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बुधवार, 10 जनवरी 2018

१३........इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - १२ वां )

सुबह होते ही आपको जलेबी की ख़ुश्बू हमारी 
कालोनी के किनारे वाली सड़क पर स्थित 
दुकान से आनी शुरु हो जाएगी। 
अरे ! ओ निकम्मे (छन्नु लाल कहते हुए अपने बेटे से ) 
 जलेबी की चासनी तैयार कर दी क्या ? 
दोबारा आवाज लगाई। 
अरे ओ रे ! हँसमुखिये - सुनता नहीं क्या ! 
साँप सूँघ गया तुझको। 
 .....  ( शेष अगले अंक में )


           आज के रचनाकार :

  • आदरणीया ऋतु आसूजा 
  • आदरणीय रविंद्र सिंह यादव 
  •  आदरणीया साधना वैद 
  • आदरणीय अरुण कुमार निगम 






मिट्टी में मिट्टी मिली
       मिट्टी हो गयी ,मिट्टी

  हवा गर्म हो रही है.... 

 आया था चमन में
सुकून की सांस लेने
वो देखो शाख़-ए-अमन पर

 नमन तुम्हें मैया गंगे


 गिरिराज तुम्हारे आनन को
छूती हैं रवि रश्मियाँ प्रथम

  दोहा गीत 

 वन उपवन खोते गए, जब से हुआ विकास ।
सच पूछें तो हो गया, जीवन कारावास ।।

आज्ञा दें !

"एकलव्य" 

 छायाचित्र स्रोत : गूगल