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रविवार, 31 दिसंबर 2017

४..... इक्कीसवीं सदी का बॉयफ्रेंड ( भाग -दो )


 ........कैसी हैं ? आपको खाना बनाना आता है ? 
परिवार में कौन -कौन है ? 
एक पल को मानिए कल-परसों का बॉयफ्रेंड प्रेम का इज़हार कम,
आगामी प्रेमिका के परिवार में ज़्यादा रुचि रखता हो ! 
ख़ैर प्रेमिका भी थोड़े पीछे रहती। 
मंद -मंद मुस्कराती ,नाख़ूनों को दाँतों तले चबाते हुए 
मानो दो दिन से खाना नसीब न हुआ हो। 
कभी -कभी दुपट्टा मुँह में डालकर चबाती ,बिना वाशिंग पाउडर के ! 
चलो बढ़िया था, इश्क़  के इज़हार में कई काम निपट जाया करते थे। 
एक तरफ़ नाखूनों की सफ़ाई और दूसरी तरफ़ 
धोबी के पास जाने से छुटकारा !
मेरी मानें तो पुराने ज़माने की जोड़ियों पर कई ग्रन्थ लिखे जा सकते थे !  
 ( शेष अगले अंक में )    
स्वागत है आपका 

आज के रचनाकार 

आदरणीय अरुण रॉय 

आदरणीय अरुण साथी 

आदरणीया शैल सिंह 

आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" 



 लिखते हुए
साल की आखिरी कविता
सोचता हूं साल की पहली कविता के बारे में



बुलेटबा अब दहेजुआ गाड़ी हो गेलो। 
खरीदे खातिर निम्मल बेटी बाप के गियारी हो गेलो।।

  तूं मेरी चुलबुली सखि 
बेझिझक अक्सर कर 
तन्हाई में तुझसे बातें  
मैं सहज हो लेती हूँ। 



बरसों बाद मैं पहाड़ों  से मिला,
लहूलुहान था, जब मुझको मिला। 

धन्यवाद !




छायाचित्र स्रोत : गूगल