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शनिवार, 13 जनवरी 2018

१६ .......इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १५ वां )

 .......छन्नु लाल ( झल्लाते हुए ) - अबे ! आख़िर नस्ल तो मेरी ही है ,
बड़ा आया नई नस्ल का नया पौधा। जानता है ! 
ये जो दुकान देख रहा है तू ,ऐसे ही नही खड़ी की है मैंने। 
जलेबियों की तरह हाथ -पाँव घुमाए हैं और तेरी तरह व्हाट्सअप पर नहीं। 
दिनभर गल्ले पर बैठकर सपने देखता रहता है ,टॉमक्रूज़ के ! 
कभी कुछ काम भी कर लिया कर उसकी तरह। 
और हाँ ! यूँ ही लोग मुझे हलवाई छन्नु लाल का तमगा नहीं थमाते।
 बेटा लाल ! जिंदगी गुजर गई जलेबियों की 
चासनी का स्वाद बरोबर बनाने में। 
हँसमुख ( गुस्से में ) - तो बनाते रहो ! 
चासनी का स्वाद ,दुकान पर बैठे -बैठे। देखना ! 
एक दिन आएगा ,लोग कहेंगे भगवान हँसमुख जैसी नस्ल सभी को दे !
बापू वो दिन दूर नहीं ! बच्चा -बच्चा चिल्लाएगा ,वो देखो ! 
हँसमुख का बाप जा रहा है। 
छन्नु लाल ( व्यंगात्मक लहज़े में ) - हाँ बेटा ! पूरा पुलिस महक़मा भी यही कहेगा। पकड़ो उसे ! हँसमुख का बाप भाग रहा है। 
तभी ! मीठी -मीठी सीटी की धुन दुकान के आस -पास गूँजने लगी। 
( और आगे )

"लोकतंत्र" संवाद मंच पर 
आप सभी का अभिवादन। 


आज के रचनाकार हैं :


  • आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा 
  • आदरणीय शान्तनु सान्याल 
  • आदरणीय दिलबाग सिंह विर्क 
  • आदरणीया आशा सक्सेना 
  • आदरणीया मीना भारद्वाज 




 निर्बाध समय के, इस मौन बहती सी धार में,
वियावान में, घटाटोप से अंधकार में,

 बूंद आसमानी शायद रात 
ढले छलके थे मेरे 

  वक़्त तो लगता ही है, बीज को शजर होने में 
अच्छे कामों का, देर बाद दिखाई दे असर ।

 मन पर करते प्रहार 
संतुलित आचरण रहा तो रिश्ते संवरें 
पर बिना बात के ताने 



 वो हरे ,नीले कपड़ों के थान खुलवाए अपनी दो अंगुलियों की पोरों के बीच घूंघट थामे पारखी नजरों से कपड़े की किस्म भांप रही थी । बड़ी देर बाद उसने हरे रंग का कपड़ा पसन्द किया अब बारी ओढ़नी की थी , किसी का बांधनी का काम सफाई से नही तो किसी कपड़े में आब नही । 


आज के हमारे पाठकों की पसंद के अंतर्गत आदरणीया 'सरिता' प्रसाद की एक रचना 

'तानाशाही'

बारूद के ढेर पर बैठकर
दूसरों को धमकाना।
जंग के इरादे से,
दूसरों को भय दिखाना।
खुद का तानाशाह दिखाकर,
परमाणु परीक्षण करना।
आरजू है उन ताकतवर देशों के,
श्रेणी मे अव्वल रहना।
भयंकर रेडियो किरणों से,
पर्यावरण प्रदूषित करना।
तानाशाह का झंडा गारकर,
जंग का इरादा रखना।
बड़ा नागवार है यह हरकत,
तानाशाही राजा का।
बारूद तो आखिर बारूद है,
रच रहा है खुद ही मुसीबत,
कुछ हद तक शुरुआत है यह।
दफन हो गई असंख्य जाने,
परीक्षण निमित्त सुरंग के अंदर।
अब भी समझ जो आ जाए तो,
कदम मोर लेना बेहतर।
तबाही का कारण न बन जाए,
इनकी यह सनकी हरकत।
दफन न हो जाए इनकी सल्तनत,

बारूदी बवंडरों के अंदर।


आज्ञा दें !


  छायाचित्र स्रोत : गूगल