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गुरुवार, 11 जनवरी 2018

१४.......इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १३ वां )

 .....  छन्नु लाल मन ही मन बड़बड़ाते हुए
 ( न जाने कौन सी घड़ी में ऐसी निकम्मी औलाद पैदा हो गई ! )
फिर से आवाज लगाते हुए। 
अबे ! गधे की औलाद ,
मर गया क्या ?
हँसमुख ( व्यंगात्मक अंदाज़ में )- क्या बापू ! 
अपने आप को गाली क्यूँ देते हो ?
छन्नु लाल ( स्वीकारते हुए ) - अरे ! हरामख़ोर सही कह रहा है,
अपने आप को ही गाली दे रहा हूँ। 
हँसमुख - तब ठीक है।  
 .....  ( शेष अगले अंक में )

"लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 
आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

हमारे आज के रचनाकार हैं :

  • आदरणीय सतीश सक्सेना 
  • आदरणीया सरिता प्रसाद 
  • आदरणीया उपासना जी 
  • आदरणीया नूपुरम जी 
  • आदरणीय अरुण रॉय 
  • आदरणीया नीतू ठाकुर 
  • आदरणीया अलकनंदा सिंह 


  आग लगाई संस्कारों में 
सारी शिक्षा भुला गुरु की
दाढ़ी तिलक लगाये देखो

 ये कैसी न्याय व्यवस्था है
जहाँ दुराचारी बेलगाम घूम रहे हैं


पापा मुझे वो खाना है !
क्या खाना है ?


 मनभावन 
तस्वीर नज़र आने लगे  . . 


 कोई बात नहीं कि
आपके बेटे को है
१०४ डिग्री बुखार


ख़ून से लथपथ बेजान जिस्म 
रास्ते के किनारे पड़ा था 

 किसी भी धर्म का मर्म व्‍यक्‍ति की अंतध्‍वर्नि को 
जाग्रत करने में निहित है  ताकि
 धर्माचरण के बाद प्रवाहित होने वाली तरंगें
 व्‍यक्‍ति व समाज में  सकारात्‍मक
 ऊर्जा फैलाने का काम करें।


आज्ञा दें !



  छायाचित्र स्रोत : गूगल