत करता है। 


आज के रचनाकार :

  • आदरणीय ज्योति खरे 
  • आदरणीया 'आलोकिता' जी 
  • आदरणीया शारदा अरोरा 
  • आदरणीया प्रतिभा सक्सेना 
  • आदरणीया अनिता जी 



 सहमी शरमाई सी
दिनभर खड़ी रही 
धूप 
ठंड 
दुबककर रजाई में

 हाय! कितना जघन्य अपराध! माँ-बाप पर हुआ वज्रपात
नाम डुबो दिया, कुलच्छिनी ने भुला दिए सारे संस्कार

 न राहों से गिला , न कश्ती से शिकायत मुझको 
तूफानों के समन्दर में , मेरा इम्तिहान भी तय है



जब नये साल से बोला 
चलता हुआ वर्ष 


 कदमों में भी राहें हैं 
 अभी जुम्बिश भुजाओं में
कदगों में भी राहें हैं,

अभी है हौसला दिल में

आज्ञा दें !


"एकलव्य" 
छायाचित्र स्रोत : गूगल