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सोमवार, 1 जनवरी 2018

५ ..... इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग - तीन )

 ........वर्तमान में पन्नों का अभाव कहिए अथवा पाठकों का ,
जिनके पास टाइम नहीं है। उन ग्रंथों को पढ़ने का 
परिवर्तन तो हुआ है निसंदेह ! 
ग्रन्थ की जगह व्हाट्सअप मैसेज लिखे जा रहे हैं। 
यहाँ भी शब्दों का टोटका !
मैसेज से प्यार ,आर्टिफिशियल होठों से घर बैठे -बैठे 
एक पन्नों का इज़हार। 
और हाँ ! क़िस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता। 
अरे भई ! आज भी बॉयफ्रेन्डों की अग्निपरीक्षा होती ही है ! 
तरीक़े बदल गए,
मानता हूँ ! 
उद्देश्य चिरपरिचित। 
( शेष अगले अंक में )


"लोकतंत्र" संवाद  
आपका स्वागत करता  है।  


आज के रचनाकार :

  • आदरणीया किरण मिश्रा 
  • आदरणीया शुभा मेहता 
  • आदरणीया अपर्णा त्रिपाठी 
  • आदरणीय आनंद कुमार द्विवेदी 




 सरवन की पालकी में
ठहर गया एक दिन
चुलबुला वसंत
प्रीत कुसुंभ के संग




 देखा मैंने इक सपना
   कि,इस नए साल में
   सब हिलमिल गए हैं
    झगड़ा ,टंटा कुछ नही 


नही दूंगी तेरी आंखों में आंसू
नही सिसकेगी तू चुपके चुपके
रात में तकिये के नीचे

नही मरेगी तिल तिल

दिसंबर के ख़्वाब .... 


मेरी सहचरी !
तुम्हें बसंत ऋतु की 
हार्दिक शुभकामनायें !

आज्ञा दीजिए !

''एकलव्य'' 


छायाचित्र स्रोत : गूगल